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दो शब्द......
यय पितर्का का यह अंक अपने पाठक को
समिपर्त करते हुए हमें अपार पर्स ता हो रही है । हमारा सवर्दा यह
पर्यास रहा है िक इस पितर्का के माध्यम से अपने पाठक को
िविवध िवषय से संबंिधत लेख ारा बहुमू य जानकारी देकर
उनका ानवधर्न िकया जाए । इसी पिरपर्े य में यय पितर्का के
वतर्मान अंक में िविभ िवधाओं से संबंिधत ानवधर्क लेख का
समावेश िकया गया है ।
िहन्दी हमारे देश में राजभाषा तथा संपकर् भाषा के प में सिदय से पर्िति त रही है । राजपूत,
मराठा और मुगल शासक तथा ई ट इंिडया कं पनी के शासन काल में भी िहन्दी का पर्योग होता रहा है । भारत में
वाधीनता पर्ाि के सिदय पूवर् से िहन्दी राजकाज का माध्यम रही है । दक्खनी भाषा के िवशेष डा. ीराम का
कहना है िक िहन्दी भाषा के वल िहन्द ु तानी लोग ही नहीं, बि क इराक, ईरान से आए हुए िवदेशी मुसलमान भी,
जो मराठी, तेलगु ु तथा क ड़-भाषी क्षेतर् में रहते थे, इसका बोलचाल की भाषा के प में पर्योग करते थे ।
दिक्षण भारत में िहन्दी का पर्योग बढ़ाने में हैदर अली और टीपू सु तान ने महत्वपूणर् भूिमका अदा की थी ।
कहा जाता है िक िसकन्दर लोधी के शासन काल में राज्य का िहसाब-िकताब िहन्दी में होता
था । शेर शाह सूरी के शासन काल में भी िसक्क पर नागरी िलिप में िहन्द ु तानी भी अंिकत थी । मुगल के समय
राजभाषा फ़ारसी थी, लेिकन फ़ारसी बोलचाल की भाषा न होने के कारण उ र भारत में िहन्दी भाषा ही
अंतक्षेर्तर्ीय भाषा के प में बोली जाती थी िजस कारण कु छ लोग िहन्दी को भी उस काल में भाषा मानते थे ।
अकबर और जहांगीर वयं िहन्दी जानते थे । मराठ के पर्शासन में िहन्दी का पर्योग राजभाषा के प में काफी
यापक था । िवदेिशय के आगमन के साथ-साथ देश के सामान्य संपकर् के िलए एक भाषा की आव यकता
और अिधक महसूस की जाने लगी और िहन्दी ही एक ऐसी भाषा थी िजसे संपकर् भाषा बनाने के िलए मजबूर
होना पड़ा ।
िहन्दी हमारी संपकर् भाषा होने के साथ-साथ रा टर्भाषा और राजभाषा भी है । राजभाषा के
संदभर् में कई बार सरलीकरण की भी मांग उठाई जाती है । राजभाषा का व प कै सा होना चािहए और संिवधान
के अनुच्छे द 351 में िदए गए िवशेष िनदेर्श को ध्यान में रखते हुए उसके वाभािवक और नैसिगर्क व प और
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पर्कृ ित की रक्षा करते हुए हम उसका कै से िवकास करें , यह महत्वपूणर् पर् है । संिवधान का िनदेर्श है िक मूलतः
सं कृ त भाषा से तथा गौणतः अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द को गर्हण कर िहन्दी शब्द भंडार बढ़ाकर, भाषा
को समृ बनाया जाए । इस िनदेर्श के पीछे िनिहत भावना है िक जब अनेक भारतीय भाषाओं के शब्द िहन्दी
भाषा में समायोिजत िकए जाएंगे तो अिखल भारतीय तर पर िहन्दी का व प िनखरे गा और इसकी गर्ा ता एवं
समझ अन्य भाषा-भािषय में भी बढ़ेगी तथा भाषा वयं अपने में समृ होकर राजभाषा का उिचत थान पर्ा
करे गी ।
इस अंक में हमने पखवाड़े के दौरान िलखे गए िनबंध , किवताओं को भी शािमल िकया है ।
कै सा होगा मेरे सपन का िहन्द ु तान, मिहला सशक्तीकरण और राजभाषा संबंधी लेख न िसफर् समसामियक और
सारगिभर्त िटप्पिणयां देते हैं बि क िचन्तन और समझ के उस तर की बानगी भी देते हैं िजनसे उनके रचनाकार
बाव ता हैं । आिखर क्य , मेरी आदत है, िहन्दी कै से आएगी जैसी किवताएं हैं िजनमें िवचार, भाव और संवेदना
का बेहतरीन सामंज य देखने को िमला है । अंक की रचनात्मक गुणता और पर्ासंिगकता बनी रहे इस िलहाज से
हमने समय-समाज, सािहत्य और सं कृ ित के कु छ सशक्त ह ताक्षर - व. कमले र, डा. बालशौरी रे ी तथा
कमलाकान्त ितर्पाठी जैसे लेखक के रचनाओं को भी इस पितर्का में शािमल िकया है तथा इसी पर्कार गुिज ता
लक्ष ीप पर के िन्दर्त ी अिखलेश झा का लेख है जो अपनी जानकारी और पठनीयता के चलते पाठक को
ज र पसंद आएगा ।
मैं पितर्का के पर्काशन में सहयोगी और मददगार िहन्दी अनुभाग के अपने सभी सािथय और
अन्य कमर्चािरय व अिधकािरय का आभार यक्त करता हू,ं िजन्ह ने पितर्का के पर्काशन को संभव बनाया ।
अंत में, मैं बजट पर्ेस का भी आभारी हू,ं िजन्ह ने य तता के बावजूद पितर्का के पर्काशन में हमें
सहयोग िदया । पितर्का में और अिधक बेहतरी तथा सुधार के िलए आपके िकसी भी सुझाव, िवचार, परामशर् की
हमें सदैव पर्तीक्षा रहेगी ।
ह0/( देवी द ितवारी )
उप िनदेशक (रा.भा.) एवं सद य सिचव,
पितर्का संचालन सिमित
दरू भाषः 2309 3686
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यय पित्रका
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गांधी जी ने कहा था......
"िहन्दी भाषा वह भाषा है,
िजसको उ र में िहन्द ू
व मसु लमान बोलते हैं और जो
नागरी अथवा अरबी िलिप में
िलखी जाती है । वह िहन्दी
एकदम सं कृ तमयी नहीं है न
वह एकदम फारसी शब्द से
लदी हुई है । देहाती बोली में
जो माधयु र् मैं देखता हू ं वह न
लखनऊ के मसु लमान भाइय
की बोली में है, न पर्यागजी के
पंिडत की बोली में पाया
जाता है ।"
सन् 1918 में इन्दौर में आयोिजत िहन्दी सािहत्य सम्मेलन के 8वें
अिधवेशन में सभापित के पद से बोलते हुए....
यय पित्रका
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िवशेष संदभर्/द तावेज
िहन्दी-उदःर् ू िवरासत की पहचान
हमारे मशहूर और अत्यंत
महत्वपूणर् वतंतर्ता सेनानी और पर्खर पतर्कार
गणेश शंकर िव ाथीर्, िजन्ह ने साम्पर्दाियक दंग
की रोकथाम के िलए अपना साहिसक बिलदान
िदया था, उन्ह ने देश की गुलामी के दौर में कहा
थाः
"मुझे देश की आजादी और
भाषा की आजादी में से िकसी एक चुनना पड़े
तो मैं िनःसंकोच भाषा की आजादी को पहले
चुनूंगा, क्य िक मैं फायदे में रहूगं ा । देश की
आजादी के बावजूद भाषा की गुलामी रह
सकती है, लेिकन अगर भाषा आजाद हुई तो
देश गुलाम नहीं रह सकता "
गणेश शंकर िव ाथीर् की इस
िटप्पणी में कई तरह के अथर् िछपे हुए हैं, िजन पर
ज री बात की जा सकती है, लेिकन मैं यहां
के वल भाषा के महत्व वाले पक्ष को ही रे खांिकत
करना चाहूगं ा । हम वषर् 2007 में सन् 1857 के
वतंतर्ता संगर्ाम का 150वां वषर् मना रहे हैं । जन
सामान्य के सामने और उनकी औसत मृित में
सन् 1857 के वतंतर्ता संगर्ाम का सब से उजला
पक्ष यह है िक अंगर्ेज की बढ़ती स ा और गुलामी के िखलाफ यह संगर्ाम भारत में िहन्द-ू मुसलमान ने कं धे से
कं धा िमलाकर लड़ा था और यह िक भारतीय मध्य कालीन इितहास में यह दलु र्भ घटना पहली बार हुई थी,
नहीं तो इस देश में िहन्द ू और मुसलमान राजे-रजवाड़े हमेशा आपस में लड़ते रहे थे, िजसकी वजह से अंगर्ेजी
स ा को यहां पैर जमाने और मु क को गुलाम बनाने का बना-बनाया कू टनीितक और सामिरक माहौल िमल
गया था । हमारे कु छे क इितहासकार में भी इसे इसी इकहरे ि कोण से देखा और िव े िषत िकया है । इससे
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हमारे ज़हनी सोच का सहज सरमाया यह बनता है िक अंगर्ेज के िखलाफ सन् 1857 में लड़ने के िलए भारत
की सामंती-स तनती िहन्द-ू मुसलमान शिक्तय का असंभव मेल-िमलाप लगभग एकाएक हुआ था ।
माध्यिमक कक्षाओं के पा कर्म में यह सहज इितहास मौजूद है और साथ ही जनमानस में भी यह अधूरी
सां कृ ितक-इितहासगत धारणा पाई जाती है । इसका पूरा सां कृ ितक और भाषाई संदभर् सामने लाना ज री है ।
इसी संदभर् में िहन्द-ू उदर् ू भाषा के जनपक्षीय इितहास को यिद देखा जाए तो हम उ र भारत की
सिम्मिलत भाषाई और सां कृ ितक धरोहर को तत्काल रे खांिकत कर सकते हैं और इसकी िवरासत के पुख्ता
हकदार माने जा सकते हैं । िहन्दी भाषा और सािहत्य के इितहास में िहन्दी-ऊदर् ू की एकता और समान ोत का
समयगत उ े ख वहीं से िमलने लगता है, जहां से िस संत और घुमक्कड़ी नाथपंथी साधुओ ं का युग शु होता
है । वै ािनक ि से नौवीं से दसवीं सदी के इस दौर की भाषा को अपभर्ंश से िवकिसत होने वाली "पुरानी
िहन्दी" पुकारा गया है । यह भी माना गया िक आयर् भाषाओं के िवकास का तीसरा चरण अपभर्ंश काल है ।
पर्ाकृ त के बाद जो भाषाई दौर आया उसे भर् माना गया । िजस पर्कार पर्ाकृ त का अथर् वाभािवक या पहले ही
बनी हुई भाषा है, उसी पर्कार अपभर्ंश का अथर् है जनबोली अथार्त जन-सामान्य की बोली । भरतमुिन के संदभर्
के अनुसार अपभर्ंश बोलचाल की भाषा थी । पतंजिल ने भी "शब्द संदभर्" में अपभर्ंश के िलए अपशब्द या
म्लेछ की चचार् की है । सं कृ त के "वाच पित कोश" में भी अपभर्ंश का अथर् "गर्ाम्य भाषा" िमलता है । इस
पर्कार अपभर्ंश का शब्दाथर् हुआ िवकृ त, भर् या अशु , अथार्त जो भाषा अपनी गिरमा और प से िगरी हुई
हो । इस शब्द का सवर्पर्थम उ े ख पतंजिल ारा िकया गया, िजन्ह ने अपभर्ंश शब्द को अनेक कोण से देखा,
परखा और ितर कृ त करते हुए भर् होने की पदवी दे डाली ।
यह उन सातवीं और आठवीं सिदय का काल है जब बौ -जैन धम का अवसान और
शंकराचायर्, मंडन िम , कु मािरल भ जैसे आध्याित्मक वेदाचाय का उदय हो रहा था । यही वह समय भी है
जब वैिदक कही और मानी जाने वाली सं कृ ित के सामने इ लाम धमर् का पहला झ का आया था । भारत में
िसंध पर्ांत को अरब आकर्मणकारी मुहम्मद िबन कािसम ने जीता था । राजे-रजवाड़ , जय-पराजय के तर पर
इस आकर्मण को यिद न भी देखा जाए तो भी जनसाधारण के तर पर जो असर हुआ होगा उसे सहज ही समझा
जा सकता है, क्य िक मुहम्मद िबन कािसम के आकर्मण से पहले ही िसंध, गुजरात और दिक्षण भारत में अरब
यापारी मौजूद थे । जािहर है िक सवर्-साधारण के तर पर जो भाषा िवकिसत हो रही होगी, वह अपभर्ंश यानी
भर् ही मानी और पुकारी गई होगी । इस मानिसकता के कारण को सहज ही समझा जा सकता है ।
देशी और िवदेशी िव ान ने इसके नाम को मंजरू करते हुए भी इसे आयर्-भाषा कु ल की देशी
भाषा ही माना है । यह भाषा अपनी पूवर्वतीर् भाषाओं के योग-सहयोग का ही पर्ितफल थी जो िक समय पाकर
िवकिसत हुई । ग्यारहवीं सदी तक लोक-भाषा के प में अपभर्ंश उ री भारत से दिक्षण तक पूरी तरह फै ल
चुकी थी और िफर धीरे -धीरे मंद और क्षीण पड़ती हुई यह अपना समय 16वीं सदी तक खींच ले गई । बंगाल
से महारा टर् तक यह अंगीकृ त हुई जबिक उ री भारत में तो पर्ायः सभी ने इसे ही मान्यता पर्दान की । राजशेखर
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ने "का य मीमांसा"में इसका िव तार क्षेतर् बहुत िवशाल बताया है क्य िक सं कृ त में अनिभ लोग भी इसे ही
महत्व देने लगे ।
अपभर्ंश से ही आधुिनक भारतीय भाषाएं उ तू हुई हैं- बर्ाचड़ से िसंधी, कै के य से लहेंदा,
टक से पंजाबी, महारा टर्ी से मराठी, शौरसेनी से बर्ज, गुजराती, राज थानी पि मी िहन्दी और पहाड़ी,
अधर्मागधी से पूवीर् िहन्दी और मागधी से िबहारी, बँगला, असमी और उिड़या । इस पर्कार शौरसेनी अपभर्ंश की
बैसाखी पर पुरानी िहन्दी चल िनकली, िजसे िक पर्ारंिभक िहन्दी, िहंदवी या देश भाषा की सं ा िमली और इसी
से िहन्दी-उदर् ू का नािभ-नाल जुड़ा हुआ है । इस पर्कार पुरानी िहन्दी (िहन्दी-उद)र् ू का जन्म 9-10वीं सदी में
हो गया था । चंदर्धर शमार् गुलेरी जी के अनुसार जैन सािहत्य में और हेमचंदर् के "पर्ाकृ त याकरण" तथा देशी
नागमाता में भी खड़ी बोली के लक्षण मौजूद हैं । नाथ सम्पर्दाय के गु गोरखनाथ के साथ ही चरपट नाथ ने भी
हमें खड़ी बोली की आहट दे दी थी और चन्द बरदायी ने "पृथवीराज रासो" में खड़ी बोली के उन प को
समाया है जो आज भी आधुिनकतम हैं ।
इसी समय फारसी के पारंगत िव ान और िहंदवी के जन्मदाता अमीर खुसरो का युग शु होता
है । यह तेरहवीं सदी का उ राधर् काल है, जब िहंदवी यानी िहन्दी-उदर् ू भाषा का समिन्वत प उभरने और
सामने आने लगता है । अपने पर्ारं िभक काल के दौरान यह बोली हैदराबाद, महारा टर् और मैसरू में भी पर्वाहमान
थी । महानुभाव पंथ ने महारा टर् में इसी को अपनाया । इसी में नामदेव के गीत गूंजे, 13वीं सदी में संत ाने र ने
" ाने री टीका" और 16वीं सदी में संत एकनाथ संत तुकाराम और कान्होबा ने भी इसी बोली को अपनाया
और िवकिसत िकया ।
सोलहवीं सदी के संत एकनाथ, संत तुकाराम से पहले ही उ र भारत में कबीर की लहर चल
पड़ी थी और सूफी संत और भिक्तकाल का उदय हो चुका था और यह दौर जैसा िक सािहत्य के कु छ इितहास
में कहा गया है िक यह "दौर भारत की िहन्द ू जाित की परािजत मानिसकता का दौर था", यह एक दिू षत
ि कोण था, क्य िक सवर्-साधारण की ि से यिद तमाम समाजशा ीय पर्माण को सामने रखकर देखा जाए
तो यह "परािजत मानिसकता का दौर" नहीं बि क भाषा और सां कृ ितक समन्वय का सबसे महत्वपूणर् और
उ ायक दौर था । समन्वय का यह दौर िपछली सात सिदय से, अपने िवरोधाभास , बनते-िबगड़ते पर्संग और
ऊं च-नीच के बावजूद चला आ रहा था, िजसे औरंगजेब जैसा िववादा पद बादशाह भी खंिडत कर सकने की
ि थित में नहीं था । औरंगजेब की िवख्यात या कु ख्यात इ लामपर ती और सां कृ ितक अनुदारता भी इस
सां कृ ितक समन्वय की पर्िकर्या को बािधत नहीं कर सकी, जो सिदयां पार करती हुई अंगर्ेजी स ा के िखलाफ
सन 1857 में खड़ी होती है और अपनी िहंद ु तानी अि मता का यु लड़ती है । सही बात यह है िक दिु नया के
कु छ देश में धम के संघषर् चाहे होते रहे ह पर भारत में धमर्यु का कोई इितहास नहीं है । भारत ने भी इस
सोच और परम्परा को जन्म िदया है िक सं कृ ितय का सिम्मलन ही होता है, संघषर् नहीं । यही िहन्दी-उदर् ू भाषा
की स ाई भी है और हमारी िमली-जुली िवरासत भी, क्य िक इन दोन भाषाओं-िहन्दी और उदर् ू ने एक ही
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उ र भारतीय बोली "खड़ी बोली" शौरसेनी अपभर्ंश, राज थानी और हिरयाणवी की िमली-जुली िवरासत से
जन्म िलया था, िजसे "िहन्दवी" पुकारा गया था
इितहास की बदलती करवट के साथ ही इस िहंदवी भाषा को समय-समय पर अनेक
भाषाओं के पर्भाव को भी झेलना पड़ा । समय-समय पर न जाने िकतने देशी और िवदेशी भाषा वग के सैलाब
आए और वे इसके ऊपर अपनी छाप छोड़ते चले गए । िकन्तु खड़ी बोली िहन्दी और उदर् ू की मूल पर्कृ ित िफर
भी एक सी बनी रही और लगातार िवकिसत होती रही । इसी भाषा के िलए िहंदईु , िहंदवी, िहन्दी और उदर् ू नाम
का पर्योग होने लगा ।
अमीर खुसरो ने अपने दीवान "गुरार्तल
ु कमाल" की भूिमका में वीकार िकया है िक उनसे
पहले 11वीं सदी में फारसी के एक किव मसऊद-िबन-साइद-सुलेमान (1054-1131) ने भी िहंदवी में
का य-रचना की थी । उसने तीन दीवान अरबी, फारसी और िहंदवी में िलखे थे । इसकी पुि कई इितहासकार
ने भी की है ।
इस तरह "पुरानी िहन्दी" को यिद िस और नाथ संपर्दाय की जनभाषा के प में देखा और
माना जाए तो लगभग उसी दौर में हमें मसऊद-िबन साइद सुलेमान के "िहंदवी" कलाम की मौजूदगी की पुि
सहज ही होती िदखाई देती है । इसका साधुओ ं और सूिफय की धािमर्क या संपर्दायगत पहचान से कोई िवशेष
लेना-देना नहीं है क्य िक यह उनकी मजबूरी थी िक वे िवकिसत होती जनभाषा का इ तेमाल करें । वे भाषा का
िनमार्ण नहीं उपयोग कर रहे थे । ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं सदी में पुरानी िहन्दी कहें या िहंदवी, इसकी
बोलचाल का सांचा उ र भारत की जनता ने, अपनी जीवनगत सामािजक ज रत के िलए तैयार कर िलया
था । यह सांचा िवदेशी नहीं, िनतांत भारतीय था जो जन-साधारण ने बर्ज, लहेंदी, िडंगल-िपंगल, हिरयाणवी,
दिक्खनी, देहलवी और खड़ी बोली की भाषाई िम ी से तैयार िकया था । उस दौर के किव तो िसफर् उस बनती,
िवकिसत और थािपत होती सां कृ ितक तथा भाषाई िवरासत के गवाह हैं । िहन्दी-ऊदर् ू की एकात्मता की
िवरासत और पहचान है ।
थाः
और इसी "िहंदवी" के बारे में, तेरहवीं सदी में अमीर खुसरो ने भारतीय गौरव के साथ कहा
तुकर् िंŃदु तािनयम
मन िंŃदवी गोयम जवाब,
शकर िम ी न दारम
कज़ अरब गोयम तुखन ।
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अथार्त् "मैं िहन्द ु तानी तुकर् हू ं और िहंदवी में उ र देता हू ं । मेरे पास िम की शकर नहीं है िक
मैं अरबी में बात क ं ।" और इसी िवरासत और िमली-जुली पहचान को लेकर िहन्दी और उद,र् ू दोन भाषाएं
चल रही हैं । इन दोन की सां कृ ितक और खानदानी जड़ एक है और इनमें अपनी-अपनी िविश खाद और
पहचान के साथ इनकी साखें और प े िवकिसत हुए, होते रहे और हो रहे हैं ।
भारतीय इितहास अनुसंधान पिरषद (आई.सी.एच.आर.) के तीन िदवसीय अंतरार् टर्ीय सेिमनार
(21-23 िदसम्बर, 2006) में पर्ख्यात सािहत्यकार, पतर्कार व मीिडयाकमीर् व. कमले र का यह
भाषण अपनी पर्बल पर्ासंिगकता के चलते बहुत मौजूं बन पड़ा है । पाठक तक इसके संदभ को
पहुंचाने के िलए लेख के प में यह भाषण पहल-86 से साभार पुनपर्र् तुत है ।
िचतर्ः समथर् शील भटनागर
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िनबंध
कै सा होगा मेरे सपन का िहन्द ु तान
ती वै ािनक, आिथर्क और सामािजक िवकास और
उपलिब्धय के इस घटाटोप में कु छ दंश यदा-कदा
देखने को िमल जाते हैं जो हमारी समूची पर्गित और
िवकास पर सवािलया िनशान लगा देते हैं । ऐसे में यिद
सब कु छ आपके बस में हो तो कै सा होगा आपके
सपन का िहन्द ु तान
सात िभ -िभ रंग ने िमलकर,
सूयर् का ेत पर्काश बनाया और यही ेत पर्काश
वषार् की छोटी-छोटी बूंद से छनकर, सात रंग में
बंटकर भी इन्दर्धनुष बन हमारे मन में िछपे बचपन
को पुलिकत कर गया । मेरे सपन का िहन्द ु तान
िभ ताओं के रंग के िलए भी इन्दर्धनुष की तरह,
िव के िव तृत आकाश में हमारी सामूिहक
आशाओं, पर्गित एवं उत्थान की मानमोहक आभा
बने ।
सामािजक, आिथर्क, राजनीितक,
भाषाओं और क्षेतर्ीयता संबंिधत तथा अन्य िभ ताएं और समानताएं िव भर में रही हैं और इनके रहने की
संभावनाएं भी हैं । भारत के संदभर् में इस पहलू को देखा जाए तो भारत अपने आप में एक लघु िव है तथा
शतािब्दय से हमने इन िभ ताओं और असमानताओं को अपने इितहास, समाज और जीवन में ठीक ऐसे ही
थान िदया है, जैसे िकसी बाग में अलग-अलग रंग और खुशबुओ ं के फू ल, अलग-अलग आकार के पौध
को लगाया जाता है, जो िमलकर एक िभ सुन्दरता का आभास देते हैं और नीरसता को दरू रखते हैं।
मेरे सपन का िहन्द ु तान, देश में िव मान सामािजक, आिथर्क, राजनैितक, बोली, क्षेतर् की
िभ ताओं और असमानताओं में अवगुण को नहीं देखेगा और न ही िकसी िविश रंग के फू ल को बाग़ से
हटाने की कोिशश करे गा । मेरे िहन्द ु तान से सभी वग , संपर्दाय और क्षेतर् के लोग के जीवन में समानता,
पर्गित और आत्म-िवकास के अवसर रहेंगे ।
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मेरे सपन के िहन्द ु तान में हमें अ देने वाले िकसान, हमारी सीमाओं के पर्हरी, हमारे
वा थ्य संभालने वाले िचिकत्सक और हमारे िलए कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर बनाने वाले इंजीिनयर का जीवन तर
और सामािजक औहदा समान होगा । तब ऐसा न होगा िक िकसान भूख से मर रहा हो और कहीं और कोई
िकसी वातानुकूिलत रे ां में बैठकर अमेिरकन बगर्र या इतालवी िपज़ा खा रहा हो । सभी के िलए अ हो,
आजीिवका हो, यह न के वल सरकार सुिनि त करेगी, अिपतु समाज की आंखें और िदल भी इस ओर खुले
रहेंगे ।
हम सभी धम के पर्ित अपना आदर-सम्मान, अपने ऐितहािसक पृ भूिम से अनुसरण करते
हुए और सबक लेते हुए जारी रखेंगे । हम आपस में पर्ेम भावना को और बढ़ाएंगे । समय के साथ इस मु े पर
हमारी सोच और िवकिसत और िव तृत होगी । हम तुच्छ राजनीितक भड़काव से काफी सबक ले चुके हैं और
मेरे सपन के भारत में न तो ऐसी राजनीित होगी और न ही िकसी बेगनु ाह को अपने पर्ाण ऐसे रक्तपात में गंवाने
पड़ेंगे ।
हमारी भाषाओं के भेद यूँ हीं िमट जाएंगे, जैसे हम िबना भेदभाव िकए अपने वाद के िलए
कभी इडली-डोसा, कभी अमृतसरी छोले-भठू रे, कभी बीकानेर की भुिजया और कभी बंगाल के ठं डे रस-गु े
खा लेते हैं । उ र पर्देश का िकसान तब अपने तिमलनाडु के िमतर् से तिमल बात करके जैिवक खाद के बारे में
पता कर सके गा और क ड़-भाषी पंजाब में लोक-गीत को समझकर नाच सके गा ।
अनेकता एकता तो भारत की सं कृ ित रही ही है, ान-िव ान के क्षेतर् में भी भारत अपनी
पौरािणक गाथाओं में विणर्त रह गए आ य /आिव कार से बढ़कर िव -क याण के िलए नई तकनीक ,
दवाओं और अन्य कलाओं का जनक बनेगा । जैसा इितहास भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीिनयर ने िसिलकॉन वेली
में रचा है, उससे अिधक ये लोग अपने देश में सूचना और पर्ौ ोिगकी िवकास के िलए करें गे । िकसान को
मानसून की सटीक जानकारी िमल सके गी अन्यथा उन्हें ऐसी तकनीकें उपलब्ध ह गी, िजससे वह कम जल का
पर्योग करते हुए और नए िक म के बीज से अच्छी फसल पर्ा कर सकें । िकसान आज की तरह गरीबी और
भुखमरी के िशकार न ह गे और इसी तरह अपने जीवन तर को अन्य पेशे वाले लोग के समकक्ष ला सकें गे ।
अन्य कम्पिनय के िलए दवा उत्पादन करने के थान पर भारतीय िनगम वयं के अनुसंधान
और िवकास पर आधािरत नई पर्भावी दवाओं की खोज करें गे और िव को कु छ भयंकर बीमािरय से पर्भावी
प से िनजात िदला सकें गे ।
कला के क्षेतर् में भी देश एम.एफ. हुसनै , ए.आर.रहमान, अिमताभ ब न से आगे बढ़कर नए
चेहर को िव मंच पर िव - तरीय पहचान देगा । सािहत्य के नोबेल पुर कार पि मी देशी तक सीिमत न
रहेंगे ।
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मेरे सपन का िहन्द ु तान िव -राजनीितक मंच पर एक मुख्य भूिमका िनभाएगा तथा िव में
शिक्तय के िवके न्दर्ीकरण में सहायक होगा । िव में अपने िमतर्तापूणर् यवहार होने के आधार पर भारत िव
शांित थािपत कराने वाला अगर्णी देश होगा । सभी पड़ोसी देश से संबंध में िनरंतर सुधार लाने के िलए िकए
जा रहे पर्यास से महत्वपूणर् उपलिब्धयां पर्ा करने में मेरा देश सक्षम होगा जो आगे मेरे सपन के भारत की
पर्गित के मील के पत्थर ह गे ।
िजस देश में वृक्ष को भी पूजा जाता हो, वह देश भला अपने पयार्वरण का ध्यान क्य न
रखेगा । जबिक दिु नया भर के देश पयार्वरण संबंधी सम याओं- पर्दषू ण, िव तापकर्म का बढ़ना आिद से
िचंितत हैं, मुझे िव ास है िक मेरे सपन का िहन्द ु तान इन सम याओं से ठीक समय पर पिरिचत हो गया है और
वह िवकास और औ ोिगकीकरण की अंधी दौड़ में शािमल न होकर अपने पयार्वरण और पिरि थितक संतल
ु न
पर िवशेष ध्यान देगा । वन्य जीवन के लु होने जैसी घटनाएं यहां घिटत नहीं ह गी । िव भर से लोग जैिवक
िविवधताएं देखने यहां आएंगे और अपने देश में पयार्वरण संतल
ु न लाने के िलए पर्ेिरत ह गे । यहां िहमालय
पर्दिू षत न होगा और गंगा, यमुना वच्छ, िनमर्ल व पिवतर् रहेंगी ।
मेरे देशवािसय के यिक्तगत और सामािजक गुण को देखते हुए, खुली आंख से देखा अपने
देश के िलए यह सपना, सपना नहीं लगता । िहन्द ु तान सक्षम है मेरे और देश के सपन का िहन्द ु तान बनने के
िलए ।
ी दीना नाथ, उ ेणी िलिपक, यय िवभाग, िव मंतर्ालय
इस िनबंध को वषर् 2007 के िहन्दी पखवाड़े के दौरान आयोिजत िनबंध पर्ितयोिगता में पर्थम पुर कार िदया गया ।
िजस रा टर् की अपनी कोई भाषा नहीं,
उसका अपना कोई भिव य भी नहीं है । बि क
यूं किहए िक वह गंगू ा है ।
मुंशी पर्ेमचन्द
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किवता
िहन्दी कै से आएगी
पर्ेरणा, पर्ोत्साहन और स ाव से,
कु छ अपने यिक्तगत पर्भाव से,
जनमानस में जग रहे वभाव से,
िहन्दी आ रही है ।
पतर् फाइल में ही नहीं, शोध सं थान में,
आकाशवाणी, दरू दशर्न और सभागार में,
िफ मी दिु नया से सबके िदल-िदमाग में,
िहन्दी छा रही है ।
थोड़ी सी ज रत है अभ्यास कराने की,
िजन्हें आती है उनसे पर्योग कराने की,
संिवधान, िनयम, अिधिनयम बताने की,
िहन्दी कायर्शाला चलाने की ।
व थ पधार् जगे जब सबके मन में,
होड़ लग जाएगी तब जन-जन में,
वकायर् सहजता से करके िहन्दी ला सकें गे,
समूचे वतन में ।
अब और िवलम्ब न कर, आज से ही,
िहन्दी में काम करने का त लें,
आइए, कु छ कर िदखाइए यह न सोिचए िक,
िहन्दी कै से आएगी ।।
डा. भगवान दास पटरैया
पूवर् मुख्य अिभयंता, के न्दर्ीय जल आयोग ।
यय पित्रका
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लेख
िहन्दी संयुक्त रा टर् में
कु छ समय पहले
संयक्त
ु रा टर् संघ के मुख्यालय न्यूयाकर् में
आठवां िव िहन्दी सम्मेलन हुआ ।
सम्मेलन के समापन पर िवदेश से िहन्दी
के पर्चार-पर्सार को बढ़ावा देने संबंधी
10 सुझाव के अलावा िहन्दी को संयक्त
ु
रा टर् की आिधकािरक भाषा के प में
मान्यता देने पर बल िदया गया और इस
िदशा में भारत सरकार से तेजी से
कारर् वाई करने का आगर्ह भी िकया
गया । सम्मेलन के पर्ारं भ होने से पहले
पर्धानमंतर्ी डा. मनमोहन िसंह के संदश
े
में भी इस बात पर जोर िदया गया िक
िहन्दी को संयक्त
ु रा टर् में आिधकािरक
भाषा के प में मान्यता िमले ।
इसमें दो राय नहीं िक
संयक्त
ु रा टर् में भारत की भूिमका को
देखते हुए और देश तथा िवदेश में िहन्दी
की उपि थित को देखते हुए उसे
आिधकािरक भाषा के प में मान्यता
िमलनी ही चािहए परन्तु इस संबंध में हमें दो बात पर ध्यान के िन्दर्त करना होगा । पहला, संयक्त
ु रा टर् में िकसी
भाषा को आिधकािरक मान्यता िदए जाने के बाद होने वाला खचर् और दसू रा, ऐसे िकसी पर् ताव की मंजरू ी के
िलए संयक्त
ु
ु रा टर् के पर्िकर्या िनयम 51 में संशोधन के िलए सद य देश के बहुमत का समथर्न । चूंिक संयक्त
रा टर् में िकसी भाषा को आिधकािरक भाषा का दजार् देने से संयक्त
ु रा टर् का खचर् काफी बढ़ जाता है और
इसिलए इस खचर् को वहन करने का दाियत्व संयक्त
ु रा टर् नहीं उठाता बि क यह दाियत्व संब देश का होता
है । इसिलए संयक्त
ु रा टर् में िहन्दी को आिधकािरक भाषा के प में मान्यता िमलने की ि थित में भारत को
पर्ारं भ में अनुवाद, ि भािषया, टेशनरी, कायार्लय, कम्प्यूटर, संचार साधन और कमर्चािरय की िनयुक्त में
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लगभग 1 अरब पए की भारी-भरकम रािश खचर् करनी पड़ेगी । इसिलए भारत िकस सीमा तक यह खचर्
उठाने की ि थित में होगा और कहां तक यह खचर् करना पर्ासंिगक होगा, यह एक िवचारणीय िवषय है ।
शु आती खचर् के बाद आगे पिरचालन खचर् को उठाने की िजम्मेदारी संयक्त
ु रा टर् की होती है लेिकन इस मु े पर
भी सद य देश में पर्ायः मतभेद रहते हैं । यहां यह उ े खनीय है िक संयक्त
ु रा टर् का कामकाज चलाने हेतु िव ीय
यव था सद य देश ारा िकए जाने वाले अंशदान से होती है और िजसमें भारत का थान 10वां है जबिक
अमरीका पहले नम्बर पर है । जहां तक िहन्दी के पक्ष में बहुमत जुटाने का संबंध है, संयक्त
ु रा टर् में इस समय
191 सद य देश हैं । इसका तात्पयर् यह है िक कम से कम 96 देश के समथर्न की हमें दरकार होगी जो मौजूदा
हालात में संभव पर्तीत नहीं होता । इसका संकेत पर्धानमंतर्ी के िवशेष दतू डा. कणर् िसंह ने सम्मेलन के समापन
अवसर पर िदया । उनका मत था िक भारत संयक्त
ु रा टर् महासभा में इस आशय का पर् ताव तभी पेश करे गा जब
उसे इसके पािरत होने की आशा होगी और इसमें अभी समय लगेगा । गौरतलब है िक भारत ने इससे पहले
जमर्नी, जापान तथा बर्ाजील के साथ िमलकर जी-4 के प में संयक्त
ु रा टर् सुरक्षा पिरषद में थायी सद यता
हेतु भी आवेदन िकया है और िजसके संबंध में मौजूदा 5 थायी सद य के बीच सवर्सम्मित कायम न होने से
यह मामला अधर में लटका है और कोई भी सद य अपने वीटो का पर्योग कर भारत के थायी सद यता के दावे
को िन फल करने की सामथ्यर् रखता है । य िप, "संयक्त
ु रा टर् में िहन्दी" और "सुरक्षा पिरषद में भारत की
थायी सद यता" ये दोन िभ -िभ पहलू हैं परन्तु ये एक दसू रे से जुड़े हुए हैं । अभी संयक्त
ु रा टर् में 6
भाषाओं- चीनी, अंगर्ेजी, पेिनश, फर्ेंच, सी और अरबी भाषाओं को मान्यता िमली है िजनमें अरबी तथा
पेिनश भाषा को छोड़कर शेष भाषाएं सुरक्षा पिरषद के थायी सद य की आिधकािरक भाषाएं हैं जबिक
संयक्त
ु रा टर् में कामकाज की भाषा अंगर्ेजी तथा फर्ेंच है । यह भी उ े खनीय है िक संयक्त
ु रा टर् की मौजूदा
मान्यता पर्ा भाषाओं में चीनी भाषा को छोड़कर िजसके बोलने वाल की संख्या लगभग 87 करोड़ 40 लाख
है, शेष अन्य भाषाएं िहन्दी से पीछे हैं । िहन्दी देश में 70 करोड़ और िवदेश में करीब 10 करोड़ लोग ारा
बोली जाती है । जबिक अरबी मातर् 20 करोड़ 60 लाख लोग ारा बोली जाती है । एक अनुमान के अनुसार
अरबी और फर्ेंच के मुकाबले बँगला और तिमल भाषा बोलने वाल की संख्या ज्यादा है । यहां यह पर् भी
िवचारणीय है िक अभी तक संयक्त
ु रा टर् में िजन भाषाओं को आिधकािरक मान्यता िमली है, उसमें अंगर्ेजी को
छोड़ दें तो शेष भाषाओं की ि थित क्या है । िहन्दी के पिरपर्े य में भी इस पर िवचार िकया जाना ज री है ।
जहां तक िवदेश में िहन्दी के पर्चार-पर्सार का संबंध है, मौजूदा वै ीकरण के दौर में मुक्त
बाजार अथर् यव था में िहन्दी वतः िवदेश में आगे बढ़ेगी और वह िकसी की मोहताज नहीं है । आज िवकिसत
देश अपने उत्पाद को बेचने हेतु भारत को एक बड़े बाजार के प में देखते हैं और उनके उत्पाद ने भारतीय
बाजार में अपनी धूम मचाई है । इसिलए उन्हें यह भली-भांित ात है िक भारतीय उपभोक्ता से आत्मसात होने
हेतु उसकी जुबान को अपनाना और उसकी भाषा में काम करना एक अिनवायर् शतर् है । चीन का उदाहरण हमारे
सामने है उसने वै ीकरण की बयार में पीछे छू टने की आशंका से िकतनी तेजी से अपनी चीनी भाषा के अलावा
पर्ाइमरी तर से ही अंगर्ेजी के अध्ययन की यव था की है ।
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िहन्दी को जब िवदेश
में पर्िति त करने का पर् उठता है तो
हमें इसके दसू रे पहलू पर भी गौर
करना होगा यािन भारत में िहन्दी की
मौजूदा ि थित क्या है हमें इस बात को
वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होना
चािहए िक िवदेश में जब हम िहन्दी
को पर्िति त करने की बात करते हैं तो
हमारी ि थित "बगल में छोरा नगर
िढंढोरा" स श होती है यानी अपने
देश में दोयम दजार् पर्ा िहन्दी का
िढंढोरा हम िवदेश में पीटते हैं परंतु
वदेश में िहन्दी की वा तिवक ि थित
के बारे में िवचार नहीं करते । यह
ि थित िनि त तौर पर शोचनीय है ।
अन्यथा क्या कारण है िक संघ की
राजभाषा िहन्दी घोिषत होने और
आजादी के 60 वषर् गुजर जाने पर भी
आज सारा कामकाज अंगर्ेजी में हो
रहा है और के वल िहन्दी
सभा/सम्मेलन
या
िहन्दी
पखवाड़ा/स ाह या िहन्दी िदवस के
अवसर पर ही उसकी भरपूर दहु ाई दी जाती है । यहां इस बात पर भी गौर करना ज री है िक भारत में िहन्दी
स ाह/पखवाड़ा मनाने का क्या औिचत्य है ? िव में कौन सा देश जो अपनी भाषा के पर्चार-पर्सार और
पर्ोत्साहन हेतु इस आशय के िदवस आयोिजत करता है । संभवतः कोई नहीं । क्या ऐसे आयोजन कर हम देश
की राजभाषा िहन्दी के साथ वा तव में न्याय कर रहे हैं ? ऐसा करके हम क्या राजभाषा िहन्दी को वषर् भर में
के वल स ाह/पखवाड़े में बाँध कर नहीं रख रहे हैं जबिक राजभाषा के प में िहन्दी का साल भर में पर्योग
होना चािहए । इसिलए हमें इस दोहरे मापदंड से बचना होगा और यिद हम राजभाषा के प में िहन्दी को
पर्िति त करने हेतु वाकई गंभीर हैं तो हमें इसके मागर् में बाधक कारण की पहचान कर उनका समाधान ढू ढं ना
होगा ।
िहन्दी की यह िवडम्बना रही है िक उसे सदैव अंगर्ेजी भाषा के िवरोधी के प में देखा गया
िजसका पर्माण हमें समय-समय पर दिक्षण राज्य में िहन्दी के पर्ित बरती जा रही असिह णुता के तौर पर देखने
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को िमलता है । जबिक हकीकत यह है िक िहन्दी का िवरोध िकसी भाषा के पर्ित नहीं रहा बि क उसने अंगर्ेजी
के साथ-साथ अन्य पर्ांत की क्षेतर्ीय भाषाओं से शब्द लेकर अपनी उदारता का ही पिरचय िदया । इसिलए हमें
िहन्दी के पर्ित इस पूवार्गर्ह से मुक्त होना पड़ेगा । यहां हम इस बात को भूल जाते हैं िक िहन्दी को रा टर्भाषा
बनाने की पहल महात्मा गांधी और रवीन्दर् नाथ टैगोर सरीखे अिहन्दीभाषी महापु ष ने की थी ।
िहन्दी को राजभाषा घोिषत करने के बाद देश में राजभाषा के प में िहन्दी के िवकास के िलए
गृह मंतर्ालय के अधीन राजभाषा िवभाग अिधकािरय की िनयुिक्त कर उन पर यह िजम्मेदारी डाल दी गई िक वे
सरकारी कामकाज में िहन्दी के अिधकािधक पर्योग को सुिनि त करें जबिक यवहार में मंतर्ालय और िवभाग
में इसी के समानान्तर मूलतः सारा सरकारी कायर् अंगर्ेजी में हो रहा है । जहां ि भाषी प में संसद में या राज्य से
पतर् यवहार की सांिविधक बाध्यता है, वहां अनुवाद कराकर खानापूितर् की जाती है । संसदीय राजभाषा सिमित
के िनरीक्षण में भी इस बात पर गौर नहीं िकया जाता िक िहन्दी के पर्गामी पर्योग में लगे टाफ के समक्ष आिखर
िदक्कतें कहां आ रही हैं, उनकी कायर् की दशाएं क्या हैं और उनका समाधान िकस पर्कार से िकया जाए । सिमित
राजभाषा िवभाग ारा पर्ितवषर् तैयार िकए जाने वाले िहन्दी की पर्गित से संबंिधत वािषर्क कायर्कर्म में िनधार्िरत
ल य के मकड़जाल में उलझ कर रह जाती है । इसिलए सरकारी कामकाज में िहन्दी के पर्गामी पर्योग हेतु यह
िनतांत आव यक है िक अिधकतम कामकाज अंगर्ेजी के बजाय िहन्दी में ही मूल प में िकया जाए, जहां संदहे
की गुंजाइश रहे वहां राजभाषा िवभाग का सहयोग िलया जाए । यह कै सा िवरोधाभास है िक आज भी हम आम
आदमी को उसकी भाषा में न्याय नहीं िदला सकते और न्यायालय की कामकाज की भाषा अंगर्ेजी के यामोह
में जकड़ कर रह गई । इसी पर्कार कृ िष पर्धान देश में िकसान को भी उसकी भाषा में कृ िष संबंधी अनुसंधान
तथा जानकारी देने का पर्यत्न भी हमने नहीं िकया । िनःसंदहे राजभाषा के प में िहन्दी को हम वा तव में
सरकारी कामकाज में अपनाते तो उससे िहन्दी का सहज, सरल और बोधगम्य प हमारे सामने आता और उस
पर अनुवाद की िक्ल ता, उबाऊपन और बेजान होने का आरोप भी नहीं लगता ।
यह तथ्य है िक भाषा संबंध देश के नागिरक की भावना तथा मानिसकता से जुड़ा है िजसके
िलए सांिविधक बाध्यता कोई मायने नहीं रखती । इसिलए सरकार के साथ उसके कमर्चािरय और अिधकािरय
को भी अपने तर से सरकारी कामकाज में अिधकािधक िहन्दी के पर्योग को बढ़ावा देना होगा । इसके अलावा
िहन्दी को हमें आजीिवका से भी जोड़ना होगा । हमें इस बात पर भी गौर करना होगा िक िजस िहन्दी के पठनपाठन का गुणगान हम िवदेशी िव िव ालय में करने से नहीं थकते वहीं अपने देश के िव िव ालय में िहन्दी
पढ़ने वाले छातर् का टोटा क्य है और वे िहन्दी को क्य हेय ि से देखते हैं ? कई पिब्लक कू ल में तो
कू ली समय में िहन्दी बोलने पर ही पाबंदी लगा दी जाती है । देश में समान कू ली िशक्षा की वकालत करने
वाले बु जीिवय , िशक्षािवद और मनोवै ािनक का प मत है िक पर्ाथिमक चरण में यिद ब े को उसकी
मातृभाषा में िशक्षा दी जाए तो वह ज्यादा कारगर होती है । परन्तु इस िदशा में आज तक कोई पहले नहीं की
गई । हमें िहन्दी सािहत्य के पठन-पाठन की ि थित और उससे जुड़े सािहत्यकार की ि थित पर भी ध्यान देना
ज री है । आज िपर्ंट मीिडया, दरू दशर्न और बालीवुड ारा िहन्दी के पर्चार-पर्सार में िजस सहयोग की बात की
जा रही है उसकी व तुि थित क्या है । आज िकतने अख़बार ऐसे हैं िजनमें िहन्दी सािहत्य की चचार् होती है या
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उससे संब िनयिमत तंभ पर्कािशत होते हैं । दरू दशर्न में परोसे जाने वाले िहन्दी चैनल की ि थित से हम सभी
पिरिचत हैं । बालीवुड में अिभनेता और अिभनेितर्य ारा यवहार में िहन्दी कहां तक अपनाई जा रही है, यह
वा तिवकता भी हमारे सामने है । उनके ारा साक्षात्कार तक सदैव अंगर्ेजी में िदए जाते हैं । इसिलए िहन्दी के
अिधकािधक पर्योग हेतु उससे भावात्मक प से जुड़ना भी समान प से ज री है । वै ीकरण के मौजूदा दौर में
आज जबिक देश में सेवा क्षेतर् तेजी से फल-फू ल रहा है तो वैसी ि थित में हमें इस बात की संभावना भी
टटोलनी होगी िक इस क्षेतर् में िहन्दी का उपयोग िकस तर पर और कहां तक यवहायर् है । हम इस स ाई से
भी मुहं नहीं मोड़ सकते िक वैि क वीकायर्ता की वजह से अंगर्ेजी का जो वचर् व है, भी हमें उसी के साथ
कदमताल िमलाकर चलना होगा । परन्तु साथ में यह भी ध्यान रखना होगा िक िहन्दी वदेश में िजस थान की
अिधकािरणी है, पहले उसे वहां पर्िति त करना भी हम भारतीय लोग का परम कतर् य है और तभी शायद
िवदेश में इस पर्कार के िहन्दी सम्मेलन के आयोजन की साथर्कता भी िस होगी ।
िगरीश चन्दर् पाण्डेय,
ई-3/3, सेक्टर-16, रोिहणी, िद ी-85
भाषा िसफर् भाव की अिभ यिक्त नहीं, बि क
लोक मानस को एक सतर्ू में बांधने का सशक्त जिरया भी
है । इस िलहाज से अगर आपकी लोक-भाषा सरकारी
कामकाज की भाषा नहीं है, तो यकीन मािनए िक आपका
लोकतंतर् भी अधरू ा है ।
लोठार लुत्से
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िवशेष संदभर्/द तावेज
लक्ष ीप का बौ अतीत
मोहम्मद हनीफा लक्ष ीप
के सम्मािनत िश पी और िचतर्कार हैं ।
1971 में जब उनकी उमर् लगभग बारह
साल थी, कवर ी ीप में िकसी भवनिनमार्ण के िलए हो रहे एक उत्खनन के कर्म
में एक मूितर् का िशरोभाग िमला । ीप की
पूरी आबादी उस मूितर् को देखने के िलए
वहां उमड़ पड़ी । तब उस ीप की आबादी
दो हजार से अिधक नहीं रही होगी । देखने
वाल में बालक हनीफा भी था । हनीफा
देखते ही पहचान िलया िक वह बु की
पर्ितमा है । हनीफा को यह भी याद आया
िक वह वष से ऐसी मुखाकृ ित अपने सपन
में देखता रहा है । उसके पिरवार वाल के
िलए यह अचरज की बात थी क्य िक बु
के िवषय में उसे कभी िकसी ने न तो बताया था, न ही उसने कभी उनका कोई िचतर् देखा था । मोहम्मद हनीफा
आज भी अपने बचपन की बौ मृितय से रोमांिचत हो उठते हैं । कु छ वषर् पहले उन्ह ने उस बौ अवशेष के
उत्खनन को एक रे खािचतर् अपनी संक पना और कलात्मक स दयर् की ि से अ तु है ।
मोहम्मद हनीफा के बौ संबंध का िव े षण तो उस घटनाकर्म से करना किठन लगता है, पर
लक्ष ीप के बौ अतीत के अध्ययन िव े षण के एक नए अध्याय का आरम्भ अव य इस घटनाकर्म से होता
है । यह एक अलग िव े षण का संदभर् है िक इस नए अध्याय को िजतनी अगंभीरता से िलया जा सकता था
अब तक उतनी ही अगंभीरता से िलया गया है । लक्ष ीप समूह के सभी ीप को िमलाकर कु ल आबादी साठ
हजार के आसपास है । यह आबादी देखने में िजतनी भी छोटी लगे, अरब सागर के इन ीप का यापािरक एवं
सामिरक महत्व हजार वष से रहा है । लोक का भावनात्मक संबंध अतीत के िजन िह स से होता है, वे अपनी
समगर्ता में वहां कं ठहार बनकर सुरिक्षत हैं- लोककथाओं, लोकगीत एवं अनु िु तय में । परन्तु, इितहासिववेक की अपेक्षाओं की ि से लक्ष ीप के बौ सा य को तकर् पूणर् ढंग से कालसूतर् में अनु यूत कर भारत के
इन सुन्दर पर्वाल ीप की िवकास यातर्ा के रह य को उ िटत करना ही होगा ।
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अरब सागर में िबखरे हुए लक्ष ीप के पर्वाल ीप जलरािश में िबखरे हुए रं गीन मोती से िदखते
हैं । नीले और हरे रंग के सभी संभव शेड इन पर्वाल ीप के सुिव तृत लैगून में अठखेिलयां करते रहते हैं । इन
लैंगून की पर्वालिभि य एवं जलशैल पर पर्ाकृ ितक प ीकारी के अ तु नमूने उत्कीणर् हैं, और इन जलशैल ,
पर्वालिभि य एवं उथली जलरािशय के बीच का जैव संसार भी अ तु है । यहां के पर्वाल एवं यहां की
मछिलय के रंग दशर्क के समृितकोष के अक्षय भंडार बन जाते हैं । दरू से अथवा हवाई मागर् से देखने पर इन
ीप पर बस नािरयल पेड़ का सामर्ाज्य िदखता है । इन ीप के िकनारे उ वल-धवल िदखते हैं । िम ी के
नाम पर इन ीप में पर्वालरज के अितिरक्त कु छ है भी नहीं । हजार साल से अरब सागर के मागर् होकर जाने
वाले यापारी अथवा यातर्ी शायद ही इन ीप पर ककर अपनी थकान दरू करने के लोभ का संवरण कर पाए
ह गे ।
लक्ष ीप के
सुन्दर पर्वाल ीप िसफर् अपनी
पर्ाकृ ितक सुषमा की ि से
महत्वपूणर् नहीं थे । इनका
वािणिज्यक महत्व भी सिदय से
रहा है । पहली सदी की पु तक
"पेिर स ऑफ द एिरिथर्यन सी"
एवं अन्य पि मी वािणिज्यक
द तावेज के अनुसार मालाबार
तट से मसाल के अलावा बड़े
पैमाने पर कछु ए की खोपड़ी और
कौड़ी भी अरब एवं अन्य पि मी
देश को िनयार्त होते थे । ये
कौड़ी और कछु ए मालाबार के यापािरय को कालपेनी जैसे ीप से ही उपलब्ध होते ह गे । के रल के तट
कोडंग ू र और लक्ष ीप के कालपेनी जैसे ीप के बीच आवागमन का यह एक पर्मुख कारण रहा होगा ।
भारतीय समुदर् याितर्य के िलए तो यह संपकर् बहुत पुराना था ही, पि मी देश और अरब के यापािरय के िलए
भी इन ीप का महत्व तब और बढ़ गया, जब उन्हें मानसून हवाओं के यापािरक महत्व का पता चलता,
पहली सदी ई. में । (पि मी ोत में गर्ीक यातर्ी िहप्पॉलस को 45 ई. में मानसून हवाओं की खोज का ेय
िदया जाता है ।) भारतीय नािवक को इन हवाओं की जानकारी पहले से ही थी और इन हवाओं का सहारा
लेकर वे सिदय से यापार करते आ रहे थे । भारत के पूवीर् तट से उड़ीसा से आरं भ होने वाली "बाली यातर्ा"
की पर्ाचीन परं परा भी मानसून से ही जुड़ी हुई है । काितर्क पूिणर्मा, जो िक शीतकालीन मानसून के दौरान पड़ता
है, के िदन उड़ीसा के यातर्ी यापारी और समुदर्ी यातर्ा पर िनकलते थे । िहन्द महासागर में समुदर्ी यापार का
आरंभ अन्य महासागर की तुलना में सिदय पहले हुआ और यापार की मातर्ा की ि से भी इस महासागर की
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तुलना िकसी अन्य महासागर से नहीं हो सकती थी । इसमें भारतीय यापािरय और व तुओ ं की भागीदारी ही
अिधक थी ।
अब अरब और गर्ीक यापारी लम्बे और घुमावदार पुराने रा ते को छोड़कर सीधे अरब सागर
से गर्ी म मानसून की हवा का सहारा लेकर यापार के िलए भारतीय तट की ओर िनकलते और िफर
शीतकालीन मानसून का सहारा लेकर वापसी करते । एक अनुमान के मुतािबक मानसून की हवाओं का सहारा
लेकर अदन की खाड़ी से चला जहाज चालीस िदन में के रल के तट पर जा लगता । यही दरू ी पहले लगभग तीन
महीन में पूरी होती थी । यह नया यापािरक मागर् लक्ष ीप समूह के ीप से लेकर गुजरता था और बहुत संभव
है िक लंबी और थका देने वाली
समुदर्ी यातर्ा में ये ीप िव ाम और
रसद के के न्दर् बन गए ह गे । समुदर्ी
यातर्ा के िदशा-संकेत की अपु
तकनीक के उस युग में ये ीप
मील के पत्थर बनकर भी सामने
आए ह गे याितर्य के िलए ।
बौ मत
का
पर्ाचीन यापािरक माग से गहरा
संबंध रहा है । समुदर्ी यापािरक
माग के संदभर् में इस संबंध का
महत्व और भी पिरलिक्षत होता है,
िवशेषकर, भारतीय पिरपर्े य में ।
मृित-गर्ंथ में समुदर्ी यातर्ा का िनषेध था और लेन-देन के ऐसे कु छ पर्कार का भी जो यापार के िलए
अनुकूल नहीं माना जा सकता । बौ मत ने इन वजर्नाओं को वीकृ ित नहीं दी और इस कारण यह वाभािवक
था िक समुदर्ी यातर्ा करने वाले और यापारी बौ मत के पर्ित अपनी सहानुभिू त और ा रखते । राजकीय
संरक्षण में बौ मत के िलए भेजे गए िवशेष अिभयान की संख्या बहुत नहीं थी और ीलंका जैसे कु छ
उदाहरण को छोड़ दें, तो अन्य देश में बौ मत के पर्सार में आम जनता के आपसी संपकर् अिधक पर्भावी
रहे । इस संपकर् के माध्यम िनि त प से यापारी और समुदर्ी यातर्ी थे । यह मत न िसफर् बौ मत के िवदेश में
पर्सार से पु होता है, अिपतु भारत में यहूदी मत, ईसाइयत और इ लाम का आगमन भी ऐसे ही संपक से
बनता िदखता है । भारत का पि मी तटीय क्षेतर् का के रल ही सबसे पहले यहूदी मत, ईशाइयत और इ लाम के
संपकर् में आया, क्य िक इस क्षेतर् का संबंध अरब और पि मी देश से समुदर्ी यापािरक संबंध से सिदय से
जुड़ा हुआ था । कहने की आव यकता नहीं िक भारत का पि मी तट एवं अरब सागर के भारतीय ीप हजार
वष से िव सभ्यता में हो रहे पिरवतर्न एवं पर्योग के गवाह रहे हैं ।
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लक्ष ीप के बौ अतीत
की किड़यां मौयर्काल से भी जोड़ी जा
सकती हैं । वैसे तो ीलंका और भारत के
बीच संबंध के सा य मौयर्पवू र् के भी िमलते
हैं, जब वतर्मान िबहार से िवजय नामक
राजकु मार ने ीलंका में जाकर िसंहली
वंश-परम्परा की नींव डाली । मौयर्काल में
अशोक के राज्यािभषेक की सूचना िमलने
पर समकालीन िसंहली शासक ित स ने
अशोक के िलए उपहार शुभकामना संदश
े
भेजे । अशोक ने पर्त्यिभवादन व प ित स
के राज्यािभषेक के िलए अिभषेक सामगर्ी
भेजी और साथ ही अनुकम्पा एवं सौहादर् के
पर्तीक के प में उसे देवानािम्पयद सी की
अपनी उपािध भी दी । सा य के अनुसार,
इससे पहले ीलंका में राज्यािभषेक की कोई
परम्परा नहीं थी । अशोक ने धम्म वीकार
करने बाद और तृतीय बौ संगीित की
अपेक्षाओं के अनु प पुतर् महेन्दर् को धम्म
पर्चार के िलए ीलंका भेजा । उसके बाद महेन्दर् का संदश
े िमलने पर पुतर्ी संघिमतर्ा को भी अशोक ने वहां
भेजा, साथ ही बोिधवृक्ष की दिक्षणी शाखा भेजी और भगवान बु के कई मृित िच भी भेजे । इसके बाद भी
आगर्ह-पर्त्यागर्ह पर कई बौ धमर् यातर्ाएं ीलंका-भारत के बीच होती रही ।
इन यातर्ाओं की बारम्बारता में बौ धमर् के अनुयाियय का संपकर् लक्ष ीप समूह के ीप से
भी होना अपर्त्यािशत नहीं लगता । आज भी एण्डर्ोत ीप के
मुि लम संत की पर्ित ा ीलंका, मालदीव एवं अन्य
समीपवतीर् देश में है । ीलंका जैसे देश से लोग आज भी
धमर्-यातर्ाओं पर उन ीप में आते हैं और इन ीप से
मुि लम संत उन देश में धमर्-पर्चार के िलए जाते हैं । संभव
है, इस तरह के ही संबंध बौ धमर् के आधार पर भी रहे ह गे ।
लक्ष ीप की अनु िु तय के अनुसार वहां इ लाम का पर्चार
करने वाले अरब के मुि लम संत उबैद ु ाह लगभग हजरत
मुहम्मद के ही समकालीन थे , परन्तु शोध के आधार पर यह
लगभग पर्मािणत हो चुका है िक बारहवीं सदी से पहले
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लक्ष ीप में इ लाम का आगमन नहीं
हुआ था । ऐसे में दसवीं सदी के अरब के
पर्िस भूगोलवे ा अबू जायद का
िववरण इन ीप के इ लाम-पूवर् धमर् का
रोचक संकेत करते हैं । अपने िववरण में
इन ीप के िवषय में उन्ह ने िलखा है िक
ये अपने धमर् में गहरी आ था रखते हैं,
नए-नए ीप की खोज करते हैं, उन पर
नािरयल के पेड़ लगाते हैं, कु एं खोदते हैं,
िजसका पानी वे ीप से होकर जाने वाले
जहाज को बेचते हैं ।
भारत के तटीय क्षेतर् से
लगे ीप का उपयोग कालापानी के प
में भी पर्ाचीन काल से होता रहा है ।
अंडमान का कालापानी तो जगत पर्िस
है ही, भा जातक में भर् राजाओं के
िन कासन का संदभर् बहुत बार लक्ष ीप
से जोड़ा जाता है । िन कासन के साथसाथ शरण थली के प में भी इन ीप का उपयोग लंबे समय से होता रहा है । दिक्षण भारतीय इितहास में इन
ीप पर समुदर्ी लुटेर के शरण लेने के संदभर् बहुत बार आए हैं । पर, पर्कृ ित की रम्य उ ावनाओं के पर्तीक इन
ीप ने बौ -िभक्षुओ ं और बौ मत के अनुयाियय को भी आ य िदया । के रल तट से ीलंका के राजनियक
एवं बौ संबंध भी पर्ाचीन काल से रहे हैं । के रल में ीलंका के अनुराधापुरम की मुहर लगी आकृ ितयां िमली
हैं । ीलंका में बौ मत के आगमन के बाद िसंहल एवं तिमल आबादी के बीच पर्ितरोध बढ़ गए । यही नहीं,
बौ मत के अंदर भी थेरवािदय और महायािनय के बीच कई बार संपर्भुता के भीषण यु हुए । इन मतिवरोध
के दौरान ीलंका को कई बार घोर अराजकता के दौर से गुजरना पड़ा । ऐसे में बड़े पैमाने पर बौ -िभक्षु शरण
के िलए ीलंका से भारत की ओर पलायन कर जाते थे । महावंश एवं बौ मत के अन्य ोत इन पर् जन की
गाथा कहते हैं । शािन्त एवं ध्यान के आगर्ही िभक्षुओ ं ने िनि त प से तटीय पर्देश की तुलना में इन ीप को
वरीयता दी होगी ।
बौ मत के िलए इन ीप का महत्व तब और भी बढ़ गया, जब भारत के मुख्य भू-भाग से
कु मारिरलभ , आिदशंकराचायर्, उदयनाचायर् आिद ने शा ाथर् के बल पर बौ मत को लगभग िन कािसत सा
कर िदया । आठवीं-नवीं सदी से भारत में बौ मत के ास का आरं भ देखा जा सकता है । धीरे-धीरे बौ मत
भारत के तटीय पर्देश में िसमटने लगा, जहां दरू देश के बौ मत के अनुयाियय का संरक्षण यापार एवं समुदर्ी
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यातर्ाओं के कर्म में बौ िवहार एवं बौ समुदाय को िमलता रहा । िफर, जब इन तटीय पर्देश पर भी संगिठत
इ लाम एवं अन्य िवदेशी धम का पर्भाव थािपत होने लगा, तब बहुत संभव है िक बौ मत अगली कु छ
सिदय के िलए इन ीप पर िसमट गया होगा ।
संत उबैद ु ाह की
लक्ष ीप यातर्ा भी सामान्यतः
आकि मक मानी जाती है, परन्तु
यिद अरब सागर की गितिविधय
एवं अरब-फारस से भारत के
पि मी तट के संबंध के पिरपर्े य में
उसका िव े षण िकया जाए, तो
घटनाकर्म यवि थत नजर आता
है । बौ मत के पर्सार के कारण
दिक्षण-पूवर् एिशया से लेकर अदन
की खाड़ी और फारस की खाड़ी
तक सिदय एक सां कृ ितक आधार बना रहा था । बौ िवहार एवं बौ िभक्षुओ ं की उपि थित िभ पर्जातीय
इकाइय को एकसूतर् में कर लेती थी । िहन्दी महासागर के इन सभी बौ के न्दर् के बीच आवागमन एवं
सां कृ ितक आदान-पर्दान की बारंबारता इितहास के िविभ ोत में िववेिचत हैं । जब इ लाम ने मध्य एिशया
एवं पि म एिशया के बौ के न्दर् को अपने रंग में रंग िलया, तब पारंपिरक संबंध ने ही संभवतः इ लाम के
पर्सार को अन्य क्षेतर् में भी िदशा दी होगी । यह ऐितहािसक तथ्य है िक इ लाम का पर्सार आरं भ में बौ के न्दर्
में ही हुआ । धमर्-पर्सार की उसी परे खा में पारंपिरक संबंध के आधार पर संत उबैद ु ाह ने लक्ष ीप में धमर्पर्चार का उपकर्म िकया होगा । िजन माग से होकर बौ मत भारत से दिु नया के बाकी देश में गया था, उन्हीं
माग से इ लाम भारत में एवं अन्य देश में पहुचं ा । इस िव े षण से न िसफर् संत उबैद ु ाह की लक्ष ीप यातर्ा के
उलझे संदभर् सुलझते हैं, अिपतु इ लाम के आगमन से पूवर् के लक्ष ीप की धािमर्क आ था के अनुमान पर भी
िवराम लग जाता है ।
इन अनुमान पर िवराम के नए सा य हैं लक्ष ीप से िमले बौ अवशेष । वैसे तो आधुिनक
काल में 1964 में पहली बार कलपेनी में एक उत्खनन में िमि त धातु की एक चार इंच की बु पर्ितमा िमली
थी, िजस पर वणर्कारी भी की हुई थी । उसके बाद 1971 में कवर ी में बु -पर्ितमा के िमलने के बाद लगभग
डेढ़ दशक तक लक्ष ीप के अलग-अलग ीप में कई उत्खनन हुए और एण्डर्ोत, कलपेनी और िमनीकॉय से
पत्थर और धातुओ ं की कई बौ पर्ितमाएं िमलीं । परन्तु, इन पुराताित्वक अवशेष के इितहास- ोत की
संभावनाओं को अब तक कोई महत्व नहीं िदया गया है । जो िक अत्यंत दभु ार्ग्यपूणर् है । उत्खनन में पर्ा कु छ
पुराताित्वक सामगर्ी लोग की जानकारी के अभाव में उनके घर के आसपास िबखरे रहे और िफर धूल में िमल
गए और कु छ सामगर्ी अिधकािरय की उन अवशेष के एण्टीक महत्व की जानकारी के कारण उनके बहुमू य
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यिक्तगत संगर्ह में चली गई । इसका एक कारण लक्ष ीप में िकसी संगर्हालय का न होना भी कहा जा सकता
है । वतंतर्ता की वणर्-जयंती पर आगि में एक संगर्हालय की थापना से वह कमी दरू हो गई है । यहीं मई,
2003 में एण्डर्ोत से सभी बौ अवशेष लाकर रखे गए हैं । यहां सलाहकार के प में अपनी सेवाएं दे रहे डा.
जी.सी. चाउले बताते हैं िक संगर्हालय की तरफ से इस बात के पर्यास हो रहे हैं िक लक्ष ीप के सभी ीप में
जहां भी बौ मत से संब पुराताित्वक सामगर्ी उपलब्ध हैं, उन्हें यहां लाकर संरिक्षत िकया जाए ।
लक्ष ीप में बौ पुराताित्वक अवशेष की उपेक्षा का संबंध आज भारत में घटती जा रही
धािमर्क सिह णुता एवं बढ़ती साम्पर्दाियक भावनाओं से भी है । मोहम्मद हनीफा बताते हैं िक अयोध्या में
मि जद िगराए जाने के बाद थानीय ीप िनवािसय में बहुत हद तक यह बात घर कर गई िक यिद इन बौ
अवशेष के महत्व को अिधक पर्चािरत िकया गया , तो अन्य धम के संगठन का ह तक्षेप उनकी सं कृ ित एवं
थानीय जीवन पर पड़ेगा । वैसे, यहां इस बात का उ े ख करना आव यक होगा िक ीप िनवासी एम.पी.
कु नहुकोया और कोयम्मा कोया जैसे लोग का अथक पर्यासक ही है िक ये बौ अवशेष आज िजस भी हालत
में हैं, सुरिक्षत हैं । उन जैसे महानुभाव ने थानीय जनता को इन पुराताित्वक अवशेष के पर्ित जाग क बनाने
का भी पर्यास िकया तािक वे ऐसी सामिगर्य के िमलने पर उनकी उपेक्षा करने या उन्हें न करने के बजाय उनके
संरक्षण के िवषय में सोचें ।
संपर्ित अगि के वणर् जयंती संगर्हालय में जो बौ अवशेष संगृहीत हैं, वे सभी एण्डर्ोत ीप
से लाए हुए हैं । अपनी कला-शैली की ि से ये पर्ितमाएं गु ो रकाल की हैं । पुरातत्विवद का मानना है िक
ये पर्ितमाएं लगभग नवीं शताब्दी की हैं । सभी बु -पर्ितमाएं खंिडत हैं और कु छ के तो दजर्न टुकड़े हो गए हैं ।
इन पर्ितमाओं के खंड कई जगह अंदर से खोखले होते हैं । दरअसल, ये पर्ितमाएं लक्ष ीप की ही हैं । इन्हें यहीं
बनाया गया था कहीं बाहर से नहीं लाया गया था । अगि के िनवासी यू. साबजान बताते हैं िक ये बु पर्ितमाएं मो म से बनी हैं । मो म थानीय भाषा में समुदर् में पर्ाप्य पर्वालशैल को कहते हैं । ये पर्वालशैल
मूितर्िश प के अनुकूल होते हैं, क्य िक ये बड़े कोमल होते हैं और साथ ही साथ िटकाऊ भी । अमीनी ीप में
अभी भी पर्वालशैल पर नक्काशी करने वाले कलाकार हैं जो फू ल की िविभ आकृ ितयां उन पर उके रते हैं । यहां
से पर्ा सभी मूितर्य में दो परतें हैं । अंदर की थूल संरचना मो म से बना लेने के बाद उसके ऊपर पर्वालचूणर् से
ा टर की एक परत चढ़ा दी जाती थी और िफर उस पर अंग एवं भाव के सू म िववरण और अलंकरण
उत्कीणर् िकए जाते थे । सिदय से जमीन के नीचे दबे होने कारण और उत्खनन के दौरान एवं उसके बाद की
उपेक्षा के कारण इन मूितर्य की बाहरी परतें लगभग हट गई हैं । अगि का संगर्हालय भारतीय पुराताित्वक
सवेर्क्षण के सहयोग से इन मूितर्य के जीण ार की योजना बना रहा है ।
अगि में संगहृ ीत पर्ितमाओं में सबसे महत्वपूणर् है ध्यान मुदर्ा की बु पर्ितमा । यह पर्ितमा
आठ टुकड़ में खंिडत है । इस पर्ितमा का िसर गोलाकार है, पेट थोड़ा िनकला हुआ, गाल भरे हुए और जनेऊ
सी आकृ ित धड़ पर सुरिक्षत है । इस पर्ितमा को जोड़कर और पुराताित्वक तकनीक के ारा इसका उ ार कर
इसे िफर से जीवन्तता दी जा सकती है । शेष बु -मूितर्यां एक कमल आधार पर िशरोभाग तक ही बनी पर्तीक
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होती है । एक पर्ितमा का िसर गोलाकार न होकर लंबवत् हैं । कमल आधार के अलंकरण भी सभी मूितर्य में न
तो सम प हैं और न ही कलात्मक पिर कार िलए हुए हैं । बु के िसर की के शरािश भी कहीं दिक्षणावतर्, तो
कहीं उ रावतर् िक ये पर्ितमाएं थानीय कला-पर्ितभाओं ारा ही बनाई गई थीं ।
लक्ष ीप में अगि से सटा हुआ एक ीप बंगाराम । िव के सबसे सुन्दर ीप एवं लैगून में
शुमार है यह िनजर्न ीप बंगाराम । िकए.... बांगाराम...? बंगाराम.. ! यह नाम ही बौ इितहास के छातर् की
उत्कं ठा बढ़ा देने में सक्षम है । अफगािन तान में बेगाराम । ीलंका में अनुराधापुरम् में थूपाराम और
जेतवनाराम । राजगृह में तपोदाराम और जीवकाराम । पाटिलपुतर् में अशोकाराम । कौशाम्बी में घोिषताराम ....।
इितहास में ये सभी बौ िभक्षुओ ं के िनवास थान िवहार या आराम थे । क्या यह एक महज संयोग है या
आराम की परम्परा में एक अ ात बौ संघाराम बंगाराम के नाम से अरब सागर की जलरािश में िभक्षुओ ं की
ध्यान साधनाओं को समेटे है । आप एक बार बंगाराम की यातर्ा करें , आपको यह महज संयोग नहीं लगेगा ।
तटीय पर्देश में रहने वाले िभक्षुओ ं एवं सन्यािसय के चातुमार् य के िलए बंगाराम जैसे ीप से बेहतर थान क्या
हो सकता था ।
अरब सागर में पर्वाल के रंगीन सामर्ाज्य में नािरयल से आच्छािदत तीस से भी कम रम्य हिरत
ीप ने अपने अनंत पर्ाकृ ितक सुषमा के कारण ही लक्ष ीप का अिभधान पर्ा कर िलया । कु छ हजार की
आबादी के इस पर्वाल ीप समूह ने न जाने सभ्यता एवं सं कृ ित के िकतने अध्याय खुलते और िकतने बंद होते
देखे पर इन सभी अध्याय में बौ इितहास का चरण सबसे रोचक और घटनापूणर् रहा होगा, इसमें कोई संदहे
नहीं ।
ी अिखलेश झा, संयक्त
ु िनदेशक,
शासकीय लेखा एवं िव सं थान, यय िवभाग, िव मंतर्ालय ।
क्या आप जानते हैः"क" क्षेतर्- िद ी, उ र पर्देश, उ राखण्ड, िहमाचल, राज थान, मध्य पर्देश िबहार, हिरयाणा, झारखण्ड
तथा अंडमान एवं िनकोबार ीप
"ख" क्षेतर्- पंजाब, महारा टर्, गुजरात तथा चंडीगढ़ संघ शािसत क्षेतर् ।
"ग" क्षेतर्- तिमलनाडु , के रल, कनार्टक, आंधर् पर्देश, उड़ीसा, पि म बंगाल, मेघालय, िमजोरम, असम,
नागालैंड, मिणपुर, िसिक्कम, अ णाचल पर्देश आिद सभी पूव र व दिक्षण भारतीय राज्य ।
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किवता
आिखर क्य ?
रा ते बदल गए, मंिजलें बदल गई ं
हर वो चीज़ बदल गई, िजसका अफसाना पुराना था,
हर वो नाव बदल गई,
िजसका मांझी गाता तराना था ।
बैल की घंटी की गूंज,
टर्ैक्टर की गड़गड़ाहट में बदल गई ।
गेहूं फटकारने की झनकार
िबजली की मशीन की फटकार में बदल गई ।
गहरे प्यार का अहसास, ई-मेल के यापार में बदल गया ।
घंट बैठकर िलखा जाने वाला पतर्
मोबाइल पर तार बन गया ।
िसफर् , दिु नया में एक चीज़ नहीं बदली,
औरत की तकदीर नहीं बदली
आिखर क्य ?
सीता ने सतीत्व की खाितर
मयार्दाओं में रहते हुए
राम को मयार्दा पु षोतम बना िदया
िफर भी सीता को धिरतर्ी के अंक में
अपना अि तत्व खोना पड़ा ।
राधा ने पर्ीत की पीर सहते-सहते
कृ ण को पर्ेम सागर बना िदया,
िफर भी राधा को िचर-िवयोग सहना पड़ा ।
अिह या ने पित त्य की परीक्षा में
वयं को िनजीर्व, िन ल पाषाणी बना िदया
िफर भी अिह या को चिरतर् लांछन सहना पड़ा ।
आिद से अब तक
आिखर कब तक ?
आिखर क्य ?
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क्य औरत की तकदीर नहीं बदली
क्य , आज भी वह दसू र की गुलाम है,
जैसे दहेज के साथ िमला मुफ्त ईनाम है ।
क्य आज भी वह पुरानी पीड़ासे गर् त है ?
क्या उसके दःु ख का कोई अंत नहीं ?
क्य आज भी वह वतंतर् नहीं ?
क्य , आिखर क्य ?
आिखर क्य ?
सुदशर्न ढल, सहायक, यय िवभाग, िव मंतर्ालय
इस किवता को िहन्दी पखवाड़े 2007 के दौरान पर्थम पुर कार से सम्मािनत िकया गया ।
िचतर्ः मोिनका असवाल
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लेख
भर्ूण हत्याएं: गुम होती कन्याएं
पर्कृ ित ने ी व पु ष दोन
को समभाव से धरती पर िवकिसत िकया ।
आरम्भ में मानव ने भी अपने पर्यास से
िवकास के पायदान में मील का सफर तय
करके वतर्मान में िव ान और तकनीकी की
बुलिन्दय को छु आ है । ये सभी पर्यास मानव
ने अपने जीवन की उ रजीिवता तथा गुणव ा
को बढ़ाने के िलए िकए हैं । परन्तु अ ानतावश
िवकास की पर्िकर्या के दौरान वयं की
गितिविधय से अपने ही भिव य को खतरे में
डाल रहा है । इसके ज्वलंत उदाहरण
पयार्वरणीय सम या अथवा पर्दषू ण, जनसंख्या
वृि , िलंग िवभेद आिद कई ऐसे खतरे हैं जो
मानव जीवन के भिव य के िलए एक पर् िच
हैं ।
यिद हम भारत के संदभर् में
िवचार करें तो यहां की सं कृ ित में आिदकाल
से ही नारी की ि थित पूजनीय रही है अथवा
उसे देवी व प माना जाता है । परन्तु पा ात्य देश के अनुकरण, आधुिनकीकरण के कारण वतर्मान भारत में
ि य की ि थित बहुत अच्छी नहीं है । हमारे समाज में अभी भी कई ऐसी परं पराएं िव मान हैं िजनके ारा
िकसी ी के संतान न हो तो उसे समाज में ी का दजार् नहीं िमलता । यिद कोई ी बेटी पैदा करती है तो
उसे अधूरा माना जाता है, इसके िवपरीत यिद कोई ी पुतर् पैदा करती है तो उसका कद समाज में ऊँ चा हो
जाता है । आज भी यिद कोई ी संत, महात्मा, ऋिष-मुिन या पुजारी के पास आशीवार्द लेने जाती है तो उसे
जो आशीवार्द िमलता है वह है- "पुतर्वती भवः" ना िक "पुतर्वती भवः" । आज भी समाज में यह धारणा है
िक ी को मोक्ष पाने के िलए दसू रा जन्म लेना पड़ता है जबिक पु ष को मोक्ष की तभी पर्ाि होती है जब
उसका बेटा उसे मुखाि दे ।
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समाज में ी-पु ष को लेकर भेदभाव की पर्िकर्या गभार्व था से ही िलंग िवभेद को अनुभव
के ारा जानने का पर्यास करते थे । आज भी भारत के कु छ आिदम समाज में परम्परागत िविधय से गभर्पात के
तरीक का अध्ययन िकया जा रहा है । उदारहणतः परम्परागत भारतीय समाज में आज भी यह मान्यता है िक
यिद गभर्वती मिहला के पेट में यिद दाई ं तरफ हलचल है तो उसके पुतर् तथा बाई ं तरफ हलचल है तो उसके पुतर्ी
पैदा करने की संभावना रहती है । इस आधार पर ब े को जन्म िदया जाए या नहीं, इस िवषय पर भी िवचार
िकया जाता है । इस पर्कार पता चलता है िक गभर्पात को पर्भािवत करने वाले कारक बहुिवषयक हैं । िजनमें
सास की भूिमका, मां की भूिमका, पित की भूिमका, घर की सामािजक-आिथर्क ि थित, समाज िवशेष की
मान्यताएं आिद पर्मुख हैं । इन सबके आधार पर िकसी एक यिक्त को िजम्मेदार ठहराना अनुिचत है । क्य िक
एक ी अपने शरीर के महत्वपूणर् िह से को अथवा अपने गभर् में पल रहे िशशु को न करने में शारीिरक,
मानिसक दबाव के दौर से गुजरती है । अतः यह पर्िकर्या िकसी भी सामान्य नारी के िलए अत्यंत दख
ु दायी है ।
पर्धानमंतर्ी डा. मनमोहन िसंह ने 23 अग त, 2007 को एक भाषण में कहा था.... "नारी उत्थान उनके जन्म से
पहले से ही शु करना होगा और यह कतई वीकार नहीं है िक िकसी बेटी की भर्ूण हत्या कराई जाए ।"
मिहलाओं में महीने के दौरान सामान्यतया एक अंडाणु िनकलता है, िजसमें x गुणसूतर् पाया
जाता है, जबिक पु ष में दो तरह के शुकर्ाणु बनते हैं िजसमे x तथा y गुणसूतर् अलग-अलग शुकर्ाणुओ ं में
पाए जाते हैं । जब x गुणसूतर् वाला शुकर्ाणु अंडाणु से िनषेचन करता है तो इससे कन्या का जन्म होता है
जबिक y गुणसूतर् वाला शुकर्ाणु अंडाणु से िनषेचन करता है तो पुतर् पैदा होता है ।
मनु य में िलंग िनधार्रण
xx माता
अंडाणु x
xy िपता
xy शुकर्ाणु
x
xx पुतर्ी
xy पुतर्
सामान्यतया, लड़के तथा लड़िकय का अनुपात समाज में बराबर होता है । यिद िकसी पिरवार
में लड़िकय की संख्या ज्यादा है तो अन्यतर् िकसी दसू रे पिरवार में लड़क की संख्या ज्यादा होती है । इस पर्कार
पर्कृ ित लड़के तथा लड़िकय का अनुपात वयं िनधार्िरत करती है । लेिकन िव ान तथा तकनीकी िवकास हो
जाने के कारण मनु य िलंग िनधार्रण की पर्िकर्या को अ टर्ासोनोगर्ाफी की सहायता से गभार्व था में ही जान लेता
है । अ टर्ासोनोगर्ाफी सबसे आसान, स ती तथा अिधकांश जगह उपलब्ध तकनीक होने से आज यह आम
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लोग की पसंद बन गई है । इस तरह यिद गभर् में कन्या पल रही होती है तो उसका गभर्पात करवा िदया जाता
है ।
पहली जनसंख्या में पर्ित हजार पु ष पर ि य की संख्या 972 थी जो वषर् 2001 की
जनगणना में घटकर 933 हो गई । गभर् में िलंग जांच पर रोक लगाने वाले कानून का संशोिधत प 14 फरवरी,
2003 को देशभर में लागू हो गया है । अिधिनयम के उ ं घन पर दोषी को पाँच साल की जेल और 1 लाख
जुमार्ने का पर्ावधान है । देश में अपेक्षाकृ त समृ पि मी राज्य - पंजाब, हिरयाणा, चंडीगढ़, िहमाचल पर्देश,
महारा टर्, गुजरात में जहां आिथर्क िवकास दर, साक्षरता दर आिद पूवीर् राज्य की तुलना में अिधक है, िपछली
दो जनगणनाओं में यह िगरावट दर अपेक्षाकृ त कम है, जबिक िबहार, उ र पर्देश, पि म बंगाल, आंधर् पर्देश,
तिमलनाडु , कनार्टक आिद राज्य जो सामािजक और आिथर्क ि से अपेक्षाकृ त कम समृ हैं, में यह िगरकर
अपेक्षाकृ त कम है । इसका ज्वलंत उदाहरण भारत में कई राज्य जैसे- हिरयाणा, पंजाब, यू.पी. िबहार में
लड़िकय की घटती हुई संख्या है जैसा िक तािलका में देखा जा सकता हैःराज्य/के न्दर् शािसत पर्देश
पंजाब
िद ी
हिरयाणा
िहमाचल पर्देश
मध्य पर्देश
महारा टर्
िबहार
चंडीगढ़
गुजरात
उ र पर्देश
झारखण्ड
छ ीसगढ़
लक्ष ीप
के रल
िसिक्कम
ितर्पुरा
िमजोरम
यय पित्रका
- 2007-2008
सामान्य अनुपात (1991)
857
821
857
821
861
970
921
773
921
898
941
990
947
1058
875
950
938
35
वषर्
1901
1911
1921
1931
1941
1951
1961
1971
1981
1991
2001
पर्ित हजार लड़क पर अनुपात
972
964
955
950
945
946
941
930
934
927
933
भारत में तेजी से िगरते हुए िलंग अनुपात के पीछे कई धारणाएं, जैसे िक यिद लड़की पैदा
होती है तो वह घर के छप्पर को भी ले जाती है । िववाह में होने वाला खचर्, दहेज देना, शादी के बाद समयसमय पर ससुराल वाल ारा पैसे की मांग तथा पुतर् ारा िपंडदान, अि दान जैसी धािमर्क कमर्कांड सम्मत
मान्यताएं, िजनका कोई तािकर् क या वै ािनक आधार नहीं है, आिद समाज में फै ली पर्थाएं लोग को बेटी के
बजाय बेटा पैदा करने के िलए पर्ेिरत करती हैं । अगर धीरे -धीरे यही िसलिसला चलता रहा तो पर्कृ ित ारा
पर्द मनु य के िलंग िनधार्रण में असंतल
ु न आ जाएगा और दसू रा पिरणाम यह होगा िक मानव जीवन का
अि तत्व ही खतरे में पड़ जाएगा और िवलु होती नािरयां समाज के िलए चुनौती बन जाएंगी ।
समाज में फै ली हुई यह धारणा िक लड़की या लड़का का पैदा होना मां पर िनभर्र करता है, यह
िनतांत गलत है । यिद हम इितहास के प को उठाकर देखें तो हमें ऐसे कई उदाहरण िमल जाएंगे िजनमें यिद
िकसी पिरवार में िनरन्तर कन्याएं पैदा हो रही थीं तो वह राजा िकसी दसू री ी से िववाह इसिलए करता था िक
उसे अपना उ रािधकारी िमल जाए । लेिकन आज िव ान तथा तकनीकी िवकास ने यह सािबत कर िदया है िक
लड़की या लड़के का पैदा होना उसके िपता पर िनभर्र करता है, मां पर नहीं । आधुिनक समाज में ऐसी कु रीितयां
अभी भी या हैं िजनमें कन्या के पैदा होने पर पिरवार के लोग खुश नहीं होते । उसके पालन-पोषण में पुतर्
जैसा यवहार नहीं िकया जाता और इस तरह पिरवार में जन्मीं, पली-बढ़ी कन्या शारीिरक तथा मानिसक तौर
पर कमजोर हो जाती है । हैरत की बात यह है िक माना तो जाता था िक शैिक्षक, आिथर्क तथा सामािजक तर
बढ़ने पर इस तरह की कु रीितय पर लगाम लगेगी, लेिकन दरअसल इसका िब कु ल उलटा ही हो रहा है ।
िनरक्षर गर्ामीण आिदवासी समाज की तुलना में पढ़े-िलखे तथा-किथत सभ्य और सुसं कृ त पिरवार में यह
सम या कहीं अिधक पाई जा रही है ।
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अतः यिद हम अपने देश के िवकास के पर्ित िचिन्तत हैं तो सवर्पर्थम हमें समाज में लड़िकय
के िगरते हुए अनुपात तथा उनके साथ िकए जा रहे भेदभाव पर िचन्तन करना चािहए । यह एक जघन्य अपराध
है । समाज के सभी वग को िमलजुल कर इस बीमारी का िनराकरण करना चािहए । िचिकत्सक समुदाय एवं
आम जनता को जागृत कर हमें इस मुिहम को सफल बनाने में अपना योगदान देना होगा । लड़की को समान
भाव से समाज में थान िदलाना चािहए तथा वो सारी सुिवधाएं जो पुतर् को समाज में दी जाती है, पुतर्ी को भी
मुहय्ै या करानी चािहए । अंत में यही कहा जा सकता है िक गभर् थ बािलका को मारने की पर्था पूरे समाज के
िलए अिभशाप है, कलंक है, इसे अिवलम्ब बंद िकए जाने की आव यकता है ।
जय पर्काश यादव,
आशुिलिपक, यय िवभाग, िव मंतर्ालय ।
रे िग तान का जहाज
िचतर्ः मोिनका असवाल, दसू री कक्षा, के न्दर्ीय िव ालय, रोिहणी सेक्टर-3, िद ी ।
यय पित्रका
- 2007-2008
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िनबंध
मिहला सशक्तीकरण
समाज में मिहला का वही थान होना चािहए
जो पु ष का है- न कम, न ज्यादा । व तुतः मिहला तथा पु ष
रथ के दो पिहए के समान हैं । यिद एक भी पिहया अशक्त रहा
तो समाज पी रथ िनबार्ध गित से आगे नहीं बढ़ सकता ।
मिहला तथा पु ष नभ में उड़ने वाले खग के दो डैन के समान
हैं । अगर एक भी डैना छोटा हुआ या कमजोर हुआ तो खग नभ
में िवचरण नहीं कर सकता ।
यह कहने की ज रत नहीं िक सशक्त मिहला
सशक्त समाज की आधारिशला है । ि यां िजतनी मजबूत ह गी,
हमारा समाज उतना ही मजबूत होगा । गांधी जी ने कहा था"मिहलाएं संपूणर् जनसंख्या का आधा है, फलतः रा टर् के
िवकास में उनकी समान प से भागीदारी होनी चािहए ।"
भारतीय संिवधान के िनमार्ताओं ने भी मिहलाओं के
सशक्तीकरण की आव यकता को पहचाना और इसी उ े य से
संिवधान की धारा 14, 15 तथा 16 के अंतगर्त मिहलाओं के
िलए वतंतर्ता, समानता तथा न्याय की पयार् यव था की
गई ।
मिहलाएं एक महत्वपूणर् मानव संसाधन हैं ।
इसकी उपेक्षा कर हम एक सशक्त रा टर् की क पना मातर् कर
सकते हैं, उसे वा तिवकता के धरातल पर उतार नहीं सकते ।
इितहास साक्षी है िक मिहलाओं ने अपने यिक्तत्व एवं कृ ितत्व
से भारत के भावी समाज को सु ढ़ बनाया है । रा टर् िनमार्ण में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सका । गागीर्,
मैतर्ेयी, रिजया सु तान, सरोिजनी नायडू , रानी ल मीबाई तथा इंिदरा गांधी तक एक लंबी शृख
ं ला है िजन्ह ने
रा टर् िनमार्ण में महत्वपूणर् योगदान िदया ।
यय पित्रका
- 2007-2008
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अगर हम वैिदक काल के इितहास पर नजर डाले तो पाएंगे िक उस समय समाज में मिहलाओं
की ि थित काफी बेहतर थी । उन्हें पु ष के समान अिधकार थे । मिहलाएं समाज के हर क्षेतर् में सम्मान पाती
थीं । परन्तु मध्यकाल में इसमें बहुत पिरवतर्न आया । इस समय मिहलाएं भोग िवलास की व तु समझी जाने
लगी । कु छ अपवाद को छोड़ दें तो उस समय मिहलाओं को पु ष से काफी िनम्न समझा जाता था ।
आधुिनक काल में ि य की दशा में काफी सुधार हुए हैं, परन्तु यह पयार् नहीं है । मिहलाओं
के आिथर्क, सामािजक दशा में सुधार करने के िलए 1958 में के न्दर्ीय समाज क याण बोडर् की थापना की
गई । इसके ारा उन वैिच्छक सं थान को िव ीय सहायता पर्दान की जाती है जो मिहलाओं के िलए रोजगार
का सृजन करते हैं । 1961 में दहेज िनवारण अिधिनयम बनाया गया िजसे 1986 में संशोिधत िकया गया ।
इसके ारा मिहलाओं को समाज में या दहेज पी दानव से संरक्षा पर्दान की गई । 1976 में अिखल भारतीय
तर पर एक रा टर्ीय कायर्कर्म की शु आत की गई िजसका उ े य मिहलाओं को आिथर्क एवं सामािजक प से
मजबूत बनाना था । सन् 1977 में मिहलाओं के पुनवार्स का एक कायर्कर्म चलाया िजसका उ े य समाज की
िपछड़ी मिहलाओं को रोजगारपरक िशक्षा देना था तािक वे वावलंबी बन सके तथा व थ समाज के िनमार्ण में
अपना योगदान दे सकें । पर्धानमंतर्ी की अध्यक्षता में 1996 में 29 सद यीय "मिहला आयोग" का गठन िकया
गया । इसके कायर्कलाप में मिहलाओं से संबंिधत कायर्कर्म बनाना, सामािजक उपचार, सरकार को मिहलाओं
के िवकास के संबंध में सलाह देना, पर्शासिनक सलाह इत्यािद शािमल हैं । परन्तु यह खेद का िवषय है िक
मिहला आयोग अभी भी अपने उ े य को पूरा नहीं कर पा रहा है । पर्ायः सरकार की नीितय का लाभ उन्हें ही
िमल पाता है जो पहले से ही सक्षम हैं । इसका लाभ उन तक नहीं पहुचं पाता िजन्हें वा तव में इसकी ज रत
है । भारत सरकार ारा अन्य कई कायर्कर्म समय-समय पर बनाए जाते रहे हैं । देश में मिहलाओं के िवकास के
िलए कायर्कर्म की कमी नहीं है, आव यकता है उनके सही कायार्न्वयन की, तािक इसके उ े य को हम उन
गरीब तथा बेसहारा मिहलाओं तक पहुचं ा सकें िजन्ह ने परंपरा की बेिड़य को अपनी िनयित मान िलया है ।
ज रत है इन मिहलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाने की, तािक उनके कौशल और िवशेषताओं को जनजन तक पहुचं ाया जा सके । रा टर् के सवागीणर् िवकास के िलए यह अत्याव यक है ।
आज समाज का कोई क्षेतर् ऐसा नहीं है िजसमें मिहलाओं ने अपने सफलता के झंडे नहीं गाड़े
हैं । िकरण बेदी ने पहली मिहला आई.पी.एस. बन कर उन मान्यताओं को झुठलाया जो नारी को अबला समझ
कर पुिलस सेवा को मिहलाओं को िलए अनुपयुक्त बताते थे । कु छ समय पहले तक मिहलाओं के रोजगार का
मतलब था नसर् या िशिक्षका बनना । परन्तु आज मिहलाओं ने हर उस क्षेतर् में अपना िसक्का जमाया है जो िसफर्
पु ष के िलए जाना जाता था । आिथर्क उदारीकरण तथा औ ोिगकीकरण ने इसमें काफी योगदान िदया है ।
अब ि यां घर की दहलीज लांघ कर हर तरफ पु ष के साथ कं धा से कं धा िमलाकर चल रही हैं । यवसाय से
लेकर िविभ नौकिरय में वे अपना योगदान दे रहीं हैं और देश के िवकास में भागीदार बन रहीं हैं । आज
लगभग पर्त्येक क्षेतर् ि य की पर्ितभा का लोहा मान रहा है ।
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परन्तु हमें इस सत्य को वीकारना होगा िक िवकास के इस उजाले को मिहलाओं की
जनसंख्या का एक छोटा िह सा ही देख पा रहा है । अभी भी एक बड़ा भाग अंधकार में जीने को अिभश है ।
उनके िलए जीवन का मतलब दो जून की रोटी और तन ढकने के िलए कपड़ा है । वे पु ष पर्धान समाज में खुद
को पहचानने में अक्षम हैं । इसका सबसे बड़ा कारण अिशक्षा है । जहां भारत में पु ष का लगभग 63 पर्ितशत
साक्षर हैं वहीं मिहलाओं में यह पर्ितशत 38.39 है । राज थान में के वल 20 पर्ितशत मिहलाएं साक्षर हैं । जब
तक हम मिहलाओं में िशक्षा की अलख नहीं जगाएंगे, रा टर् के िवकास की क पना कोरी क पना ही सािबत
होगी । मिहलाओं की जनसंख्या पु ष की जनसंख्या के लगभग बराबर है । भारत में पर्ित एक हजार पु ष पर
929 मिहलाएं हैं । इस पर्कार िवकास में उनकी बराबर की भागीदारी सुिनि त की जानी चािहए । इसके िलए
हमें पु ष मानिसकता से बाहर िनकलना होगा तथा मिहलाओं को बराबरी का हक देना होगा । हमें उस
मानिसकता को त्यागना होगा िजसमें पु ष खुद को मिहला से े मानता है । ि यां हर क्षेतर् में पु ष से आगे
िनकल सकती हैं । यह डर शायद हमारे पु ष पर्धान वगर् को भी है । तभी तो संसद में मिहला आरक्षण िवधेयक
को आज तक मंजरू ी नहीं िमल पाई । परन्तु समय आ गया है िक हम ि य की पर्ितभा से डरे नहीं बि क उनका
सम्मान करें और उन्हें पर्ोत्सािहत करें । इससे संपूणर् समाज लाभािन्वत होगा ।
मिहलाएं त्याग की पर्ितमूितर् हैं । पर्कृ ित ने उन्हें कई िवशेषताएं दी हैं जो उन्हें े बनाती हैं ।
ि य के तीन प हैं - जननी, भिगनी तथा पत्नी । इन तीन प में एक ी समाज को कु छ देती है । अगर
हम इन्हें सशक्त बनाएं तो िनःसंदहे वे आगे चलकर देश के सामािजक बदलाव का एक हिथयार बनेंगी । हम
तभी अपने देश को एक िवकासशील देश से िवकिसत देश बनाने का सपना साकार कर पाएंगे । मिहला
सशक्तीकरण की नींव पर हम एक ठोस समाज का िनमार्ण कर सकते हैं ।
पंकज कु मार, अवर ेणी िलिपक, यय िवभाग, िव मंतर्ालय
इस िनबंध को वषर् 2007 के पखवाड़े के दौरान आयोिजत िनबंध पर्ितयोिगता में दसू रा थान िदया गया ।
क्या आप जानते हैःराजभाषा अिधिनयम, 1963 के िनयम 7 के तहत
कमर्चारी आवेदन, अपील या अभ्यावेदन िहन्दी या अंगर्ेजी में
कर सकता है, लेिकन यिद उस पर ह ताक्षर िहन्दी में करता है
तो उसका उ र िहन्दी में िदया जाना अिनवायर् है ।
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लेख
अंधिव ास या दक
ु ानदारी
आज ईक्कीसवीं सदी में भी हम सभी को अंध-िव ास
में िल जनमानस िमल ही जाएंगे जो िक इन्सान का
कमर् ही उसका भाग्य िनधार्िरत करता है ऐसी आ था
को छोड़कर थोथे कमर्काण्ड की बैसाखी पर चलना
अिधक आसान रा ता समझते हैं ।
आज तो यह हाल है िक यिद आप
िकसी ज्योितषी के हत्थे चढ़ जाएं तो आप होिशयार हो
जाएं िक कहीं आपके तन के कपड़े न चले जाएं
आपकी ऐसी हवा िनकालेंगे और अगर आपका िदल
मजबूत न हो तो शीघर् ही आई.सी.यू. में पहुचं
जाओगे । आपको देखते ही कहेंगे िक आपकी कुं डली
में बैठे गर्ह आपके जीवन में उथल-पुथल करने वाले
हैं । शिन की, मंगल की, गु सभी देवता आपसे हैं
इसके िलए आपने कोई शीघर् उपाय नहीं िकया तो घोर
क का सामना करने के िलए तैयार रिहए । ऐसा सुनते
ही आपके पांव के नीचे से जमीन सरक जाएगी । आप
सोचने पर िववश हो जाएंगे िक शायद यही कारण है
िक अचानक मैं बीमार हो जाता हू ं , पेट खराब रहता
है, काम करने का िदल नहीं करता, शीशे के सामने खड़े होकर चेहरा देखेंगे िक कहीं पीिलया तो नहीं हो गया ।
यह सभी लक्षण ह , तो समझ लीिजए की आ था और अंधिव ास के िशकार हो गए ।
इन बात से गर् त होने के बाद अगर आपने गलती से उपाय पूछ िलया तो समझ लो िक घर के
लॉकर की चाबी आपने पंिडत जी को थमा दी । शेव तो रोज करते थे अब िसर भी मुडं वाना पड़ेगा । आ था
और अंध-िव ास की इस कड़ी का शुभारंभ हो गया । इस सदी में सबसे अिधक कमाई का कोई साधन है तो
यह हौवा है , आपकी कुं डली में बैठा काल सपर् योग का हौवा । आज के युग में हर माह हजार लोग कालसपर्
योग को शांत करने के िलए पंिडत के चंगल
ु में पड़ते हैं इसके िलए महामृत्युजं य तथा िशव तुित के ोक का
उ ारण करवाया जाता है । ालु से नान के बाद नए कपड़े पहनने को कहा जाता है ऐसा पर्तीत होता है
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मान कालसपर् पूजा न होकर नारायण नागबिल की पूजा में शािमल होने जा रहे ह । क्य न हो, बकरा हलाल
होने से पहले खूब खाितरदारी करवाता है । जब इस तरह की बातें देखो तो िशिक्षत लोग भी अंध-िव ास से
गर् त हैं, देखकर पर्तीत होता है मान उनकी अक्ल का बीमा खत्म हो गया है और वो भगवान भरोसे चल रहे हैं ।
इसके अलावा आप सभी ने अकसर देखा होगा िक हर दसू रा यिक्त पुखराज या मूगं े, नीलम
गोमेद की अंगठू ी धारण िकए िमलेगा । इसके िशकार राजनेता, अिभनेता, उ अिधकारी और सामान्य
कमर्चारी आिद सभी हैं । यह सब देखने के बाद लगता है उनका भिव य क्या जो कोई भी अंगूठी नहीं पहनते,
लगता है िकसी ज्योितषी या पंिडत के चंगल
ु में नहीं आए । अपनी तो आ था और िव ास इसमें है िक..
मत िव ास कर हाथ की लकीर पर
उनका भी तो नसीब होता है,
िजनका हाथ ही नहीं होता ।।
उपरोक्त िवचार से आप यह मत सोचना िक हमारी ई र के पर्ित कोई आ था नहीं है और मैं
नाि तक हू ं ऐसा नहीं है । हर पूज्यनीय थल मेरे िलए मंिदर, मि जद, चचर् और गु ारा है । पटाखे दीपावली पर
चलें या गु पवर् पर, मोमबि यां चचर् (िगिरजाघर) या मि जद पर जलें उनको सभी को मैं आदरपूवर्क सम्मान
देता हू ं । मगर मैं यह कतई बरदा त नहीं कर सकता िक अंधिव ास की बिलदेवी पर कोई शहीद हो ।
इंसान का कमर् ही उसका भाग्य िनधार्िरत करता है । थोथे अंध-िव ास में कु छ नहीं रखा ।
आज के युग में अंध-िव ास से गर् त होते लोग को देखा तो ऐसा पर्तीत होता है िक लोग को िकसी दोष की
मुिक्त के बाद मीठा फल िमला हो या नहीं, पर इन पंिडत के पौबारा ज र हो गए । ऐसा इसिलए िक अनेक
पंिडत पूजा के िलए खास रकम तय कर लेते हैं । पूजा के िलए सारी सामगर्ी भी वयं लाते हैं । बस यजमान को
पधारना होता है । इन बात से ऐसा नहीं पर्तीत होता िक कोई कै टरर (Caterer) शादी का सारा इंतजाम कर
रहा हो और वर-वधु तथा उनके पिरवार को समय पर पहुचं कर शोभा बढ़ानी हो । इससे वतः प हो गया है
िक पूजा यवसाय का प ले चुकी है और िजसकी िजतनी अच्छी दकु ान, उतने ही ऊं चे दाम । तभी तो िकसी
ने िकतना सत्य कहा है िक....
"देखे पंिडत ानी ध्यानी, दया धमर् दे बंदे,
राम नाम जपदे खांदे,
गऊशाला दे चन्दे,
िक मैं कोई झूठ बोलया, िक मैं कोई कु फर तोलया......."
ए.के . भसीन, सहायक,
यय िवभाग, िव मंतर्ालय ।
यय पित्रका
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किवता
मेरी आदत है
जमाने को नफरत है मुझसे
क्य िक सच बोलना मेरी आदत है
दो त को मुझसे िशकायत है
क्य िक द ु मन से गले िमलना मेरी आदत है
मंिदर और मि जद में फकर् नहीं समझता मैं
क्य िक बड़ के सजदे में सर झुकाना मेरी आदत है ।
आसमां को छू ने के िलए नहीं उछलता मैं
क्य िक ज़मीं पर चलना मेरी आदत है
फू ल ने भी िकया िशकवा मुझसे
क्य िक इन्हें िकताब में दबाकर रखना मेरी आदत है ।
मेरे सपने भी ठे हैं मुझसे
क्य िक हकीकत को सजाना मेरी आदत है
मौत भी है उदास मुझसे
क्य िक हंस कर जीना मेरी आदत है ।
धोखे भी िमलते हैं मुझे कई बार
क्य िक एतवार कर लेना मेरी आदत है
सूरज को भी है िगला मुझसे
क्य िक चाँद को देखते रहना मेरी आदत है ।
मेरे िदल को भी है िशकायत मुझसे
क्य िक िदल में ददर् को छु पाकर रखना मेरी आदत है
कहने को तो बहुत कु छ है मगर
कु छ िछपाकर रखना भी मेरी आदत है ।
यय पित्रका
- 2007-2008
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नेता जी
नेता जी
बोले- हमारे िबरादरी
में जात है न पात है
मुहं पर पर्शंसा, पीठ पीछे लात है
हम में न भाई-भतीजावाद है
ना कोई भाई है ना कोई बाप है
हम तो स ा के साथ हैं
पया ही हमारा माई-बाप है
हम िहन्द ू न मुसलमान हैं
कु सीर् ही हमारी जात है
हमारा न दीन है न ईमान है
काम पड़े तो गधा भी बाप है
न कु छ पुण्य है न पाप है
पया ही हमारा माई-बाप है ।
िहन्दी पखवाड़ा 2007 के दौरान आयोिजत किवता पर्ितयोिगता में ी सुनील शांिड य की पहली किवता
"मेरी आदत" को ि तीय पुर कार िमला । ी सुनील इससे पहले भी किवता पर्ितयोिगता में पुर कृ त हो चुके
हैं ।
हम सभी भारतवािसय का यह अिनवायर् कतर् य है
िक हम िहन्दी को अपनी भाषा के प में अपनाएं ।
डा. भीमराव अम्बेडकर
यय पित्रका
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िनबंध
राजभाषा िहन्दी का उपयोग और हमारी लोकतांितर्क प ित
यह एक िनिवर्वाद सत्य है िक आधुिनक काल में िहन्दी जन-जन की भाषा के प में वयं
को थािपत करने में सफल रही
है । यूं तो िहन्दी भाषा का
अि तत्व लगभग सातवीं
शताब्दी में सामने आया ।
इससे पूवर् तो वह अपभर्ंश के
प में जन सामान्य की भाषा
का माध्यम थी । लगभग दसवीं
शताब्दी में िहन्दी का आरं िभक
प अि तत्व में आया तभी से
वह वयं को पिर कृ त करती
हुई, अन्य भाषाई तत्व को
अपने में समेटती हुई,
जनमानस की भाषा के प में
वयं को थािपत करने में
सफल रही है ।
राजभाषा तथा राजकाज की भाषा के तौर पर जनतंतर् की भाषा ही सदा से सफल रहती है ।
िहन्दी से पूवर् सं कृ त या अपभर्ंश या पाली भाषा राजभाषा के प में िव मान रही थी । जो भाषा जनसामान्य
की भाषा हो, वही भाषा यिद राजभाषा अथवा राजकाज की भाषा हो तो, राज्य पर्णाली की सुचा प से
चलाना संभव हो जाता है ।
भारतीय लोकतांितर्क प ित को मजबूत करने में िहन्दी का अत्यंत महत्वपूणर् थान है । इसे
इस पर्कार भी समझा जा सकता है िक भारतीय लोकतंतर् में अनेक भाषाओं, अनेक सं कृ ितय का समावेश है ।
लोकतंतर् की सफलता इसी बात में है िक वह िभ सं कृ ितय , िभ िवचार , िभ मनोभाव को एकसूतर् में
िपरोकर िकसी एक सवर्मान्य भाषा के माध्यम से शासन पर्णाली को सुचा प से चलाया जाए । देश को एकता
के सूतर् में िपरोकर िहन्द ु तान को समगर् िव के सामने पर् तुत करने में िहन्दी से बढ़कर कोई दसू री भाषा भी
नहीं ।
यय पित्रका
- 2007-2008
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"िहन्दी हैं हम, वतन है िहन्दो तां हमारा" महाकिव इकबाल ारा कही गई ये पंिक्तयां अब
तक देश को एकसूतर् में िपरोती आई हैं ।
भारतीय लोकतंतर् पर्णाली में राजभाषा के प में िहन्दी को अपनाए जाने के बाद से ही इसका
िनरन्तर िवकास होता रहा है । भारत के पहले पर्धानमंतर्ी के प में पंिडत जवाहर लाल नेह ने अपनी पु तक
"भाषाओं का सवाल" में िलखा है"भाषा एक िनरन्तर िवकासशील पर्िकर्या है । िकसी देश की सं कृ ित, उसकी उ ित
का पिरचायक उसकी भाषा है-" िजस भाषा का िवकास नहीं होता, वह सड़ने लगती है ।" इस संदभर् में
देखें तो िहन्दी का अब तक राजभाषा के प में िनरन्तर िवकास होता रहा है । िहन्दी के क्षेतर् में िनत्य नए पर्योग
हो रहे हैं, सरकारी कामकाज के क्षेतर् में भी िहन्दी चहुमख
ु ी पर्गित कर रही है । आज कम्प्यूटरीकरण के युग में भी
हम कह सकते हैं िक िहन्दी भाषा अब वह पुराने वाली ठहरी हुई, भारी-भरकम शब्द के बोझ से दबी हुई
पुरातनपंथी भाषा नहीं रही । वह अपने को िनरन्तर पर्गित के पथ पर अगर्सर करती हुई कम्प्यूटर के क्षेतर् में भी
पदापर्ण कर चुकी है । कम्प्युटिरंग िस टम अब भाषा पर आधािरत पर्णाली न रह कर, अंक पर आधािरत एक
ऐसी पर्णाली है िजसमें कम्प्यूटर पर िकसी भी िवषय को िकसी भी भाषा पर आधािरत पर्णाली में िवकिसत
िकया जा सकता है । इस पर्कार से कु छ समय पूवर् जैसे िहन्दी सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने की सम या अब कहीं
पीछे छू टती जा रही है । इससे एक फायदा होगा िक िहन्दी क्षेतर् में कम्प्यूटर के अिधक से अिधक इ तेमाल पर
कोई पर्ितबंध नहीं रहेगा तथा राजकीय कायर् अिधक सुगमता के साथ िकया जा सके गा । इस मामले में िहन्दी
अंतरार् टर्ीय मापदंड पर भी खरी उतरी है ।
इतने कम समय में इतनी अिधक पर्गित िकसी अन्य भारतीय भाषा की नहीं हुई है । इसके
अितिरक्त संपणू र् िव में भी चीनी भाषा के बाद िहन्दी में ही भारतीय सािहत्य तथा राजकाज की भाषा के प में
िहन्दी का सवार्िधक िव तार हुआ है । आज िहन्दी की मांग तेजी से बढ़ी है ।
लोकतंतर् यव था का सबसे बड़ा पहलू है- भाषा का रोजगारोन्मुख होना । पहले अंगर्ेजी का
बोलबाला इसीिलए था िक अंगर्ेज के जमाने से ही अंगर्ेजी िलखने पढ़ने वाल को उ पद पर पर्ाथिमकता दी
जाती थी । वही मानिसकता काफी समय तक चलती रही । िकन्तु अब ि थित बदल चुकी है । भारत के सुदरू
कोन में जहां अंगर्ेजी को पर्मुखता पर्ा नहीं थी, वहां के लोग अपनी भाषागत हीनता के कारण देश की
मुख्यधारा से वयं को कटा हुआ महसूस करते थे । िहन्दी भाषी लोग को छोटी-मोटी नौकरी के लायक समझा
जाता रहा था । पूवीर्-भारत में तो उन्हें (छातू) स ू खाने वाला कहकर हेय ि से देखा जाता है । परन्तु
बाजारवाद के तेजी से िव तार के साथ ि थित तेजी से बदल गई है । अब िहन्दी अिधक रोजगारोन्मुख हो गई
है । िहन्दी पतर्कार , संपादक , कम्प्यूटर के जानकार , सॉफ्टवेयर की इस समय िजतनी मांग है, उतनी कभी नहीं
रही । इसके चलते भारत के पर्त्येक कोने से िहन्दीभाषी लोग अब वयं को देश की मुख्यधारा से जोड़ पाने में
सफल रहे हैं । यह लोकतंतर् की सबसे बड़ी सफलता है ।
यय पित्रका
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राजभाषा तथा लोकतांितर्क प ित के मूल सूतर् के प में देश में अपने पैर जमाने के बाद अब
िहन्दी ने अंतरार् टर्ीय क्षेतर् में भी अपने पैर पसारने पर्ारंभ कर िदए हैं । हाल ही में न्यूयाकर् में हुए आठवें िव
िहन्दी सम्मेलन की सफलता इस बात का पर्माण है । एक ऐसे िव मंच पर जहां कभी पूवर् पर्धानमंतर्ी अटल
िबहारी वाजपेयी तथा पी.वी. नरिसंह राव ारा िहन्दी में भाषण देना एक बड़ी बात समझी जाती थी, उसी संयक्त
ु
रा टर् महासभा के मंच पर, महासिचव बान की मून ने जब अपना भाषण िहन्दी में पर्ारंभ िकया- "नम ते ।
क्या हाल चाल है । मैं िहन्दी थोरा-थोरा जानता हूं । िहन्दी इज ए ब्यूटीिफल लैंग्वेज ।" तो न के वल
भारत में वरन सम त िव के कोने-कोने से आए िहन्दी पर्ेिमय का सर गवर् से ऊँ चा हो गया । यह भारत की
ओर से उन अथक पर्यास का ही पिरणाम है जो 1975 से लेकर अब तक लगातार िहन्दी को संयक्त
ु रा टर् संघ
की भाषा बनाए जाने के प में लगातार पर्यासरत हैं । यही पर्यास इस सम्मेलन की सफलता के प में सामने
आया है । यह िहन्दी के प में राजभाषा तथा लोकतंतर् की सफलता है िक आज वह अतंरार् टर्ीय मंच पर
थािपत हो सकने में सफल रही है ।
इस संदभर् में सुपर्िस िदवंगत किवयतर्ी महादेवी वमार् का कथन था िक- "यह ऐसा ही है िक
आप िकसी पौधे को उसकी जड़ से हटाकर संगमरमर पर रोप दें । अंतरार् टर्ीय वही हो सकता है िजसकी जड़ें
रा टर् में ह ।" इस संदभर् में देखें तो रा टर्भाषा के प में िहन्दी की जड़ें बहुत गहरी जमी हैं । उसने अब तक देश
को एकसूतर् में बांधे रखा है । िवशाल लोकतांितर्क पर्णाली में जहां इतने सारे तत्व अलगाववादी ताकत को
एकता के प में बांधे रखना असंभव नहीं तो कम से कम अत्यंत किठन कायर् अव य है, िहन्दी अपने इस
पर्यास में सफल रही है ।
यह नहीं है िक भारतीय लोकतंतर् में िहन्दी को पर्ारं भ से ही सवर्सामान्य राजभाषा के प में
वीकार कर िलया गया था । वतंतर्ता के प ात जब यह सम या आई िक राज्य का बंटवारा िकस प में
िकया जाए तो सबसे सरल आधार था- भाषा । भाषाई आधार पर अिधकांश राज्य का गठन िकया गया तािक
सामान्य पर्शासन में कोई अड़चन न आए और के न्दर् में राजकाज की भाषा रहेगी- िहन्दी । ऐसा नहीं िक इस
पर्यास का कहीं िवरोध नहीं हुआ । िवशेषकर दिक्षण भारत में िहन्दी के िखलाफ यापक आंदोलन होते रहे, पर
धीरे -धीरे सवर्-सामान्य तौर पर तथा राजकाज की सुिवधा के िलए िहन्दी की पर्बु ता वीकार कर ली गई ।
इससे एक फायदा हुआ िक राज्य के तर पर भाषा के प में काम काज में कोई किठनाई नहीं आई । आज भी
राजभाषा िहन्दी का पर्योग पूणर्कािलक प से "क" क्षेतर् में, तथा अंशकािलक प से "ख" तथा "ग" क्षेतर्
में सवर्मान्य है तथा उ रो र इसमें वृि ही हो रही है ।
भारतीय शासन पर्णाली का मूल आधार है जनतंतर् या लोकतंतर् तथा जन की भाषा िहन्दी ।
लोकतंतर् में जनता जब अपने क्षेतर् के सवर्मान्य पर्ितिनिध को चुनकर सरकार में भेजती है तो उससे यह अपेक्षा
रखती है िक वह पर्ितिनिध जनभावनाओं को समझकर यापक प से देश के िलए नीितयां तैयार करेंगे । यही
भारत जैसे एक िवशाल देश के िहत में है । इस पिरपर्े य में देखें तो भारतीय संसद में िहन्दीभाषी तथा क्षेतर्ीय
भाषाओं के पर्ितिनिध इसी मानिसकता का पर्ितिनिधत्व करते हैं िक भारत जैसे बहुभाषी क्षेतर् में एकता का
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एकमातर् सूतर् है- िहन्दी, जो िक न के वल जन-जन की भाषा अथार्त रा टर्भाषा के प में वरन राजकाज की
भाषा अथार्त् राजभाषा के प में िनरन्तर िवकास करती हुई पर्गित के पथ पर अगर्सर है । इसका असर संपूणर्
देश में भी नजर आने लगा है । सरकार ारा िहन्दी को बढ़ावा देने की नीितय के अंतगर्त लगभग सम त राज्य
में िहन्दी में कम्प्यूटर का ान िहन्दी सॉफ्टवेयर के क्षेतर् में पर्गित जारी है । यहां तक िक गांव , क ब में जहां
िहन्दी या क्षेतर्ीय भाषा के अितिरक्त कोई और भाषा नहीं समझी जाती, वहां सड़क , माग या राज्य के नाम
िहन्दी या क्षेतर्ीय भाषाओं में रखे जा रहे हैं । माग पर साईन बोडर्, िदशा-िनदेर्श इत्यािद सब िहन्दी में जारी
िकए जा रहे हैं । जहां भी जाइए, चाहे वह दिक्षण हो या पूव र भारत या सुदरू पूवर् भारत, सभी जगह बोलचाल
का माध्यम बनती जा रही है िहन्दी । अब िहन्दी भाषी होना हीनता का नहीं, गौरव का पिरचायक है । िहन्दी
भाषी नए अवतार में सामने आ रहे हैं- जैसे िक बाजारवाद, मीिडया इत्यािद । बाजारवाद के चलते बहुरा टर्ीय
कं पिनय ने िहन्दी के महत्व को समझा है, जनमानस में िहन्दी पैठ को वीकार िकया है और भाषा को
बाजारोन्मुखी बना िदया है ।
युवा वगर् अब वयं को िहन्दी के अिधक िनकट समझता है क्य िक िहन्दी अब पुराने प की
बाबुओ ं वाली भाषा नहीं रही, बाजार को देखते हुए अंगर्ेजी भाषा को इसने अपना गुलाम बना िलया है । "यह
िदल मांगे मोर" देखकर बोलकर पली-पढ़ी युवा पीढ़ी अब िहन्दी बोलने के िलए नीरस शब्द का सहारा नहीं
लेती, वरन् वयं की नए-नए शब्द गढ़ लेती है । भाषा के प में िहन्दी का यह िव तार च काने वाला है ।
इससे भी अिधक चौकाने वाली है बाजारोन्मुखी अथर् यव था की चहुमं ख
ु ी पर्गित । बहुरा टर्ीय
तथा रा टर्ीय कं पिनय ने िहन्दी को बाजार के प में उतारा तथा इसके सहारे जनमानस तक पहुचं े तथा बाजार
का िव तार िकया, अथर् यव था का िवकास िकया ।
इसी अथर् यव था का िवकास लोकतंतर् की एक मजबूत कड़ी है । हम दावे के साथ यह कह
सकते हैं िक यिद इसी पर्कार अथर् यव था पर्गित की ओर अगर्सर होती रही तो, भारत एक सशक्त लोकतंतर् के
प में अंतरार् टर्ीय मंच पर खड़ा होगा िजसका आधार होगी राजभाषा िहन्दी, जो िक अपने जन्म के समय से ही
िनरन्तर पर्गितशील है और समय के साथ-साथ और पर्गितशील होती रहेगी । भाषा ही देश को जोड़ने में,
देशवािसय के िदल में देश के िलए पर्ेम पैदा करने में सफल होती है और िहन्दी "िहन्द ु तान" को एक सफल
लोकतंतर् के प में तथा वयं को एक पिर कृ त भाषा के प में िव मंच पर थािपत करने में पूणर्तः सफल रही
है तथा आगे भी इसे मजबूत बनाने में िनरन्तर पर्यासरत रहेगी । ऐसा हमारा िव ास है और सम त िहन्दी पर्ेिमय
के िलए "ज " मनाने का समय है ।
मंजुला जुनेजा, वैयिक्तक सहायक, यय िवभाग, िव मंतर्ालय
इस िनबंध को वषर् 2007 के िहन्दी पखवाड़े के दौरान आयोिजत िनबंध पर्ितयोिगता में तृतीय पुर कार िदया गया ।
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िवशेष संदभर्/द तावेज
राजभाषा िहन्दी तथा भारतीय भाषाओं के बीच सेतु की तलाश
िकसी भी रा टर् के शासन
अथवा शासक की भाषा राजभाषा कहलाती है ।
शासक एक साथ अनेक राज्य और पर्देश पर
भी शासन करते हैं । यह कोई अिनवायर् िस ांत
नहीं िक शासक और शािसत की भाषा एक ही
हो । िव के इितहास का अध्ययन करने से पता
चलता है िक अनेक रा टर् के शासक एवं
शािसत की भाषा एक नहीं बि क िभ रही हैं ।
आज भी िव के अनेक देश की यही ि थित
है । पर्ाचीन काल से संपणू र् भारत एक सं कृ ित
का के न्दर् रहा इसके बावजूद भी इस देश में
अनेक राज्य थे और अनेक भाषाएं यहां पर
पर्चलन में थीं । उ रापथ में सं कृ त, पर्ाकृ त और
पाली भाषाएं शासक की भाषाएं रही हैं, परन्तु
इस िवशाल देश में अनेक लोक भाषाएं पर्चिलत
थीं- जैसे पंजाबी, िसंधी, लहन्दी, डोगरी,
अवधी, बर्ज, मैिथली, मगही, शौरसेनी,
महारा टर्ी, बँगला, असमी इत्यािद । इससे प
है िक राजकाज की भाषा और जनता की भाषा
अलग रही हैं । ऐसे भी कु छ राज्य थे जहां पर
शासक और शािसत की भाषा एक ही रही थी ।
जैसे तिमलनाडु में चेर, चोष और पांिडय राज्य की राजभाषा तिमल थी और उनके ारा शािसत पर्देश में
जनता के बीच तिमल भाषा ही यव त थी । भारत के कु छ अन्य राज्य में भी शासक और शािसत की भाषा
एक ही रही थी । परन्तु मुगल के आकर्मण के प ात िवदेशी शासक ने शािसत पर अपनी भाषा थोप दी ।
पिरणाम व प शासन से जुड़े हुए अिधकािरय और कमर्चािरय को शासक की भाषा में ही राजकाज का कायर्
संभालना पड़ा । यहां से राजभाषा और जनता की भाषा में खाई उत्प होती गई । यह दरार आज तक बनी हुई
है । अंगर्ेज के आगमन के प ात लाडर् मेकाले की भाषा नीित ने अंगर्ेजी को भारत की शासकीय भाषा बनाया ।
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भारत के वतंतर् होने तक याने तीन शतािब्दय तक भारत की राजभाषा अंगर्ेजी ही रही । वैसे भारत बहुभाषाभाषी रा टर् है । भाषा िव ान की ि से भारत भाषा उप-भाषाओं और बोिलय की संख्या शतािधक है ।
शािसत और शासक के बीच अंगर्ेजी मातर् शासन की भाषा बनी रही । परन्तु यह राजभाषा और भारतीय
भाषाओं के बीच सेतु नहीं बन पाई । फलतः यहां की जनता के िलए शासन की भाषा अपिरिचत और अजनबी
ही रह गई । जनता ने कभी उस भाषा को पर्ेम से, वेच्छा से या आत्मीयतापूवर्क नहीं वीकारा । परन्तु शासक
वगर् की भाषा होने के कारण उन्हें िववश होकर अंगर्ेजी की दासता वीकारनी पड़ी ।
15 अग त, 1947 को भारत वतंतर् हुआ । 14 िसतम्बर, 1949 में भारत का अपना एक
संिवधान बना और इसमें िहन्दी को राजभाषा के प में वीकारा गया । इस संिवधान का कायार्न्वयन
26 जनवरी, 1950 को हुआ । उसमें बताया गया िक पंदर्ह वषर् के प ात याने 1965 तक िहन्दी, अंगर्ेजी का
थान गर्हण करे गी । परन्तु दभु ार्ग्य से 1963 में उसमें संशोधन हुआ । पिरणाम व प आज तक िहन्दी अपने
वा तिवक पद को गर्हण नहीं कर पाई । गृह मंतर्ालय के अधीन थ राजभाषा िवभाग के ारा के न्दर् शासन के
सभी मंतर्ालय , िवभाग , अनुभाग , रा टर्ीयकृ त बैंक , उपकर्म तथा उ ोग में भी राजभाषा िहन्दी के
कायार्न्वयन का िविभ तर पर पर्यास जारी है । चूंिक िहन्दी हमारे िवशाल गणतंतर् की राजभाषा है और गणतंतर्
में जनता की अहम भूिमका होती है, अतः राजकाज की भाषा िहन्दी को जनता के अत्यिधक समीप पहुचं ने की
िनतांत आव यकता है । यह समय की मांग है । पर्जा के ारा चुने गए पर्ितिनिध ही शासन का सूतर् संभालते हैं ।
इसिलए शासन की पर्त्येक गितिविध से जनता को अवगत होना अत्याव यक है । गणतंतर्ीय शासन जन क याण
हेतु जनता ारा चुने गए पर्ितिनिधय ारा उिचत माग का अन्वेषण करता है । ऐसी ि थित में शासन और जनता
के बीच संवाद के माध्यम के प में एक भाषा का होना िनतांत आव यक है । यिद िवशाल रा टर् में एक शासन
के अंतगर्त अनेक राज्य या पर्देश ह और उनकी भाषाएं िभ -िभ ह , ऐसी हालत में उनके बीच िनकटता
थािपत करने हेतु आव यक माग का अन्वेषण होना चािहए ।
भारत की राजभाषा िहन्दी है, परन्तु संिवधान ारा अिधसूिचत भाषाएं बाईस हैं । इन भाषाओं
के बीच एकसूतर्ता का होना अपेिक्षत है । संिवधान की आठवीं अनुसचू ी में िहन्दी के अितिरक्त भारत की चौदह
मुख्य भाषाओं का उ े ख िकया गया है और देश को शैक्षिणक एवं सां कृ ितक उ ित के िलए यह आव यक
माना गया है िक इन भाषाओं के पूणर् िवकास के िलए सामूिहक उपाय िकया जाना चािहए । संिवधान सभा ने
प संक प िकया है िक िहन्दी के साथ-साथ इन सब भाषाओं के समिन्वत िवकास के िलए भारत सरकार
ारा राज्य सरकार के सहयोग से एक कायर्कर्म तैयार िकया जाएगा और उसे कायार्िन्वत िकया जाएगा तािक वे
शीघर् समृ ह और आधुिनक ान के संचार का पर्भावी माध्यम बन सके । संिवधान सभा ने यह संक प भी
िकया है िक िहन्दी भाषी क्षेतर् में िहन्दी तथा अंगर्ेजी के अितिरक्त एक आधुिनक भारतीय भाषा के दिक्षण भारत
की भाषाओं में से िकसी एक को तहजीब देते हुए और अिहन्दी भाषी क्षेतर् में पर्ादेिशक भाषाओं एवं अंगर्ेजी के
साथ-साथ िहन्दी के अध्ययन के िलए उस सूतर् के अनुसार, साथ ही संघ लोक सेवा आयोग की ओर से
अिखल भारतीय एवं उ तर के न्दर्ीय सेवाओं से संबंिधत परीक्षाओं के िलए संिवधान की आठवीं अनुसचू ी में
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सिम्मिलत सभी भाषाओं तथा अंगर्ेजी को वैकि पक माध्यम के प में रखने की अनुमित का पर्ावधान हो ।
परन्तु वा तव में संिवधान की संक पना के अनु प उपरोक्त अिधिनयम कायार्िन्वत नहीं हो पाया ।
संवधै ािनक िनणर्य के साथ कांगर्ेस की कायर्सिमित ने भी राजभाषा की ि थित पर गहराई से
िवचार िकया है । मुख्यतः 24 फरवरी, 1965 की बैठक में िलए गए िनणर्य अत्यंत महत्वपूणर् हैं । उस बैठक में
पािरत पर् ताव संक्षेप में इस पर्कार हैः1.
भारत सरकार को िहन्दी तथा अन्य सभी रा टर्ीय भाषाओं के पर्योग और िवकास की ओर अिधकािधक
ध्यान देना चािहए ।
2.
ितर्भाषा सूतर् का पर्भावी ढंग से अनुपालन िकया जाए ।
3.
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में िहन्दी तथा पर्मुख क्षेतर्ीय भाषाओं को भी वैकि पक माध्यम
बनाया जाए ।
दरअसल 1965 में तत्कालीन पर्धानमंतर्ी ी लाल बहादरु शा ी जी ने हमारे देश के सभी
राज्य के मुख्य मंितर्य की िद ी में एक बैठक बुलाई । उस बैठक में भारत की भाषा सम या पर गंभीरतापूवर्क
चचार् हुई । अंत में सवर्सम्मित से यह पर् ताव पािरत हुआ िक पर्त्येक राज्य में ितर्भाषा सूतर् अमल िकया जाए ।
त सु ार, पर्थम भाषा पर्ादेिशक भाषा होगी। ि तीय भाषा के प में िहन्दी तथा तृतीय भाषा के प में अंगर्ेजी की
पढ़ाई की यव था सभी िव ालय में होगी । परन्तु कु छ ही राज्य ने ईमानदारी से इस ितर्भाषा सूतर् का
कायार्न्वयन िकया । शेष अिधकांश राज्य ने इसकी उपेक्षा की । पिरणाम व प भाषा की यह सम या
िववादा पद बनकर खड़ी हुई है । राज्य के नेताओं तथा अंगर्ेज पर त अिधकािरय की उपेक्षा और वाथर्परता ने
िहन्दी तथा भारतीय भाषाओं के बीच सेतु बंधन के िनमार्ण में बाधा उपि थत की । यिद यह ि थित भिव य में
भी कायम रही तो संिवधान ारा वीकृ त राजभाषा िहन्दी न अपना वा तिवक थान गर्हण कर सकती है और न
ही क्षेतर्ीय भाषाओं का िवकास संभव होगा । ऐसी ि थित में राजभाषा िहन्दी तथा रा टर्ीय भाषाओं के बीच सेतु
की तलाश सपना मातर् बन कर रह जाएगी ।
सन् 1963 में तत्कालीन पर्धानमंतर्ी पं. जवाहर लाल नेह जी ने सदन को जो आ ासन िदया
त सु ार सन 1965 को िहन्दी राजभाषा के पद पर आसीन तो हुई परन्तु अंगर्ेजी भी सहभाषा के प में वीकृ त
हो गई । इस कारण आज भी के न्दर् सरकार के कामकाज में ि भािषक नीित जारी है । यह ि थित कब तक बनी
रहेगी, िनि त प से कु छ कहना संभव नहीं है ।
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सन 1934 तथा 1946 में महात्मा गांधी जी ने दिक्षण की यातर्ा की । उस संदभर् में उन्ह ने
रा टर्भाषा िहन्दी के संबंध में अपनी नीित प कर दी थी । "रा टर्ीय एकता के िलए िहन्दी भाषा अत्यन्त
आव यक है । पर साथ ही मातृभाषाओं के िवकास में िकसी भी पर्कार की असावधानी नहीं होनी
चािहए । पर पर सहयोग से ये भाषाएं िवकिसत ह और िविभ भाषा-भाषी एक सूतर् में जुड़े रहें और
िहन्दी सब भाषा-भािषय को जोड़ने का साधन बने ।" महात्मा जी का संक प यह था िक पर्ाचीन काल में
भारत के िविभ आंचल में पर्ादेिशक भाषाएं यव त थीं, परन्तु सं कृ त और पर्ाकृ त भाषाएं उन भाषाओं को
जोड़ने का माध्यम बनी हुई थी । इसी पर्कार मुगल के शासन काल में फारसी के साथ-साथ मराठी, िहन्दी,
दिक्खनी, गुजराती, बँगला, राज थानी इत्यािद भाषाएं पर्शासिनक काय में ही नहीं बि क िविभ अिभलेख में
भी यव त थीं । ऐसी हालत में वतर्मान समय में क्षेतर्ीय भाषाएं भी िहन्दी के साथ-साथ क्य न पर्चिलत हो
सकती और इस पर्कार एक दसू रे की पूरक भी क्य न बन सकती ? इसी पिरपर्े य में हमें यह तलाशने की
आव यकता है िक राजभाषा िहन्दी तथा
अन्य रा टर्ीय भाषाओं के माध्यम सेतु
का काम कै से संभव हो सकता है ?
क्य िक संिवधान के दोन सदन ारा
पािरत संक प में भारत संघ की राजभाषा
के प में िहन्दी को वीकृ त करने के
साथ-साथ उसे सामािजक सं कृ ित के
सभी तत्व की अिभ यिक्त का माध्यम
बनना चािहए । ऐसी ि थित में रा टर्ीय
भाषाओं तथा राजभाषा िहन्दी के बीच
आदान-पर्दान की पर्िकर्या को गितशील
बनाने की िनतांत आव यकता है । इस
सूतर् को ढ़ बनाने के िलए िनम्निलिखत
उपाय कारगर हो सकते हैः1.
राजभाषा िहन्दी तथा संिवधान
ारा वीकृ त रा टर्ीय भाषाओं
के सािहत्य का अनुवाद के
माध्यम से पर पर िनकट लाने
का मागर् पर्श त करना, िजससे
िहन्दी संपूणर् भारतीय सािहत्य
का पर्ितिनिधत्व कर सके और
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सही माने में "भारत-भारती" की सं ा पर्ा कर सके । इस पर्कार जहां सािहत्य के माध्यम से एकात्मता
का बोध होता है वहां भारतीय िचन्ता का पर्ितिबम्ब दिशर्त होगा । साथ ही रा टर्ीय भाषाओं और
राजभाषा के बीच तादात्म्य थािपत होगा ।
2.
भारत की सम त भाषाओं के िलए एक ही िलिप नागरी हो िजससे िविभ भाषाओं के बीच नैक
थािपत होगा और एक िलिप होने से भारत की सभी भाषाओं को बढ़ने का मागर् सुलभ होगा तथा उन
भाषाओं में पर्युक्त तत्सम शब्द के माध्यम से कु छ हद तक उन भाषाओं के सािहत्य को भी समझने में
सुिवधा होगी ।
3.
ितर्भाषा सूतर् तत्काल सवर्तर् अमल िकया जाए जैसे िक भारत का पर्त्येक नागिरक भारत में कहीं भी जाएं
तो भाषायी किठनाई का अनुभव नहीं करे गा और उसके भीतर एक ही रा टर् के नागिरक होने का भावबोध होगा । इससे रा टर्ीय एकता को जहां बल पर्ा होगा वहां क्षेतर्ीय भाषाओं की सीमाओं को लांघ
कर रा टर्ीय एवं अंतरार् टर्ीय क्षेतर् में भी भारत का नागिरक अपनी पहचान बना सकता है । भाषा भेद
एक ही रा टर्वािसय के बीच अलगाव का बोध कराता है ।
4.
राजभाषा तथा पर्ांतीय भाषाओं के सािहत्य के मध्य तुलनात्मक अध्ययन दोन भाषाओं को िनकट लाने
में सहायक बन सकता है । िशक्षा, सािहत्य, वािणज्य, यापार, उ ोग, कला एवं वै ािनक क्षेतर् में भी
पर पर संबंध ढ़ हो सकते हैं ।
5.
ितर्भाषा सूतर् रा टर्ीय एवं अंतरार् टर्ीय तर पर एक दसू रे को समझने और पर पर मैतर्ी संबंध ढ़ बनाने में
सफल िस हो सकता है । ऐसी हालत में रा टर्ीय भाषाओं और राजभाषा के बीच में ही नहीं अिपतु
अंगर्ेजी के माध्यम से वैि क तर पर भी नैक थािपत हो सकता है ।
आज रा टर् के समक्ष सबसे बड़ी सम या भाषा की है । इस सम या का हल करने का सही
पर्यत्न नहीं हुआ है । जो पर्यास जारी है उसकी गित इतनी धीमी है िक उसे देखते हुए लगता है िक रा टर्ीय
भाषाओं तथा राजभाषा के बीच सु ढ़ सेतु थािपत करने में अनेक दशक लगने की संभावना है । कु छ वषर् पूवर्,
पूवर् रा टर्पित माननीय डा. शंकर दयाल शमार् जी ने "िहन्दी सेवी सम्मान" पुर कार पर्दान करते हुए िचन्ता यक्त
की िक वतंतर्ता पर्ाि के पचास वष के बाद भी िहन्दी भारत की राजभाषा नहीं बन सकी । इसिलए अब हमें
भाषा के पर् को के वल सं कृ ित के पर् से ही नहीं अिपतु रा टर्ीय पुनिनर्मार्ण एवं रा टर्ीय िवकास के पर् से भी
जोड़कर देखना होगा । उसे इस तरह देखना होगा िक कै से हम अपने देश को शिक्तशाली बनाने के िलए
रा टर्भाषा का उपयोग कर सकते हैं । इस संदभर् में रा टर्पित अगले वषर् आजादी की वणर् जयंती के अवसर पर
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देश वािसय से िहन्दी को पूरी तरह से राजभाषा बनाए जाने का दाियत्व पूरा िकया जाने का आ ान करते हुए
कहा िक हमारे देश के लोग पर संिवधान ने यह दाियत्व डाला है िक िहन्दी को ज द से ज द पूरे देश की भाषा
बनाए जाए । आगे रा टर्पित महोदय ने इस बात पर बल देते हुए कहा िक के वल िनयम और कानून बना देने से
ही काम खत्म नहीं हो जाता है, उससे भी कहीं अिधक ज री है िक उस पर अमल िकया जाए ।
रा टर्पित जी ने िहन्दी तथा अन्य भाषाओं के आपसी मेल से काम करने की आव यकता पर
बल देते हुए कहा था िक रा टर्भाषा के संबंध में हमें आगे भी इसी नीित पर चलना चािहए । रा टर् का िवकास
पर्ितयोिगता से नहीं बि क पर पर समन्वय से होता है । िपछले सौ वष में िहन्दी के व प में जो पिरवतर्न
आया है वह इस बात का पर्माण है िक इसने अपनी समन्वय की सं कृ ित को बनाए रखा । िहन्दी की मूल शिक्त
लोक-शिक्त रही है । यही कारण है िक िहन्दी को देश भर की अन्य भाषाओं का नेह िमला है ।
डॉ. बाल शौिर रे ी,
27 विडवेलपु रु म, वे ट मांबलम, चे ई-600003
लेखक िहन्दी भाषा के ममर् होने के अलावा िवभाग की संयक्त
ु सलाहकार सिमित के माननीय सद य हैं,
संपर्ित तिमलनाडु िहन्दी अकादमी और िहन्दी सािहत्य सम्मेलन पर्याग के अध्यक्ष है तथा कई दशक तक
सुिवख्यात बाल पितर्का "चन्दा मामा" के संपादक रहे हैं ।
क्या आप जानते हैःकायर्साधक ान अथार्त्
1.
कमर्चारी ने मैिटर्क परीक्षा या उसके समतु य या उससे ऊं ची परीक्षा िहन्दी िवषय के प में उ ीणर्
की है;
2.
िहन्दी िशक्षण योजना के तहत् पर्ा परीक्षा पास कर ली है; और
3.
यिद वह घोिषत करता है िक उसे िहन्दी का कायर्साधक ान पर्ा है ।
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किवता
िवकास
कई बार टोके जाने पर भी मानो
नेताजी में गजब का था साहस
हमेशा की तरह आज भी था
उनके उ ार का मु ा िवकास ।
वे बोले, जहां भी देखो-सुनो
बस िवकास ही िवकास छाया है
िजसे यह सब नहीं है िदखाई देता
उसके मन मि त क में अँधेरा छाया है ।
िजन्हें पीने को पानी तक नहीं था
वे सब आज पेप्सी -कोक पीते हैं
िजनको अनाज का दाना था नहीं िमलता
वे म टी-नेशनल के िचप्स खाते हैं ।
हमारी मिहलाएं धुएं के बीच ही
लकड़ी जला चू हें में खाना पकाती थीं
अब आप वयं देिखए िवकास
कु िकं ग रें ज में भी बे ट बर्ांड लाती हैं ।
इतनी ही नहीं मिहला िवकास की तो
और भी गाथाएं सुन सकते हो
जो पदेर् में रहकर संसार देखती थीं
उन्हें वे टनर् वेशभूषा में देख सकते हो ।
हमारे गर्ाम िवकास की तारीफ
खुद पर्ेिसडेंट िक्लंटन ने की थी
इससे पहले िकस देश की जनता ने
आधे घंटे में िवकास की लीला देखी थी ।
यय पित्रका
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हमारे पंजाब के िकसान को देखो
ल सी की जगह जॉनी-वॉकर पीते हैं
और हिरयाणा के सब ताऊ
कु ा लेकर मािनग-वॉक पर जाते हैं ।
कु की बात अब आई है
तो उनकी भी यव था जान लो
हमारे एन.सी.आर. में भी अब
उनके िलए फाइव टार िरज़ाटर् हैं ।
एअर-कं िडशनर की हवा से लेकर
वीिमंग-पूल की भी सुिवधा है
तुम्हारे िलए नहीं न सही भाई
देख तो सकते हो, इसमें क्या दिु वधा है ।
और हमारे शहर के भोले ब े
िकतने िवकास के मजे ले रहे हैं
मौज-म ती, कौन्टी पाटीर् के चलते भी
टीचर को अनुशासन की मार िदला रहे हैं ।
कू ल जाना अब कोई तप या नहीं
एंटरटेनमैंट का पैकेज बन गया है
होमवकर् , हाडर्वकर् व परीक्षा का कोसर्
अब पेरेन्ट्स का बैगेज बन गया है ।
यह मत सोचो इस सबके चलते
हम नेता लोग अब भी दिकयानूसी हैं
हमने भी िवकास की चादर में
अपनी िजन्दगी व पोटली परोसी है
हमारे खाते अब हर देश में हैं
हम भी आज िडजाइनर डर्ेस में हैं
हमारे कु तेर्-पाजामें तक ही न जाओ
बाजार में भी हम अलग वेश में हैं ।
यय पित्रका
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अब और क्या समझाऊं आपको
िवकास ही िवकास है जहां देख
अखबार की बात पर मत जाओ
वे भी पर्ाइवेट चैनल की तरह
िवरोधी दल से िमले हुए हैं ।
अब हमारे िवकास की यह रफ्तार
देश को महाशिक्तय में शािमल कराएगी
तुम्हें करीब से न िमले लाभ, न सही
दरू से ही िवकास के दशर् कराएगी ।
कम्प्यूटर व टैक्नोलोजी के चलते
हम अब िसफर् तुम्हें भाषण ही देंगे
पोिलंग-बूथ में लगे सवर्र में
तुम्हारी वोिटंग खुद-ब-खुद हो जाएगी ।
उदय शंकर पंत, मुख्य िनयंतर्क (पेंशन)
यय िवभाग, िव मंतर्ालय ।
रा टर्ीय यवहार में िहन्दी को काम में लाना देश की एकता और उ ित के
िलए आव यक है ।
महात्मा गांधी
संिवधान में िहन्दी को रा टर्भाषा वीकार कर िलए के जाने के बाद िकसी
को उसके िव आवाज़ उठाने का अिधकार नहीं है ।
वी.के . मेनन
यय पित्रका
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सं मरण
मानव सेवा - स ी सेवा
यह घटना उस
समय की है जब मैं िदनांक 19 मई,
2007 को अपने घर लखनऊ से नई
िद ी आ रहा था । मैं लखनऊ के
चारबाग टेशन से गोमती एक्सपर्ेस में
नई िद ी जाने हेतु 5:30 बजे बैठा ।
गाड़ी धीरे -धीरे अपने वेग से बढ़ती
जा रही थी । जैसे-जैसे गाड़ी आगे
बढ़ रही थी वैसे-वैसे गमीर् भी अपने
पूरी शबाब पर बढ़ती जा रही थी ।
सबसे पहले गाड़ी कानपुर सेंटर्ल
पहुचं ी । यहां पहुचं ने में टर्ेन लगभग
एक घंटा लेट हो गई थी । कानपुर से
गाड़ी इटावा, िफरोजाबाद और इसके
बाद टुण्डला पहुचं ी । टुण्डला टेशन
से गाड़ी करीब 15 िमनट ही चली
थी िक रा ते में टर्ेन का इंजन खराब
हो गया । इस समय दोपहर के करीब
2:30 बजे थे और धूप से सभी
याितर्य का बड़ा बुरा हाल हो रहा
था । इधर गाड़ी में पानी भी खत्म हो रहा था और जो थोड़ा पानी बचा था वह भी गमीर् के कारण खौल रहा
था । टर्ेन के हजार याितर्य की तबीयत खराब हो रही थी । जहां पर टर्ेन की थी वहां से एक िकलोमीटर की दरू ी
पर एक गांव िदखाई िदया । लोग ने िज ासावश उस गांव का नाम पूछा तो पता लगा िक "मेंहन्दारा बाग" गांव
है । यह गांव "बाग" के नाम से पर्िस है । इस थान के आगे जलेसर रोड टेशन पड़ता है । टर्ेन में पानी खत्म
होने की खबर गांव वाल को मालूम हो गई और टर्ेन के कने के मुि कल से 10 िमनट के बाद मैं यह देख कर
आ यर्चिकत रह गया िक गांव के 4 साल के ब े से लेकर 50 साल तक के बूढ़े, जवान सब लोग अपन दोन
हाथ में पानी भरकर टर्ेन की ओर ला रहे थे । अिधकांश लोग ने सोचा िक शायद ये गांव वाले पानी बेचने के
िलए टर्ेन की ओर आ रहे हैं । िज ासावश कु छ लोग पानी लेने गए और पानी लेने के बाद जब गांव वाल को
पए देने लगे तो गांव वाल ने कहा िक हम पए-पैसे के िलए पानी नहीं ला रहे हैं हम तो मानव सेवा
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भाव से िनःशु क याितर्य को पानी िपलाने आए हैं । यह सब देखकर मेरे मन में उन लोग के पर्ित ा
भावना जागृत हो गई िक इस किलयुग में जब हर आदमी के वल पए-पैसे के िलए ही काम कर रहा है,
मानवता मर रही है । ऐसे समय में ये लोग िबना िकसी लाभ-हािन के ही िनः वाथर् मानव जाित की सेवा कर
रहे हैं । दोपहर 2:30 बजे से लेकर 3:30 बजे तक टर्ेन वहीं पर खड़ी रही । पूरे एक घंटे तक गांववासी
हजार याितर्य को पानी ला-लाकर िपलाते रहे । वा तव में धन्य हैं वो लोग िजनमें अभी भी मानव सेवा की
भावना बची हुई है ।
बलराम पाल, आशुिलिपक,
आिथर्क कायर् िवभाग, िव मंतर्ालय ।
क्या आप जानते हैःपर्वीणता पर्ा अथार्त्
1.
2.
3.
यिद कमर्चारी ने मैिटर्क परीक्षा या उसके समतु य या उससे ऊं ची कोई परीक्षा िहन्दी माध्यम से
उ ीणर् कर ली है, या
नातक परीक्षा या उससे ऊं ची िकसी परीक्षा में िहन्दी को एक वैकि पक िवषय के प में िलया था,
या
वह घोषणा करता है िक उसे िहन्दी में पर्वीणता पर्ा है ।
और
राजभाषा अिधिनयम, 1963 के िनयम 5 के तहत िहन्दी में पर्ा िकसी पतर् आिद का उ र, चाहे
वह िकसी भी क्षेतर् से पर्ा ह और िकसी भी राज्य सरकार, यिक्त या के न्दर्ीय सरकार के कायार्लय से पर्ा
ह , के न्दर्ीय सरकार के कायार्लय से िहन्दी में ही िदया जाए ।
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लेख
सरकारी कामकाज में िहन्दी के पर्योग में आने वाली मूलभूत किठनाइयां
और उनका िनदान
सरकारी कामकाज में अंगर्ेजी में
िटप्पण और पर्ा पण करने की तरह िहन्दी में िटप्पण
और पर्ा पण करना उतना ही महत्वपूणर् है िजतना
मनु य के शरीर में रीढ़ की ह ी । देखा गया है िक
सरकारी अिधकािरय और कमर्चािरय को िहन्दी तो
आती है परन्तु िहन्दी में कायर् करने का अभ्यास नहीं
होने के कारण वे सरकारी कायर् िहन्दी में करने में
किठनाई महसूस करते हैं और अपना अिधकांश
कायर् अंगर्ेजी में ही कर रहे हैं िजसके फल व प
सरकारी कायार्लय में अभी िहन्दी पूरी तरह नहीं आ
पाई है ।
भारतीय संिवधान के अनुच्छे द
343 में िहन्दी को संघ की राजभाषा घोिषत िकया
है । हालांिक के न्दर्ीय सरकारी कायार्लय में िहन्दी
और अंगर्ेजी दोन भाषाओं का पर्योग करने की पूरी
छू ट है िफर भी यह हमारा नैितक दाियत्व है िक हम
संिवधान के पर्ित पूणर् िन ा रखते हुए अपने काम में
अिधकािधक िहन्दी का पर्योग करें ।
िहन्दी के पर्योग में मूलभूत किठनाइयां
अब पर् यह उठता है िक वे कौन से कारण हैं िक आजादी के 60 वष के बाद भी हम अपना
सरकारी कामकाज िहन्दी में करने से कतराते हैं और िजसके कारण सरकारी कायर् में अभी तक पूरी तरह िहन्दी
नहीं आ पाई है । हर मु क की अपनी-अपनी राज/रा टर् भाषाएं हैं । चीन की चीनी है, जापान की जापानी है,
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स की सी और वहां पर अपनी-अपनी भाषा में राजकाज हो रहा है । परन्तु िहन्द ु तान की भाषा िहन्द ु तानी
(िहन्दी) होते हुए भी िहन्दी में काम नहीं हो पा रहा है इसके िनम्निलिखत पर्मुख कारण हैः1.
राजभाषा अिधिनयम, 1963 का लागू होनाः 1950 में संिवधान लागू करते समय संिवधान में
की गई यव था के अनुसार 26 जनवरी, 1965 के बाद संघ सरकार की कामकाज की भाषा िहन्दी होनी थी
परन्तु 1965 से पहले राजभाषा अिधिनयम, 1963 को पािरत कर यह यव था की गई िक 1965 के बाद भी
िहन्दी के अलावा अंगर्ेजी का पर्योग अिनि त काल तक जारी रहेगा । हालांिक िहन्दी को राजभाषा के पद पर ही
बने रहने िदया गया और राजभाषा अिधिनयम की धारा 3(3) के अधीन आने वाले द तावेज के िलए िहन्दी
और अंगर्ेजी दोन भाषाओं का पर्योग करना अिनवायर् कर िदया गया । परन्तु अिधकािरय /कमर्चािरय को यह
छू ट दी गई िक वे सरकारी कामकाज को अपनी इच्छानुसार िहन्दी या अंगर्ेजी में से िकसी भी भाषा में कर सकते
हैं । इससे िहन्दी के मागर् में कावट आ गई, क्य िक अंगर्ेजी में कायर् करने के इच्छु क अिधकािरय /कमर्चािरय
को अंगर्ेजी में कायर् करने की छू ट िमल गई िजससे 1965 से जो संघ का सारा कायर् िहन्दी होना था वह नहीं हो
पाया ।
2.
सै ांितक ान का अभावः
(राजभाषा अिधिनयम, िनयम के ान का न होना) - पर्ायः सभी
अिधकािरय / कमर्चािरय को राजभाषा अिधिनयम, िनयम तथा इनके अनुपालन संबंधी िनदेर्श की जानकारी
नहीं है और जो थोड़ी बहुत जानकारी है भी तो उनके िदमाग में इस बात की संक पना प नहीं है िक उन्हें
कौन-कौन से सरकारी कामकाज को िहन्दी में करना अिनवायर् है । जैसे राजभाषा अिधिनयम की धारा 3(3) के
अधीन जारी िकए जाने वाले कागजात ि भाषी होने चािहए । राजभाषा िनयम 5 के अनुसार िहन्दी में पर्ा पतर्
या ह ताक्षिरत पतर् का उ र के वल िहन्दी में ही िदया जाना है । अतः सभी अिधकािरय /कमर्चािरय को िहन्दी
कायर्शालाओं के अध्ययन से राजभाषा नीित का समुिचत ान िदया जाना चािहए । िहन्दी में कायर् करने के िलए
साधन उपलब्ध हैं, आव यकता है के वल मानिसकता बदलने की ।
3.
अभ्यास का अभावः सै ांितक ान के अलावा यावहािरक ान का अभाव भी राजभाषा िहन्दी
में कायार्न्वयन में आने वाली पर्मुख अड़चन है । जब तक अिधकारी/कमर्चारी को अपने रोजमरार् का कायर्
िहन्दी में करने का अभ्यास नहीं होगा उन्हें कायर् करने के यवहािरक किठनाई महसूस होगी । अतः यावहािरक
अभ्यास का होना ज री है । यह अभ्यास कायर्शालाओं के माध्यम से कराया जाना चािहए ।
4.
अनुकूल वातावरण का अभावः कायार्लय का कायर् िहन्दी में करने के िलए अनुकूल वातावरण होना
चािहए, तािक लोग एक-दसू रे को देखकर, पर्ेरणा लेकर कायर् कर सकें । िजस कायार्लय में ऊपर से लेकर नीचे
के अिधकारी/कमर्चारी िहन्दी में कायर् करते हैं और उन्हें पर्ोत्साहन व प पुर कार भी िमलता है वहां पर
अनुकूल वातावरण होने से कायर् िहन्दी में िकया जाता है ।
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5.
मनोवै ािनक कारणः हम अंगर्ेजी ढरेर् पर िटकी कायर् पर्णाली के आदी हो चुके हैं । लंबे समय से
अंगर्ेजी सरकारी भाषा रह चुकी है और हमारी सोच तथा धारणा इस पर्कार बन गई है िक अंगर्ेजी में काम करना
बेहतर है क्य िक इससे वािषर्क गोपनीय िरपोटर् भी अच्छी िमलती है और इससे ज दी तरक्की िमलती है, जबिक
वा तव में ऐसा नहीं होता है ।
आम मानिसकता अंगर्ेजी पर त होने से िहन्दी में काम करने पर अिधकािरय /कमर्चािरय के
िदमाग से यह िझझक/डर रहता है िक दसू रे साथी कहीं यह न समझ लें िक इसे अंगर्ेजी नहीं आती है इसिलए
यह िहन्दी में काम कर रहा है । उसके िदमाग में भी यह िझझक रहती है िक अगर िहन्दी िलखने में उससे कोई
गलती हो गई हो तो कोई उसका मजाक न उड़ा ले, क्य िक अिधकांश अिधकारी/कमर्चारी अंगर्ेजी में पुरानी
फाइलें देखकर, नकल करके उसे आगे बढ़ाते हैं परन्तु िहन्दी में और उनका मागर्दशर्न करने वाला भी कोई नहीं
होता िजससे वे िहन्दी में िलखने का पर्यास पर्ारम्भ नहीं करते या हतोत्सािहत हो जाते हैं । िहन्दी का पर्योग करने
में सबसे बड़ी कावट भाषा के ान की नहीं बि क बनावटी डर एवं संकोच की है ।
कु छ लोग सोचते हैं िक आधुिनक ान-िव ान के क्षेतर् में पर्गित हािसल करने के िलए अंगर्ेजी
अिनवायर् है । लेिकन चीन, जापान, स आिद देश ने अंगर्ेजी के पर्योग के िबना हर क्षेतर् में पर्गित की है और
हमारे देश में भी हम अपनी भाषा का पर्योग करते हुए पर्गित हािसल कर सकते हैं । आव यकता के वल
मानिसकता बदलने की है ।
6.
बड़े अिधकािरय की उदासीनताः
पर्ायः देखा गया है िक बड़े अिधकािरय को िहन्दी में कायर्
करने का अभ्यास नहीं होने के कारण उन्हें िहन्दी में काम करने में किठनाई महसूस होती है इसिलए वे िहन्दी में
काम करने पर उसका अंगर्ेजी अनुवाद मांगते हैं । इससे अिधकारी/कमर्चारी को दो बार काम करने की मेहनत
से बचने के िलए अंगर्ेजी में काम करना अिधक आसान लगता है । अतः पहले िहन्दी में काम करना बड़े
अिधकािरय के तर पर शु होना चािहए और जो िहन्दी में काम नहीं कर पाते हैं उन्हें कायर्शालाओं में भेजकर
िहन्दी में काम करने का अभ्यास कराना चािहए ।
7.
िहन्दी जानने वाले अिधकािरय /कमर्चािरय और िहन्दी पद पर कायर्रत
अिधकािरय /कमर्चािरय ारा किठन िहन्दी का पर्योगः सरकार की राजभाषा नीित सरल तथा आम
बोलचाल की भाषा का इ तेमाल करना है । पर्ायः देखा गया है िक िहन्दी पद पर कायर्रत
अिधकािरय /कमर्चािरय ारा अनुवाद या िटप्पण/पर्ा पण में सं कृ तिन शब्द का पर्योग कर उसे द ु ह बना
िदया जाता है िजसे गैर-िहन्दी पद पर कायर्रत अिधकारी/कमर्चारी आसानी से समझ नहीं पाते हैं और उनके
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िदमाग में डर हो जाता है िक िहन्दी बड़ी किठन होती है । वे िहन्दी में काम नहीं कर पाएंगे । परन्तु यह ज री
नहीं है िक अन्य अिधकारी/कमर्चारी भी िहन्दी पद पर कायर्रत यिक्तय की तरह िहन्दी िलखें । वे अपने िहन्दी
ान के अनुसार िहन्दी िलख सकते हैं ।
सरकारी कायर् में सरल एवं आम बोलचाल की भाषा का पर्योग करेः
िहन्दी िलखने
में यिद आपको अंगर्ेजी के िकसी शब्द की िहन्दी नहीं आ रही हो तो उसे वैसे ही िलख देना चािहए जैसे अंगर्ेजी
में Draft के िलए पर्ा प तथा मसौदा दो िहन्दी पयार्य हैं । आपको यिद इनकी िहन्दी नहीं आ रही हो तो िकए
नहीं िहन्दी (देवनागरी िलिप) में डर्ाफ्ट िलख दें या बीच में अंगर्ेजी में ही Draft िलख दें । जैसे - डर्ाफ्ट
अनुमोदन के िलए पेश है (मसौदा अनुमोदनाथर् पर् तुत) या Draft Approval के िलए पेश है । िहन्दी में
अंगर्ेजी के अनेक शब्द ऐसे आ गए हैं िजन्हें अलग करना किठन है । जैसे दधू में पानी घुल-िमल जाता है और
उसे अलग नहीं िकया जा सकता है । इसी पर्कार िहन्दी में इनका पर्योग हो रहा है जैसे फाइल, पेन, पेंिसल, रे ल,
बस, टेशन, टी.वी., रे िडयो, पंच, टेपलर, आिडट पाटीर्, बजट आिद । आप इनका इ तेमाल ऐसे ही कीिजए,
इनकी िहन्दी बनाने की ज रत नहीं है ।
देश की अन्य पर्ादेिशक भाषाओं के शब्द का पर्योगः सरकारी कायर् िहन्दी में करने में
अंगर्ेजी शब्द के अलावा देश के अन्य पर्ादेिशक भाषाओं के पर्चिलत शब्द अथार्त् उद,र् ू पंजाबी, मराठी,
सं कृ त के आम बोलचाल की भाषा के शब्द का पर्योग भी बेिझझक िकया जा सकता है । आप िहन्दी में सरल
शब्दावली का पर्योग करते हुए छोटे पतर्, िटप्पिणयां, आवेदन पतर् आिद िलख सकते हैं । बस िहन्दी का पर्योग
करना तो शु करें ।
डी.डी. ितवारी, उप िनदेशक (रा.भा.),
यय िवभाग, िव मंतर्ालय ।
क्या आप जानते हैःराजभाषा अिधिनयम, 1963 की धारा 3(3) तहत् सभी पर्कार के सामान्य
आदेश को ि भाषी प में अथार्त् िहन्दी और अंगर्ेजी में एक साथ जारी िकया जाना
चािहए ।
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किवता
इन्द ु कु करेती की किवताएं
शािन्त
आज का युग कहा जाता है
वै ािनक
और मानव है पर्स अपनी इस
उपािध पर
पर ।
कोई इस मदान्ध मानव को
समझाए
िक, क्या दे पाएगी मानिसक शांित
यह वै ािनकता
शायद तुम मेरी बात से सहमत
ना ह गे
पर वै ािनकता के नाम पर
नैितकता को ताक पर रख
िकए जाने वाले
िनत नए अणु परीक्षण-आयुध िनमार्ण
मानव और पशुओ ं की "क्लोिनंग"
िजनकी मंिजल है सृि का िवनाश
भला ऐसे में क्या िमल पाएगी
मानव को
वह मानिसक शांित
जो कर दे आत्मा को परमात्मा से
एकाकार
तब छोड़ क्य नहीं देते
सृि िवनाशक बम-आयुध का िनमार्ण
पर्कृ ित से छे ड़छाड़
और
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बढ़ते आध्याित्मकता की ओर
िजससे िमलेगी असीम शािन्त
हां ! वही आत्मा-परमात्मा
के िमलन की सुखानुभिू त ।
सुिधकोष
कै से भुलंगू ी बरस जो बीते यहां
संगी सािथय का प्यार-मनुहार
वो तकरार और अिधकार
िठठक रहे पाँव यहां तो
मन लालाियत पाने को मंिजल ।
जीवन डगर का यह पड़ाव
बढ़ा गया में सुिधकोष को
तन्हाईय में सुिधय की बारात
में आ िबछु ड़न की यह घड़ी
कभी खुली अलक से
कभी बंद पलक से
बरसने को कर देगी मज़बूर ।
नहीं ! हां कभी नहीं
भूल पाऊं गी बरस जो बीते यहां ।
समय चकर्
कौन है यहां ?
जो रहे शा त
जो कल थे वो आज नहीं
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जो आज है वो कल नहीं
कल आज और कल का
समय चकर् चले अनवरत
िफर क्य ?
मानव करे अिभमान
मैं हू,ं रहूगं ा सदा ।
क्य रहता उसे गुमान ?
भूल जाता है क्य वह
यह सुन्दर काया उसकी
अमानत है मशान की ।
बाद उसके है क्या ?
सवर्कािलक पर् है यह
कल का निचके ता भी था
अनु िरत
आज का निचके ता (िव ान) भी है
पर्यासरत
शायद
यह निचके ता हो जाए सफल ।
तब
कल आज और कल का चकर्
शायद कु छ जाएगा थम ।
पर
तब तक तो यह समय चकर्
यूं ही चलेगा अनवरत ।
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कामना
ख्वािहश है हमारी
करना तुम पूरी
सफलता के सोपान चढ़
मंिजल पाना तुम ऐसी
चंदा तो क्या गगन की दरू ी
भी लगे झूठी
अपना ानालोक से
िमटाना तमा ान यूं
सूरज की मिहमा भी
हो जाए धूिमल
लेिकन,
ख्वािहश का महल
उतर आर जब
यथाथर् के धरातल पर
तब ।
अवलोकन करते पथ पर
इस मुकाम को न िबसराना
जहां िबताए थे चंद क्षण
कु छ फू ल भरे कु छ कांटे भरे ।
इन्द ु कु करेती, सहायक लेखािधकारी,
यय िवभाग, िव मंतर्ालय ।
िहन्दी ारा सारे भारत को एकता के सतर्ू में िपरोया जा
सकता है ।
महिषर् दयानन्द सर वती
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लेख
समाज और िफ में
"िफ में समाज पर
बुरा असर डाल रही हैं । जी,
नहीं, िफ में असर नहीं डाल
रही बि क वा तिवकता यह
है िक समाज खुद िफ म को
पर्भािवत कर रहा है और
आईना अगर कु छ खराब
िदखाता है तो दोष आइने
का नहीं.....।" मेरे िवचार
में समाज िफ म को
पर्भािवत कर रहा है । अन्य
शब्द में िसनेमा समाज का
दपर्ण है । तत्कालीन
सामािजक पिरि थितयां ही
िफ म में िदखाई जाती रहीं
हैं ।
िफ में
अथवा
िसनेमा अपनी पटकथा
सामािजक पिरि थितय से
ही गर्हण करता है । चालीस के दशक की िफ में उस समय की सामािजक, आिथर्क, पािरवािरक पिरि थितय
का िचतर्ण करती हैं । आलमआरा जैसी िफ म इस तथ्य को पु करती है । चालीस तथा पचास के दशक की
िफ म में जमींदारी पर्था, िकसान ारा साहूकार से िलए ऋण से उनकी ददु श
र् ा, ईमानदारी की जीत आिद का
िचतर्ण हुआ है । इस समय िफ म में दो बीघा जमीन, ी 420, चलती का नाम गाड़ी, गाइड आिद पर्मुख हैं ।
इसके प ात साठ के दशक में जब सन् 1962 में भारत-चीन यु हुआ तथा भारत
पािक तान की 1965 की लड़ाई ने िफ म को काफी पर्भािवत िकया । मेरा वतन, आन, मदर इंिडया आिद
िफ में उस समय की पिरि थितय को दशार्ती हैं । जब सन् 1962 में भारत-चीन यु हुआ तो हजार भारतीय
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सैिनक शहीद हुए । तत्कालीन िफ में शहीद सैिनक के पिरवार ारा िदए गए बिलदान को दशार्ती हैं । इन
िफ म में यह िदखाया गया िक िकस पर्कार की मानिसक पीड़ा से सैिनक पिरवार, चाहे वह मां हो, पत्नी हो या
ब े ह , गुजरते हैं । इन िफ म में हम यह भी देखते हैं िक मजबूत पािरवािरक संबंध शहीद सैिनक की मां,
पत्नी तथा ब को आिथर्क एवं नैितक सहारा पर्दान करते हैं । वा तव में यह उस समय पर्चिलत संयक्त
ु
पिरवार मू य को ही दशार्ता है । प्यासा तथा पाकीज़ा जैसे िफ में ी की तत्कालीन ि थित को िदखाती हैं ।
स र के दशक में सन् 1972 के बाद का समय काफी हद तक शािन्तपूणर् ही बीता, इसिलए
इस दशक में हमें रोमांस तथा संगीत से भरपूर िफ में देखने को िमलीं । सन् 1972 में हुए भारत-पाक यु को
भी िफ म में दशार्या गया । स र के दशक में जहां देश हिरत कर्ांित के सुनहरे दौर से गुजर रहा था वहीं परमाणु
परीक्षण कर वह एक परमाणु शिक्त बन चुका था, रा टर् वावलंबी बन रहा था । इस दशक की िफ म में मेरे देश
की धरती, मेरा नाम जोकर आिद पर्मुख हैं । भारत- स संबंध मजबूत हो रहे थे, ये सब हम तत्कालीन िफ म
में देखते हैं । अ सी के दशक में देश औ ोिगक तरक्की कर रहा था, हिरत कर्ांित से देश के अनाज भंडार भरे पड़े
थे तो इस समय की िफ म में रोमांस तथा संगीत की पर्धानता थी । ये िफ में ये दशार् रही थीं िक आम आदमी
खुश है तथा उसकी आव यकताएं सीिमत हैं तथा वे पूणर् हो रही हैं ।
नब्बे का दशक आतंकवाद, भर् ाचार, क्षेतर्वाद के दौर से गुजरा तो इस समय की िफ म में
हम देखते हैं िक आतंकवाद का सही िचतर्ण िफ म में िकया गया है । वैसे तो आतंकवाद ने अपने कदम अ सी
के दशक से ही देश में रख िदए थे, अमृतसर के वणर् मंिदर से आतंकवािदय को खदेड़ने के िलए ऑपरे शन ब्लू
टार चलाया गया । सन् 1984 में तत्कालीन पर्धानमंतर्ी ीमती इंिदरा गांधी की हत्या िफर सन् 1991 में िल े
ारा ी राजीव गांधी की हत्या आिद से तत्कालीन िसनेमा पर्भािवत हुआ । क मीर में बढ़ते आतंकवाद के
पर्भाव को रोजा िफ म में पर्भावशाली ढंग से िदखाया गया है । िहन्द-ू मुसिलम दंग को भी तत्कालीन िफ म में
पर्भावशाली ढंग से िदखाया गया है ।
नब्बे के दशक में जहां हमें एक ओर िफ म में आतंकवाद दंगा-फसाद क्षेतर्वाद देखने को
िमला वहीं उदारीकरण से देश में हुई तरक्की भी िफ म में देखने को िमली । देश के आिथर्क तर में हुई पर्गित ने
िफ म में यह िदखाया िक अब आम आदमी भी सूट-बूट पहनने लगा है, उसके रहने के िलए एक सुख सुिवधा
पूणर् घर है । भारतीय सभ्यता के मू य को भी िफ म में दशार्या गया । राज ी पर्ोडक्शन की मैंने प्यार िकया
अपने समय की िहट िफ म में िगनी जाती है । भारतीय सं कृ ित पर िवदेशी सं कृ ित के पर्भाव को अब िफ म
तथा समाज में प प से देखा जाने लगा है । िदल वाले दलु हिनयां ले जाएंगे, परदेश आिद िफ में बदलती
सामािजक पिरि थितय तथा िवदेशी सं कृ ित से पर्भािवत भारतीय सं कृ ित में बदलाव को दशार्ती हैं िफ म के
नायक-नाियकाओं के व पर िवदेशी पर्भाव प है ।
सन् 2000 से अब तक की िफ म में हम देखते हैं िक बदलते हुए सामािजक मू य , िवदेशी
सं कृ ित का पर्भाव, उदारीकरण, खुलेपन की मांग, मिहला जागरण एवं सशक्तीकरण से आज की नाियका अपने
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िनणर्य वयं ले रही है । जहां एक तरफ नायक-नाियका की वेश-भूषा में बदलाव आया है वहीं अब नाियका
एक गृिहणी नहीं है वह अपने पािरवािरक उ रदाियत्व के साथ-साथ उ पद पर बेहतर काम कर रही है ।
कारिगल यु ने भी हमारी कई िफ म को पटकथा दी है तथा ये िफ में जैसे बॉडर्र सुपरिहट
भी रही है । ये सब तो यही दशार्ता है िक िफ में समाज का आईना हैं तथा ये वही दशार्ती है जो कु छ समाज में
घिटत हो रहा है । िफ म कॉरपोरे ट में यह दशार्या गया है िक एक कं पनी के अिधकारी िकस पर्कार दसू री कं पनी
की तकनीकी तथा टर्ेटेिजक जानकारी हािसल करने के िलए धन तथा ी का पर्योग करते हैं । ये िफ म जहां
एक ओर यह िदखाती है िक िकस पर्कार पराई ी से संसगर् एक योग्य अिधकारी को भर् कर पतन की ओर ले
जाता है वहीं दसू री ओर यह भी दशार्या गया है िक पािरवािरक मू य की जगह धन ने ले ली है । लोग धन के
िलए सभी िर ते दाव पर लगा देते हैं । पैसे के बल पर आप अपने खराब उत्पाद भी घूस देकर, क्वािलटी परीक्षण
सही करवा लेते हैं । यह जगजािहर है िक ये िफ म मुख्य तौर से पेप्सी और कोका-कोला की आपसी लड़ाई
को ही दशार्ती हैं ।
िफ म पेज थर्ी में समाज में फै ली तमाम बुराइय को दशार्या गया है । िबगड़े अमीरजाद ारा
क्लब में डर्ग्स लेना, अनाथ आ म चलाने वाल ारा अनाथ आ म के ब के साथ कु कमर्, मॉडिलंग के बड़े
एसाइनमेंट लेने के िलए समलैंिगक संबंध बनाने के िलए मजबूर उभरते मॉडल, नई अिभनेितर्य का िनमार्ता,
िनदेर्शक ारा शारीिरक एवं मानिसक शोषण, बदलते सािमजक मू य जो युवक-युवितय को पतन की राह पर
ले जा रहे हैं, आिद समाज में फै ली तमाम बुराइय को बड़े ही पर्भावशाली अंदाज में िफ म में दशार्या गया है ।
मैं, पर्िस िफ म िनदेर्शक के वक्त य से िक समाज िफ म को पर्भािवत कर रहा है, पूणर्तया
सहमत हू,ं परन्तु यहां पर मैं प कर देना चाहती हू ं िक िफ म का भी समाज के पर्ित दाियत्व है । चूंिक िफ म
बनाने वाल का भी समाज के पर्ित दाियत्व है । चूंिक िफ म बनाने वाल को सभी संसाधन, धन, नायकनाियकाएं, कथानक, पटकथा, पृ भूिम आिद समाज से ही पर्ा हो रहे हैं तो उनका यह दाियत्व बन जाता है िक
वे सामािजक पिरपर्े य को िजम्मेदारीपूवर्क दशार्एं । िफ म में अ ीलता, दंगा-फसाद, आपसी वैरभाव आिद
को पर्धानता नहीं देनी चािहए । जहां गु िफ म में यह िदया जाना िक िबजनेस मैन िकस पर्कार अपने
राजनीितक सूतर् से अपने पर्ित िं दय को मात देते हैं । जन साधारण का पर्चािलत पर्शासन यव था से िव ास
उठाता है, ठीक उसी पर्कार िफ म में िदखाए गए जातीय दंगे जनमानस में आपसी पर्ेम भाव के थान पर षे
पैदा करते हैं । आए िदन हम समाचार पतर् में पढ़ते हैं िक अमुक अपराधी ने अपराध की पूणर् योजना िकसी
िफ म से पर्ेिरत होकर बनाई । कहने का अथर् यही है िक िफ म िनमार्ता िनदेर्शक का समाज के पर्ित एक
उ रदाियत्व बनता है िक वे यिद एक और समाज में फै ली बुराइयां िफ म में िदखा रहे हैं वहीं वे उसी िफ म में
यह भी िदखाएं िक बुरा काम करने पर यिक्त बुराई पी गतर् में फं सता ही चला जाता है । पर्त्येक िफ म
िनमार्ता-िनदेर्शक को अपनी िफ म में सामािजक दशा िदखाते समय एक संदश
े भी देना चािहए िक िकस पर्कार
समाज में फै ली बुराइय को दरू कर एक व थ समाज की थापना की जा सकती है । िकसी महापु ष ने कही
भी है िक- जैसी ि वैसी सृि ।
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अथार्त िजस नजिरए से समाज को देखोगे आपको वैसा ही नजर आएगा । अतः िफ म िनमार्ता-िनदेर्शक को
चन्द पैसे कमाने के िलए अंग पर्दशर्न, आइटम संगीत आिद के पर्योग से परहेज करना चािहए । के वल यह कह
देना िक िफ में महज आईना है और आईना अगर कु छ खराब िदखाता है तो दोष आइने का नहीं ..... । अपने
उ रदाियत्व से प ा झाड़ना ही दशार्ता है िक िफ म िनमार्ता-िनदेर्शक समाज के पर्ित उनके उ रदाियत्व से मुख
नहीं मोड़ सकते । यिद िफ म िनमार्ता-िनदेर्शक सामािजक पिरि थितय को दशार्ने के साथ-साथ समाज के
पर्ित अपने उ रदाियत्व का भी वहन करें तो वह िदन दरू नहीं जब हम राम राज्य का महात्मा गांधी जी का वप्न
पूरा होते हुए देखेंगे ।
नीलम शमार्, सहायक, यय िवभाग, िव मंतर्ालय
इस िनबंध को वषर् 2007 के िहन्दी पखवाड़े के दौरान आयोिजत िनबंध पर्ितयोिगता में काफी सराहा गया ।
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िनबंध
हमारे लोकतंतर् की पर्मुख सम याएं
जैसा िक हम जानते
हैं िक भारतीय लोकतंतर् िव के सबसे
बड़े लोकतंतर् में से एक है । भारतीय
लोकतंतर् वतंतर्ता के बाद से अभी तक
िविभ सम याओं के होते हुए और
उनको आसानी से झेलते हुए भी अपने
आपको सुरिक्षत िकए हुए है । साथ ही
जब हम िव के अन्य लोकतंतर् से
भारतीय लोकतंतर् की तुलना करते हैं तो
भारतीय लोकतंतर् को बहुत ही
शिक्तशाली पाते हैं । हमारे सामने िव
के देश के ऐसे उदाहरण हैं िजन्ह ने
आंतिरक या बाहरी सम याओं के
चलते अपने लोकतंतर् को िम ी में
िमलते हुए देखा है । जैसा िक हम
जानते हैं िक लोक तंतर् का अथर् है-
"जनता का शासन, जनता के िलए, जनता ारा शासन ।"
यह भारतीय लोकतंतर् की ही िवशेषता है िक अपनी यापकता एवं बड़ी-बड़ी सम याओं के
बावजूद भी इसने अपने अि तत्व को बचाए रखा है । लेिकन इन िवशेषताओं के बाद भी भारतीय लोकतंतर् में
कु छ ऐसी सम याएं हैं िजनको दरू िकए िबना भारतीय लोकतंतर् की भिव य की राह बहुत ही किठन होने वाली
है । भारतीय लोकतंतर् की िवशेषताओं के साथ जो सम याएं हैं उनको हम िनम्निलिखत पर्कार से देख सकते
हैः1.
अिशक्षाः
भारतीय लोकतंतर् की एक बहुत बड़ी एवं महत्वपूणर् सम या है अिशक्षा, िजसको दरू िकए
िबना हम एक सफल एवं व थ लोकतंतर् का सपना नहीं देख सकते हैं । भारत को गांव का देश कहा जाता है,
क्य िक यहां की अिधकांश जनता गांव में ही रहती है और गांव में िशक्षा का पर्ितशत काफी कम है । अतः
सफल एवं व थ लोकतंतर् के िलए सभी नागिरक का िशिक्षत होना आव यक है, क्य िक एक अिशिक्षत
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नागिरक को अपने अिधकार एवं कतर् य का ठीक ढंग से ान नहीं होता है और जब तक भारत के सभी
नागिरक को अपने अिधकार एवं कतर् य का ठीक ढंग से ान नहीं होता तब तक हम भारतीय लोकतंतर् के
व थ एवं उ वल भिव य का सपना नहीं देख सकते ।
2.
अपराधीकरणः
भारतीय लोकतंतर् की सम याओं में वतर्मान पिरि थितय को देखते हुए सबसे बड़ा नाम है
राजनीित का अपराधीकरण । वतर्मान समय के राजनेताओं को अगर ठीक ढंग से देखें तो पता चलता है िक
कु छ नेताओं को छोड़कर ज्यादातर नेता अपराधी पृ भूिम के हैं और इनमें सभी के ऊपर लगभग दजर्न भर
मुकदमे चल रहे हैं और अपराधी पृ भूिम वाले नेता िवकास एवं संवधै ािनक पर्ावधान की अनदेखी करते हुए
के वल िनजी वाथ हेतु ही कायर् करते हैं । अतः एक व थ एवं सफल लोकतंतर् हेतु राजनीित में बढ़ते हुए
अपराधीकरण को रोकना होगा ।
3.
गरीबीः
भारत की लगभग एक-ितहाई जनता का गरीबी रे खा से नीचे गुजर-बसर करना यहां की
लोकतंतर् की एक बड़ी सम या है, क्य िक जो लोग गरीब होते हैं वो अपने खाने-पीने एवं रहने की यव था
करने में ही अपना सारा समय लगाते हैं और देश की राजनीित में क्या हो रहा है, उनके अिधकार एवं कतर् य
क्या हैं, इन बात से अनिभ रहते हैं । इस पर्कार जब तक सभी लोग जाग क नहीं ह गे तब तक एक व थ
लोकतंतर् की क पना नहीं की जा सकती है ।
4.
नागिरक में जाग कता का अभावः
हम देखते हैं िक भारतीय नागिरक में िनवार्चन एवं िनवार्चन संबंधी अन्य िकर्या-कलाप का
अभाव पाया जाता है िजसके कारण िनवार्चन मतदाता का पर्ितशत कभी-कभी 50 पर्ितशत से भी कम पाया
जाता है । मतदान में ज्यादातर नागिरक अ िच िदखाते हैं और यह सब एक व थ लोकतंतर् के अशुभ लक्षण
हैं । अतः एक सफल लोकतंतर् के िलए नागिरक का जाग क होना अित-आव यक है ।
5.
िनवार्चन आयोग का लचील रवैयाः
अगर हम भारतीय लोकतंतर् को सफल एवं व थ देखना चाहते हैं तो िनवार्चन आयोग को
कड़ा ख अपनाना होगा । अगर हम ी टी.एन. शेषन, पूवर् मुख्य िनवार्चन आयुक्त से पूवर् का कायर्काल देखें
तो लगभग हमेशा ही िनवार्चन आयोग का रवैया लचीला रहा है िजससे िक भारतीय राजनीित में अपराधीकरण
का आसानी से पर्वेश हो गया और ये अपराधी राजनीित में आकर जनिहत को ताक पर रखकर के वल अपना
उ ु साधते रहे । वतर्मान समय में तो कई िवधान सभाओं यहां तक िक संसद में भी जनपर्ितिनिधय ारा आपस
में मार-पीट की घटनाएं सामने आई ं िजससे िक भारतीय लोकतंतर् शमर्सार हुआ ।
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अतः िनवार्चन आयोग को कड़ा ख अपनाते हुए राजनीित में अपराधीकरण को रोकना
चािहए तािक हम एक व थ एवं उ वल लोकतंतर् की कामना कर सकें ।
6.
छातर् शिक्त का द ु पयोगः
वतर्मान पिरपर्े य में अगर हम देखें तो छातर् शिक्त अपने उ े य से भटक गई है और राजनेता
एवं पािटर्यां अपने-अपने उ े य की पूितर् हेतु इनका उपयोग करने लगे हैं । जबिक हम जानते हैं िक छातर् शिक्त
एवं छातर् नेता ही वतर्मान भारतीय लोकतंतर् का भिव य हैं । अतः छातर् शिक्त का अपने उ े य से भटकाव
भारतीय लोकतंतर् के िलए शुभ संकेत नहीं है ।
7.
राजनेताओं में देशभिक्त की भावना का अभावः
वतर्मान समय में अगर हम देखें तो कु छ नेताओं को छोड़कर ज्यादातर में देश भिक्त की भावना
का अभाव है और ये नेता देश भिक्त की जगह विहत को वरीयता देते हैं । कभी-कभी तो ये विहत की पूितर्
की खाितर संवधै ािनक पर्ावधान को भी ताक पर रख देते हैं । जो िक एक व थ लोकतंतर् के िलए अच्छा नहीं
है ।
8.
राजनीितक पािटर्य का उ े य से भटकाव तथा संिवधान का लचीलापनः
हम देखते हैं िक कु छ राजनैितक दल का गठन एक व थ उ े य की खाितर होता है साथ
ही ये पािटर्यां इन्हीं उ े य के बल पर जनता ारा िनवार्िचत होकर सरकार बना लेती हैं पर सरकार में आते ही
अपने उ े य से भटक जाती हैं और अपनी सरकार बचाने में लग जाती हैं इस हेतु ये संवधै ािनक पर्ावधान से
भी छे ड़छाड़ करती हैं । यह भारतीय लोकतंतर् की एक बहुत बड़ी सम या है । अतः सभी राजनीितक पािटर्य को
चािहए िक वे अपने उ े य पर कायम रहें ।
भारतीय संिवधान का लचीलापन कभी-कभी भारतीय लोकतंतर् के िलए खतरा बनता िदखता
है क्य िक इसी लचीलेपन का फायदा राजनीितक पािटर्यां एवं नेता अक्सर अपने िहत हेतु उठाते हैं ।
9.
मीिडया का अपने कतर् य /उ े य से भटकावः
भारतीय लोकतंतर् की सम याओं में हम मीिडया के अपने कतर् य से भटकाव को भी रख
सकते हैं । हम जानते हैं िक मीिडया समाज का आइना होता है । एक सफल लोकतंतर् में मीिडया की पर्मुख
भूिमका होती है । लेिकन वतर्मान समय में मीिडया अपने कतर् य का ठीक ढंग से िनवार्ह नहीं करता है और
जनता के सामने भारतीय राजनीित की सही त वीर रखने में असफल रहा है और अगर जनता के सामने
राजनीित की सही त वीर नहीं आएगी तो वह भी अपने कतर् य का सही ढंग से िनवार्ह करने में असफल होगा ।
अतः यह भी एक गंभीर सम या उभर कर सामने आई है ।
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इस पर्कार इन उपयुक्त
र् सम याओं को देखते हुए हम यह कह सकते हैं िक जब तक ये सम याएं
भारत में बनी रहेंगी तब तक हम एक व थ एवं उ वल भारतीय लोकतंतर् की क पना नहीं कर सकते हैं । इन
सम याओं को दरू करने में सबसे बड़ी भूिमका नागिरक की जाग कता एवं समाज में एक व थ मीिडया का
होना अितआव यक है । क्य िक जब तक जनता अपने अिधकार एवं कतर् य के पर्ित जाग क नहीं होगी और
भारतीय लोकतंतर् की सम याओं को दरू करने में अपनी भूिमका को नहीं समझेगी तब तक भारतीय लोकतंतर् का
भिव य व थ एवं उ वल नहीं हो सकता । नागिरक को जाग क करने में सबसे बड़ी भूिमका भारतीय
मीिडया ही िनभा सकता है । अतः भारतीय मीिडया को चािहए िक वह अपनी भूिमका का िनवार्ह सही ढंग से
करे तािक हमारे भारतीय लोकतंतर् के व थ एवं उ वल भिव य का सपना पूरा हो सके ।
ी राके श कु मार िसंह, सहायक, यय िवभाग, िव मंतर्ालय
भारतीय लोकतंतर् को िव के सबसे बड़े और सुगिठत लोकतंतर् में से एक माना जाता है । िकन्तु हमारी भाषायी सां कृ ितक,
भौगोिलक और सामािजक िविवधताएं इसे अ तु शिक्त ही पर्दान नहीं करती अिपतु कई बार इसे एक सम याओं से संघषर्रत
लोकतंतर् के प में िचि त करती हैं । सम याओं के इन्हीं अंतसबंध पर उनके इस िनबंध को वषर् 2007 के िहन्दी पखवाड़े
के दौरान आयोिजत िनबंध पर्ितयोिगता में काफी सराहा गया ।
क्या आप जानते हैं:राजभाषा िनयम 12(1) के तहत् के न्दर्ीय सरकार के पर्त्येक कायार्लय के पर्शासिनक पर्धान का यह
उ रदाियत्व है िक वह सुिनि त करे िक राजभाषा अिधिनयम और राजभाषा िनयम के उपबंध का समुिचत
प से अनुपालन हो रहा है और इस पर्योजन के िलए उपयुक्त और पर्भावकारी जांच के उपाय करे ।
थायी पर्कार के सभी आदेश, िनणर्य, अनुदश
े , पिरपतर् जो िवभागीय पर्योग के िलए ह तथा ऐसे सभी
आदेश, अनुदश
े , पतर्, ापन, नोिटस, पिरपतर् आिद जो सरकारी कमर्चािरय के समूह अथवा समूह के संबंध
में या उनके िलए ह , राजभाषा अिधिनयम, 1963 की धारा 3(3) के अधीन सामान्य आदेश कहलाते हैं ।
राजभाषा िनयम 6 के अन्तगर्त द तावेज पर ह ताक्षर करने वाले यिक्त का उ रदाियत्व है िक वह यह
सुिनि त कर ले िक वह द तावेज िहन्दी और अंगर्ेजी दोन ही में तैयार की गई है, िन पादन की गई है या जारी
की गई है ।
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किवता
रेखा िब की किवताएं
गु
वेद , पुराण में हमने पढ़ा है,
जग में बड़ा बस गु ही बड़ा है ।
कहीं भी पहुचं ने का ये रा ता है,
तुम्हें चलना है इसपे, हां ये कड़ा है ।
ऊं चाईय को भी उसने है पाया,
कथनी गु की जो यवहार में लाया ।
ये पल आपने आज जो हमको िदया है,
हमारे िलए हर खुशी से बड़ा है ।
आज आपके पथ पर हम सब खड़े हैं,
पर कल भी थे, आज भी आप बड़े हैं ।
हमारे िलए आपने जो िकया है,
हम शब्द में उसके बंया ना करें गे ।
शब्द दिु नया में हैं ही नहीं वो,
जो दजार् गु का बंया कर सकें गे ।।
भूत
इिम्तहान का भूत मेरे सर पर चढ़ कर बोल रहा है,
सारा साल तो पढ़ा नहीं, अब क्य मेरा मन डोल रहा है ।
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िहन्दी में सािहत्य पढ़ाते, आिदकाल और रीितकाल का,
आधुिनक काल के वासी हम, हमें क्या करना उस गए काल का ।
जाने क्य कापी का प ा, उस गए काल को कोल रहा है,
सारा साल तो पढ़ा नहीं, अब क्य मेरा मन डोल रहा है ।
अंगर्ेजी का नाम लेते ही, मुहं पे पसीना आता है,
A से Z तक शब्द कोई भी हमें समझ नहीं आता है ।
पेपर में आया सवाल, A क्या उ ारण बोल रहा है,
सारा साल तो पढ़ा नहीं, अब क्य मेरा मन डोल रहा है ।
इितहास हमारा खतरनाक था, अकबर बाबर से जुड़ा,
पर् आया िक बक्सर का यु िकसने कब और कहां लड़ा ।
पढ़कर पर् को आया गु सा, अब तक ये मन खौल रहा है,
सारा साल तो पढ़ा नहीं, अब क्य मेरा मन डोल रहा है ।
डोले ना मन कभी आपका, ब ो याद ये रखना,
जो कभी पढ़ाए तुमको िशक्षक, समझ से उसको रटना ।
ऐसा न हो मेरी तरह तुम सबका भी मन बोल रहा है,
सारा साल तो पढ़ा नहीं, अब क्य मेरा मन डोल रहा है ।
रेखा िब
बी.ए., ि तीय वषर्, एस.पी.एम. कालेज, पंजाबी बाग ।
िहन्दी को रा टर्भाषा बनाने का िनणर्य िकसी एक यिक्त का नहीं, बि क
संपूणर् रा टर् का है ।
कन्हैयालाल मािणकलाल मुंशी
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िवशेष संदभर्/द तावेज
संपकर् भाषा िहन्दीः ऐितहािसक एवं सां कृ ितक पिरपर्े य
भाषा के यापक
ऐितहािसक-सां कृ ितक आयाम
को ि में रखे िबना उस पर
साथर्क िवमशर् संभव नहीं है । भाषा
के माध्यम से अपने को यक्त करने
की पर्िकर्या में ही मनु य ने अपनी
तमाम धुंधली अनुभिू तय , अमूतर्
क पनाओं एवं अ फु ट िवचार के
कु हासे से िनकलकर एक ठोस ि
और िदशा पाई है । उसी के ब्याज
से उसने अपने को खोजा और
पर्ा िकया है, अपनी अनंत
क्षमताओं एवं संभावनाओं को मूतर्
और साकार िकया है । मनु य की
िनत नवीन िज ासा, संवेदना,
रागात्मकता,
आध्याित्मकता,
उसके भावोदर्ेक और उसका
स दयर्-बोध भाषा के माध्यम से ही
पाकार गर्हण करते हैं जो उसे
जगत और जीवन को समझने और
उन्हें बदलने की आकांक्षा और
सामथ्यर् पर्दान करते हैं । भाषा ही
संपर्ेषण और िविनमय का वह अचूक औजार है िजसके सहारे मनु य ने समाज की रचना की है और सामूिहक
एवं संगिठत पर्यास से सभ्यता और सं कृ ित, ान और िव ान का वह िवशाल ताना-बाना बुना है जो उसे
उसकी आिदम अव था से, िजसमें वह अन्य पर्ािणय से थोड़ा ही बेहतर रहा होगा, इतनी दरू ले आया है ।
भाषा का एक उलट पक्ष भी है । यह िवडंबना ही है िक जो भाषा मानव सभ्यता के िवकास में
इतनी िनयामक रही है, उसने मनु य को पर पर िवभािजत भी िकया है, उनमें षे , िवरोध और यु तक को
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जन्म िदया है । मनु य की िवकास-यातर्ा में अनेक जिटल कारण से िभ -िभ पर्देश में रहने वाले मानवसमूह में एक-दसू रे से असंपृक्त ऐसी भाषाएं िवकिसत हुई िजनमें पर पर कोई सेतु नहीं था । जो भी हो,
कालांतर में समान भाषा-भािषय में अपने को एक और अन्य भाषा-भािषय से अलग समझने की िवभाजक
पर्वृि इस कदर हावी हुई िक भाषा के आधार पर अनेक रा टर्ीयताएं वजूद में आई ं और उनमें एक-दसू रे को
दबाने और आिधपत्य थािपत करने की होड़ लग गई । यूरोप का इितहास इन भाषा-के िन्दर्त रा टर्ीयताओं के
पर पर संघष और िवनाश-लीलाओं से भरा है । इनके अनेक प और िनिहताथर् आज भी देखे जा सकते हैं ।
जब एक समुदाय दसू रे समुदाय पर आिधपत्य थािपत करता है तो िजस चीज का सबसे
अिधक क्षरण होता है वह है िविजत समुदाय की भाषा । और भाषा महज भाषा नहीं होती, अनन्त िवचारसरिणय , मनोभाव , मुहावर , कहावत , भावािभ यिक्तय , उ ार और गीत -पर्गीत की एक वृहत दिु नया होती
है जो शनैः-शनै दम तोड़ती है और कभी-कभी तो समूल न हो जाती है । पर्ाचीन िम , िसंधु घाटी और
मेसोपोटेिमया की भाषाओं का क्या हुआ ? इन भाषाओं के साथ िकतना कु छ लु हो गया ? भारत में पाली
और पर्ाकृ त से अज भंडार में से िकतना बचा रहा गया है ? राहुल सांकृत्यायन को ितब्बत की यातर्ा में भारत
में रचे िकतने सारे अनुलब्ध पाली गर्ंथ का कोष िमला था । सं कृ त के भंडार में से भी जाने िकतना खो गया
है । शूदर्क और भास के नाटक और कौिट य के अथर्शा की खोज हुए अभी बहुत िदन नहीं बीते । ऐसा ही
िकतना कु छ और लु पड़ा होगा । भाषाओं के क्षरण के चलते िव की िवशाल बौि क-सां कृ ितक िवरासत
का िकतना छोटा अंश आज हमारे पास रह गया है ।
एक भाषा ारा दसू री भाषा को दबाने और उसका थानाप करने की पर्िकर्या सामर्ाज्य
िव तार और स ा पिरवतर्न की पर्िकर्या से जुड़ी है । संपर्भु वगर् हमेशा अपनी भाषा कमजोर और शािसत वगर् पर
थोपने का पर्यास करता है । रोमन सामर्ाज्य की थापना और उसके िव तार के साथ लैिटन भाषा सारे यूरोप में
छा गई और अंगर्ेजी सिहत आधुिनक यूरोपीय भाषाओं को उसकी जकड़ से मुक्त होने में िकतना संघषर् करना
पड़ा । जार-शािसत सामर्ाज्य में सी भाषा ने तमाम थानीय भाषाओं को दबाकर अपना वचर् व कायम
िकया । भारत में मुसिलम शासन के आगमन के साथ फारसी का बोलबाला हुआ । बाद में अंगर्ेजी ने फारसी को
िव थािपत िकया । और अंगर्ेजी का दबदबा तो आज भी कायम है, बि क बढ़ रहा है ।
जब स ा के माध्यम से एक भाषा दसू री भाषा पर पर्भुत्व थािपत करती है तो शािसत की
भाषा के साथ-साथ उनकी जातीय मृितयां, उनके वीर की गाथाएं, उनके सां कृ ितक पर्तीक और धीरे -धीरे
उनकी अि मता और पहचान खो जाती है । शासक और शािसत की भाषाओं में भेद होने से स ा की संरचना में
भाषा का अिनवायर् इ तेमाल होता है । शासक की भाषा के जानकार एक िवशेषािधकार-संप वगर् बनाते हैं
और उससे वंिचत लोग दसू रे दजेर् के नागिरक होकर रह जाते हैं । यह ं और दरू तक जाता है । शासक वगर्
शािसत जनता के मनोभाव , आशाओं-आकांक्षाओं और िचंतन-पर्िकर्या से काफी कु छ अंजान रहता है िजससे
शासक के प में उसकी क्षमता बािधत होती है । दसू री ओर शासक वगर् से संवाद कायम न कर पाने के कारण
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शािसत जनता में कुं ठा और हताशा पैदा होती है, वह अपना जातीय वािभमान खो देती है और उसके नैितक
चिरतर् में जो ास होता है वह उसे धीरे -धीरे िजम्मेदार नागिरक की भूिमका िनभाने के अयोग्य बना देता है ।
यिद भारत में अंगर्ेजी राज न आया होता तो आज हम अंगर्ेजी न जानते होते । अिधक से
अिधक यहां अंगर्ेजी की वह ि थित होती जो स, जापान और चीन में है । िन य ही वह कोई शोचनीय ि थित
न होती । जब यूरोपीय लोग यहां आए, िव -समुदाय में आिथर्क और यापािरक ि से भारत का थान
पृहणीय था । सन् 1453 में कु तुनतुिनया पर तुक का कब्जा हो जाने से भारत और यूरोप के बीच यापार का
थल मागर् बन्द हो गया । इसके पहले अरब यापारी के ऊँ ट के कारवां भारत से मलमल, मसाले, हाथी दाँत
के सामान और लोहे के औजार यूरोप के बाजार में ले जाया करते थे जहां से आने वाले सोने-चाँदी से यहां की
ितजोिरयां भरी थीं । थल-मागर् बन्द हो जाने से यूरोपीय बाजार में भारत का माल न पहुचं ने के कारण वहां
खलबली मच गई, खासकर यूरोप का समृ वगर् मसाल और मलमल के अभाव में बेहद मायूस हो गया ।
अपने नौ-सैिनक बेड़ के कारण उन िदन पेन और पुतर्गाल ही यूरोप की दो पर्मुख शिक्तयां थीं । इन दोन में
भारत का जलमागर् खोज िनकालने की होड़ लग गई । पोप के एक "बुल" के आधार पर पेन ने पि म और
पुतर्गाल ने पूरब की ओर बढ़ते हुए भारत का जलमागर् खोजने का अिभयान चलाया । इसी पर्िकर्या में
आकि मक प से अमेिरका की खोज हुई और अंततः 1498 में वा कोिडगामा भारत पहुचं गया । िव इितहास का वह एक िनणार्यक िदन था । वह यूरोप के उत्थान का और एिशया के पतन का बीज-िबन्द ु था ।
भारत के अतीत का जो टु कड़ा योरोपी यापािरय के आगमन और बाद में अंगर्ेज के स ा में कािबज होने और
हमारे अंगर्ेजी भाषा के संपकर् में आने के साथ जुड़ा है, वह बहुत सुखद नहीं है ।
जो भाषा भारत में राजनीितक उपिनवेशवाद और सामर्ाज्यवाद के औजार के प में आई थी,
वही आज न सां कृ ितक उपिनवेशवाद और वै ीकरण की आड़ में पनपते यूरो-अमेिरकन वचर् ववाद की वाहक
बन कर जीवन के हर पहलू पर छा गई है । आज अंगर्ेजी िव -बाजार की भाषा है और सारे िव को
बाजारवाद और उपभोक्तावाद के आगोश में समेटने के िलए जो अिभयान चल रहा है उसकी संवािहका है । यह
अिभयान हमें यवसायीकृ त, एकल सं कृ ित और एक-धर्ुवीय िव की ओर ले जाता है िजसमें कला, सािहत्य,
दशर्न सभी पर्ायोिजत और िव ापन-के िन्दर्त बनकर िजन्स की तरह िबकाऊ हो जाते हैं । िव यापी इलेक्टर्ॉिनक
मीिडया हमारी सोच, संवेदना, स दयर्-बोध, झान, मू य और जीवन-शैली को तय करता है, हमारी
पर्ाथिमकताओं, हमारे पािरवािरक-सामािजक संबंध को िनधार्िरत करता है । मानव संबंध की ऊ मा खत्म हो
जाती है, समाज का ढांचा मातर् लेन-देन पर आधािरत होकर अपनी जीवंतता खो देता है । मनु य का आभ्यंतर
सूखता जाता है, उसकी रचनात्मक ऊजार् कुं िठत हो जाती है । िव अपनी वतः फू तर्ता और बहुलता खोकर
सां कृ ितक प से दिरदर् हो जाता है । इस पर तुरार् यह िक हम खुश-खुश अपनी इय ा को भूलकर इस िव
यापी, एक प दासता को वीकार कर रहे हैं, बि क इसका आ ान कर रहे हैं । इस मू य पर भी भौितक
समृि िकतने लोग तक पहुचं ती है, यह देखने की बात है । अंगर्ेजी िव -बाजार की भाषा हो सकती है पर
हमारी मौिलक सोच, संवेदना, कला और सृजन का माध्यम नहीं बन सकती क्य िक इन चीज का उत्स हमारे
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आभ्यांतर में है िजस पर हमारी सुदीघर्
परम्परा के अिमट सं कार हैं । इन क्षेतर्
में अंगर्ेजी माध्यम से िकया गया कोई भी
काम दसू री ेणी का ही होकर रह
जाएगा ।
यह मातर् एक भर्ांित है
िक अंगर्ेजी भाषा भारत के िविभ
भाषाओं-समुदाय को एक करने में
सहायक रही है । इस िवशाल देश में,
जहां एक छोटा सा उ वगर् ही अंगर्ेजी
का जानकार रहा है और जनता का बड़ा
िह सा आज तक साक्षर नहीं है, अंगर्ेजी
ने जोड़ने से अिधक तोड़ने का कायर्
िकया है । िबर्िटश शासन ने आम जनता
से िवलग, देश के एक छोटे से
िवशेषािषकार संप वगर् के सहारे शेष
जन-समुदाय पर शासन िकया, उसके
अिधकार एवं आकांक्षाओं को दबाया ।
इस पर्िकर्या में यह वगर् सामान्य जनता से
कट कर िवदेशी शासक से जुड़ गया,
उनके िहत का संरक्षक बन गया और
सामान्य जनता के िव िलए गए हर कदम, हर षडयंतर् में भागीदार बना । सामान्य जनता से दरू ी बनाए रखने
में ही इसे अपना िहत िदखता था और इसे अंजाम िदया अंगर्ेजी भाषा ने । जहां अंगर्ेजी ने देश के िविभ
भाषा-क्षेतर् के इस छोटे से वगर् को पर पर जोड़ा, वहीं इस वगर् को शेष जन-समुदाय से अलग-थलग भी
िकया । नतीजा यह हुआ िक इस वगर् के लोग अपने वगर् के वभाषी लोग से भी अंगर्ेजी में ही संवाद करते थे
और के वल िनचले तबके के लोग से, जैसे मजबूरी में और िहकारत के साथ, वभाषा का पर्योग करते थे ।
आजादी के इतने िदन बाद भी यह पर्वृि देखी जा सकती है । इस तरह अंगर्ेजी ने देश के संपर्भु वगर् को जोड़ने
के साथ-साथ उसके और सामान्य जन-समुदाय के बीच दीवार खड़ी करने का काम भी िकया है ।
वतंतर्ता संगर्ाम के दौरान ही इस बात की पर्तीित िश त से हो गई थी िक संपूणर् देश की संपकर्
भाषा और के न्दर्ीय शासन की राजभाषा अंगर्ेजी नहीं, कोई भारतीय भाषा ही हो सकती है और यह भाषा िहन्दी
या िहन्द ु तानी होगी, इसके बारे में भी मतैक्य कायम हो गया था । बाल गंगाधर ितलक से लेकर लाला लाजपत
राय, चकर्वतीर् राजगोपालाचारी और सुभाष चन्दर् बोस तक सभी रा टर्ीय एकता के िलए िहन्दी की अपिरहायर्ता
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को वीकार कर चुके थे । महात्मा गांधी ने इन्दौर में होने वाले 1918 के िहन्दी सािहत्य सम्मेलन की अध्यक्षता
के साथ ही िहन्दी को सम त रा टर् की भाषा बनाने के िलए ठोस कदम उठाना शु कर िदया था । उन्हीं के
पर्यास से मदर्ास (अब चे ई) में िहन्दी सािहत्य सम्मेलन का दफ्तर खुला िजसका नाम 1927 में दिक्षण भारत
िहन्दी पर्चार सभा हो गया । आजादी के पूवर् इस सं था ने दिक्षण भारत में िहन्दी के पर्चार-पर्सार ारा देश के
भाषाई एकीकरण में बेिमसाल भूिमका िनभाई ।
संिवधान सभा में िहन्दी को संघ की राजभाषा और देश की संपकर् भाषा बनाने के महत्वपूणर्
पैरोकार- कन्हैयालाल मिणकलाल मुश
ं ी, गोपाल वामी आयंगर और डा. भीमराव अम्बेडकर सभी गैर िहन्दी
भाषी थे िजन्ह ने रा टर्ीय एकता के एकमातर् िवक प के प में िहन्दी की अपिरहायर्ता को भली-भांित समझ
िलया था । इस तरह िहन्दी को राजभाषा बनाने के पीछे िहन्दी-भािषय का नहीं बि क गैर-िहन्दी भािषय का
महत्वपूणर् योगदान रहा । संिवधान में िहन्दी को जो पर्ित ा िमली उसे रा टर्ीय एकता के िहत में अन्य भाषाभािषय ारा िकए गए बिलदान के प में याद िकया जाना चािहए और िहन्दी-भािषय को इसे कभी नहीं
भूलना चािहए । लोकतंतर् संख्या का खेल ज र है पर भाषा, सं कृ ित, धमर् जैसे थाई मु पर संख्या का
िस ांत लागू नहीं होता । इस ि से इितहास में पहली बार हुआ िक स ा और शिक्त के सहारे नहीं बि क
जनतांितर्क पर्िकर्या से रा टर्ीय सहमित के आधार पर देश की एक भाषा को अन्य भाषाओं के ऊपर िविश दजार्
देने का महत्वपूणर् कदम उठाया गया । इस ि से रा टर्ीय एकता के एकमातर् िवक प के प में िहन्दी की
वीकायर्ता का पर् कानून और अिधकार का पर् नहीं बि क रा टर्ीय समझ का पर् बन जाता है ।
देश की एकता और अखंडता की आव यकता के अनु प हमने एक मजबूत के न्दर् वाली
संघीय यव था अपनाई । भाषावार राज्य को राज्य-सूची के िवषय में अपनी-अपनी भाषा में काम करने की
पूरी सहूिलयत है । पर संघ के पास भी रे लवे, नागिरक उ यन, दरू संचार, जहाजरानी, आयकर, उत्पाद एवं
सीमा शु क जैसे महत्वपूणर् िवषय हैं िजनसे सम त देश की जनता का दैनिन्दन वा ता पड़ता है । उसके िलए
एक ऐसी राजभाषा का होना अिनवायर् है जो पूरे देश में संघ के काम के िलए पर्युक्त हो सके । जनतांितर्क
पर्िकर्या का तकाजा है िक शासक और शािसत की भाषा एक हो । इितहास में जब भी शासक और शािसत की
भाषाएं अलग रहीं, दोन के बीच दीवार उठ खड़ी हुई । सामर्ाज्य और िनरंकुश यव थाओं के िलए यह उतनी
अटपटी ि थित नहीं थी, पर जनतांितर्क यव था के िलए यह पूणर्तः असंगत है । याद रहे, पर्ाचीन भारत में जो
अनेक गणतंतर् थे उनमें भी राजकाज की भाषा सं कृ त नहीं, सामान्य जन में बोली और समझी जाने वाली पाली
या पर्ाकृ त थी । अ तु, संघ के काय के िलए सम त देश में वीकायर् एक भाषा अिनवायर् थी और उसी के िलए
िहन्दी को चुना गया ।
इस संदभर् में इितहास हमारे साथ था । यह सच है िक हमारा देश काफी समय से अनेक
भाषायी रा टर्ीयताओं का समूह रहा है पर इितहास में जब िकसी धािमर्क, राजनैितक, सामािजक आन्दोलन ने
पूरे देश को अपने आगोश में लेने का अिभयान चलाया, उसे िहन्दी का ही सहारा लेना पड़ा । मध्ययुग में भिक्त
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आंदोलन की भाषा िहन्दी रही । दिक्षण के रामानुजाचायर् की वै णव परंपरा को रामानन्द बनारस ले आए िजन्हें
कबीर ने अपना गु घोिषत िकयाः
भिक्त दर्ािवड़ ऊपजी, लाए रामानन्द ।
कबीर ने परगट करी, सात दीप नव खंड ।।
कबीर की भाषा, तो िहन्दी थी ही, महारा टर् के संत किवय - ाने र, नामदेव, तुकाराम,
एकनाथ और रामदास ने भी िहन्दी के पद रचे । तलवंडी (अब पािक तान) में जन्में गु नानक ने िहन्दी के पद
में अपनी बात कही और जब गु अजुर्नदेव ने गर्ंथ साहब का सम्पादन िकया तो उसमें गु नानक के साथ-साथ
अनेक उ री और दिक्षणी संत की वािणय का संगर्ह िकया । बाद में गु गोिवन्द िसंह ने िहन्दी में चंडी-चिरतर्
जैसी अनेक उत्कृ रचनाएं की और बावन किवय का संगर्ह िव ाधर के नाम से तैयार करवाया । आंधर् िनवासी
महापर्भु व भाचायर् ने बर्ज पर्देश में आकर पुि मागर् की नींव डाली और उनके पुतर् िव लदास ने अ छाप की
थापना की िजसके भक्त किवय - सूरदास, कु म्भनदास आिद ने िहन्दी में भिक्त सािहत्य की वृि में अपूणर्
योगदान िदया । राज थान में मीरा के गीत िहन्दी में गूंजे और गुजरात से लेकर बंगाल तक घर-घर में छा गए ।
गुजरात में वामी पर्ाणनाथ, गोपालदास, मुकंददास और कृ णदास जैसे संत किवय ने िहन्दी में रचनाएं की ।
इसिदशा में सूफी संत का योगदान भी कम नहीं रहा । सूफी संत हजरत िनजामु ीन और फरीद शकरगंज ने
सामान्य जनता के सामने अपने िवचार को यक्त करने के िलए िहन्दी को ही अपनाया । हजरत िनजामु ीन के
िश य अमीर खुसर ने तो िद ी और मेरठ के आस-पास बोली जाने वाली खड़ी बोली को सािहत्य की भाषा
बना िदया । मिलक मुहम्मद जायसी ने अपने पर्िस गर्ंथ प ावत, अखरावत और आिखरी कलाम अवधी भाषा
(फारसी िलिप) में िलखे । सूफी किवय की पर्ेम कथाओं में पर्युक्त दोहा- चौपाईवाली शैली और अवधी भाषा
को अपनाकर ही तुलसीदास ने राम चिरतर् मानस की रचना की । देश के कोने-कोने से हर वगर् और हर जाित से
संत के वर िहन्दी में मुखिरत हुए । रसखान और रहीम, रिवदास और दाद ू सबने इस रा टर्ीय धारा में योगदान
िदया । यह आकि मक नहीं िक िहन्द-ू पद-पादशाही का वप्न देखने वाले रामदास के िश य वीर िशवाजी ने
िहन्दी में किव भूषण को ही अपना राजकिव बनाया ।
िहन्दी के आिदकाल से पूरे देश में धमर्-पर्चार के िलए िजस भाषा का पर्योग हुआ वह िहन्दी
ही थी । पंजाब में िस और नाथपंथ के योिगय ने अपने मत का पर्चार करने के िलए िहन्दी का पर्योग िकया ।
नाथपंथ के आिदनाथ जालंधरनाथ जालंधर पीठ की देन थे । इस परंपरा में सबसे पर्िस गोरखनाथ हुए िजन्ह ने
पूरे देश की यातर्ा की और िहन्दी में रचनाएं की िजसे उस समय सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता था क्य िक वह
साधुओ ं की भाषा थी िजसमें िभ -िभ थान पर बोली जाने वाली िभ -िभ भाषाओं के शब्द घुलिमल गए
और िजसको देश के सभी कोन में लोग समझते थे । ईसाई पादिरय ने ईसाई धमर् पर्चार के िलए भी िहन्दी का
पर्योग िकया । अठारवीं शताब्दी में हुगली और ीरामपुर में िहन्दी में बाइिबल छापने के िलए देवनागरी िलिप में
मुदर्ण पर्ारंभ हुआ । राजा राममोहन राय ने बर् समाज के पर्चार के िलए कोलकाता से 1829 में िहन्दी में
"बंगदतू " नामक अख़बार िनकाला । वामी दयानन्द ने आयर् समाज के पर्चार के िलए िहन्दी को ही माध्यम
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बनाया, जबिक वे खुद गुजराती थे और आयर् समाज का सूतर्पात लाहौर से हुआ । आयर् समाज के िनयम िहन्दी
में बनाए गए, संगठन की भाषा िहन्दी हुई, सत्याथर् पर्काश िहन्दी में िलखा गया और िहन्दी के सवर्-सुलभ
आसन पर बैठकर ही आयर् समाज फीजी, मािरशस, गयाना तथा सूरीनाम जैसे दरू थ देश तक पहुचं ा ।
संपूणर् उ र भारत में सं कृ त के बाद शा ीय संगीत की भाषा िहन्दी ही बनी । अमीर खुसर ने
(िजनके िपता तुिकर् तान से भारत आए थे) जो यो ा होने के साथ-साथ फारसी और िहन्दी के बहुत बड़े किव
भी थे, संगीत के क्षेतर् में कर्ांितकारी काम िकया । उन्ह ने खयाल शैली का आिव कार िकया । उसके िलए
बर्जभाषा में जो पद उन्ह ने बनाए उनका उपयोग तानसेन से लेकर आज तक के िहन्द ू और मुसिलम दोन
संगीत करते रहे हैं । चाहे पंजाब के बड़े गुलाम अली खां ह , चाहे महारा टर् के भीम सेन जोशी या गुजरात के
पंिडत ओंकारनाथ ठाकु र या बंगाल की जूिथका राय, सभी ने शा ीय गायन के िलए बर्जभाषा िहन्दी का
माध्यम अपनाया ।
िहन्दी अपनी
गर्ा ता के चलते उ र भारत तक
ही सीिमत नहीं रही । उ र और
दिक्षण को जोड़ने का जो काम
दिक्खनी िहन्दी ने िकया वह
अपर्ितम है । दिक्षण के बहमनी
राज्य के शासक य िप फारस से
आए थे पर उन्ह ने अपने दरबार
में उस भाषा को वीकार िकया
जो मुहम्मद तुगलक के साथ
िद ी से देविगरी (या दौलताबाद)
आई थी । बाद में बहमनी राज्य
पाँच राज्य में बंट गया, पर सभी
की भाषा िहन्दी ही रही । गोलकुं डा के दरबार में सिवता नाम से बर्जभाषा के एक पर्िस किव हुए िजनके किव
गोलकुं डा के िकले में लगे िचतर् के नीचे अंिकत थे जो अब संगर्हालय में है । गोलकुं डा के शासक कु तुब
कु लीशाह ने वयं फारसी की शैली पर िहन्दी में दीवान िलखा । उनके उ रािधकारी मुहम्मद कु तुबशाह के समय
में शेख सादी के दिक्खनी िहन्दी में बहुत सुदं र पद िलखे । हैदराबाद में कु तुबशाही वंश के 169 वष के शासन
के दौरान दिक्खनी िहन्दी का खूब पर्चार-पर्सार हुआ । बाद में जब औरं गजेब ने गोल कुं डा राज्य को समा
िकया तो हैदराबाद मुगल सामर्ाज्य का एक सूबा बन गया िजसके सुबेदार बाद में वतंतर् हो गए । उनके ारा
मुगल की परंपराएं हैदराबाद लाई गई । हैदराबाद िनजाम में आंधर्, महारा टर् और कनार्टक के जो िह से शािमल
थे वहां िहन्दी खूब फू ली-फली । दिक्खनी िहन्दी में िनजाम के समय में अमृतराज और अहमद ु ा जैसे बड़े किव
िदए ।
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अपने पर्ारं िभक काल से ही भारतीय रा टर्ीय कांगर्ेस ने जन-संपकर् के िलए िहन्दी को अपना
माध्यम बनाया । सन 1915 में दिक्षणी अफर्ीका से लौटकर महात्मा गांधी के रा टर्ीय आंदोलन में शािमल होने
से िहन्दी को और बल िमला । िभ -िभ पर्ांत से आने वाले और िभ -िभ भाषाएं बोलने वाले- िजनमें से
कई का सािहत्य िहन्दी की अपेक्षा अिधक पर्ाचीन और अिधक समृ था- कांगर्ेस के सभी नेताओं ने रा टर्ीय
आंदोलन के अपने अनुभव से यह बखूबी समझ िलया था िक वतंतर् भारत में िहन्दी ही देश की संपकर् भाषा
और राजभाषा होगी । बाद में संिवधान-सभा में यही अनुभव पर्ितिबंिबत हुआ ।
अत्यंत पर्ाचीन काल से भारत के तीथ की भाषा िहन्दी रही और उसी के सहारे देश के िभ िभ भाग से आए िभ -िभ भाषा-भाषी याितर्य का नाम चलता रहा । देश में भर्मण करने वाले साधुओ ं
और फकीर की भाषा सधुक्कड़ी िहन्दी तो थी ही, यापार के िलए िभ -िभ पर्ांत में जाने वाले यापािरय की
भाषा भी िहन्दी थी िजसमें मारवाड़ी यापािरय का बहुत बड़ा योगदान था । यही कारण है िक तिमलनाडु में होते
हुए भी रामे रम और मदरु ई जैसे इलाक में िहन्दी बोलने वाले बड़ी संख्या में िमलते हैं । और तो और, अंगर्ेज
ने भी सेना में भारतीय सैिनक के बीच पर्युक्त होने वाली भाषा िहन्दी ही रखी ।
जब संिवधान िनमार्ताओं ने िहन्दी को संघ की राजभाषा का दजार् िदया तो रा टर्ीय जीवन में
रची-बसी िहन्दी की यह अनन्य ऐितहािसक पृ भूिम उनके सामने थी, महज अंगर्ेजी को थाप करने के िलए
िहन्दी लाने की बात नहीं थी । इस तरह िहन्दी को संघ की राजभाषा और देश की संपकर् भाषा बनाया जाना
इितहास की सतत पर्वाहमान धारा का वाभािवक पर्ितफलन था, न िक कोई थोपा हुआ िनणर्य ।
लेिकन शोचनीय है िक आजादी के इतने वष बाद भी िहन्दी के पर्ित बे खी का माहौल बना
हुआ है । इस बीच अंगर्ेजी की जड़े मजबूत हुई हैं और िहन्दी एवं साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं का क्षरण
हुआ है । हर भारतीय भाषा अपने अि तत्व की लड़ाई अके ले लड़ रही है । अंगर्ेजी के िवरोध को अन्य भारतीय
भाषाओं के िवरोध का जामा पहना िदया जाता है और इस पर्िकर्या में िहन्दी के साथ-साथ अन्य भारतीय
भाषाओं की ि थित भी कमजोर होती है । देखना होगा िक कहां क्या करने को रह गया ।
जहां संिवधान की धारा 343 िहन्दी को संघ की राजभाषा बनाती है, वहीं धारा 351, राज्य
के नीित िनदेर्शक तत्व की तजर् पर िहन्दी के िवकास के िलए सकारात्मक िनदेर्श देती है । इसमें िहन्दी भाषा को
भारत की सामािसक सं कृ ित के सभी तत्व की अिभ यिक्त का माध्यम बनाने का दाियत्व संघ को स पा गया
है । इस संबंध में अन्य भारतीय भाषाओं में पर्युक्त प, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए और जहां
आव यक या वांछनीय हो, मुख्यतः सं कृ त से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द गर्हण करते हुए िहन्दी की
समृि को सुिनि त करने का पर्ावधान है । धारा 343 की ओर तो पर्ायः ध्यान रखा जाता है पर धारा 351 पर
िकतना ध्यान िदया गया ? इसमें दो राय नहीं िक राजभाषा के नाम पर सरकारी कामकाज तथा वै ािनक एवं
तकनीकी िवषय के िलए सं कृ त के नए-नए शब्द में मनमाने उपसगर् और पर्त्यय लगाकर एक कृ ितर्म,
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अनुवाद-धमीर्, टकसाली और द ु ह भाषा का िनमार्ण होता रहा है िजसमें न जीवन्तता है, न संपर्ेषणीयता और
न ही गर् ाता । यह इितहास का कड़वा सच है िक सं कृ त वह भाषा है जो एक काल-िबन्द ु पर ठहर गई है ।
सतत पर्वाहमान जीवन और जगत में सिदय से जो पिरवतर्न आए हैं, सं कृ त उनसे अछू ती होने के कारण उसके
और आज के भाव-बोध में एक बड़ा अंतराल आ गया है । इसिलए सीधे सं कृ त से िलए गए शब्द लोग के
िदल में और उसके रा ते जबान में न उतर सकते थे, न उतरे । जीवन के वतर्मान संदभ के कटे होने के कारण ये
शब्द नई भाषा को जीवन में जोड़कर यापक वीकृ ित अिजर्त कराने में असफल रहे । दसू री ओर यह भी सच है
िक भारत की अिधकांश भाषाओं का उत्स सं कृ त और उसकी सहचािरय - पाली और पर्ाकृ त में है और
सं कृ त तथा पाली-पर्ाकृ त के अनेक शब्द समय के साथ िघसते, बदलते प में सभी भारतीय भाषाओं में चले
आए हैं । इन सामान्य जीवन्त शब्द को पहचानना और इन्हें िहन्दी में समािहत करना एक गंभीर बौि क चुनौती
है । पर उसे एक सक्षम संपकर् भाषा बनाने का यही एक िवक प है । इसके िलए रा टर्ीय तर पर िविभ भाषाभाषी िव ान और सािहत्यकिमर्य ारा वैिच्छक प से िमल बैठकर पर पर आदान-पर्दान से िजस भगीरथ
पर्यास की ज रत है, सरकारी सं थान के वेतनभोगी कमर्चािरय से उसकी अपेक्षा करना उिचत नहीं होगा ।
इसके िलए मौिलक खोज, गहन संक पना और सजर्नात्मक पर्ितभा की दरकार है । एक ऐसा कोष तैयार करना
समय की मांग है िजसमें एकािधक भारतीय भाषाओं में पर्चिलत और लोग की जबान पर चढ़े हुए उन सामान्य
शब्द को संजोया जाए तो िहन्दी के सामािसक प के िवकास में अहम भूिमका िनभाएंगे ।
िहन्दी को सामािसक सं कृ ित की अिभ यिक्त के माध्यम के प में िवकिसत करने के पीछे
संिवधान-िनमार्ताओं का भारत की अखंडता और एकता को सु ढ़ करने का मन्त य था । ऐसी भाषा के पर्ित,
िजसने सभी भारतीय भाषाओं के प, शैली और पदाविलय को आत्मसात िकया हो और उनसे शब्द गर्हण
िकया हो, सभी भाषा-भािषय को सहज प से अपनत्व का भाव होगा । तब राजभाषा के प में िहन्दी िकसी
भाषा-भाषी के िलए पराई नहीं होगी, सभी उससे तादात्म्य अनुभव करें गे और क्षेतर्ीय भाषाओं के नाम पर
अंगर्ेजी को जो परोक्ष समथर्न िमलता रहा है उसकी गुंजाइश नहीं रहेगी । इस बहु-भाषी देश में ऐसी सामािसक
भाषा ही एक सक्षम संपकर् भाषा बन सकती है जो देश को जोड़ने वाली सशक्त कड़ी का कायर् करे । यह
असंभव नहीं है िक यह काम पहले सधुक्कड़ी ने िकया था िजसमें िभ -िभ क्षेतर् में बोले जाने वाले शब्द का
अनूठा समावेश होता था और जो सबके िलए गम्य होने से संत और सामान्य जनता के बीच साथर्क संवाद
थािपत कराने में सहायक हुई थी । य िप उसका क्षेतर् और उ े य सीिमत था पर उससे यह तो इंिगत होता ही है
िक सम त भारत के पिरवेश को आप्याियत करने वाली एक संपकर् भाषा बन सकती है और वह िहन्दी का ही
समावेशी प होगा । एक बार ऐसी संपकर् भाषा िवकिसत हो जाए तो इसे संघ की राजभाषा बनाने में कोई
किठनाई नहीं होगी, न कोई अितिरक्त पर्यास करना होगा ।
अंगर्ेजी सिहत भारत की सभी भाषाएं िहन्दी की सहोदरा हैं और अपनी-अपनी जगह उनका
मू य है । ये सभी िकसी न िकसी जन-समुदाय की मातृभाषाएं हैं । हमें अपनी मातृभाषा चुनने का िवक प नहीं
होता, वह हमें माता-िपता और बचपन के माहौल से सहज ही िमल जाती है । मातृभाषा के माध्यम से ही हम
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अन्य भाषाएं सीखते हैं और उनमें िविहत ान-िव ान और सां कृ ितक संपदा के भागीदार बनते हैं । हम जो भी
नई भाषा सीखते हैं उसमें सि िहत सभ्यता, सं कृ ित, िवचार और संवेदना का एक नया संसार हमारे सामने
खुलता है । हम उसमें अनु यूत उस भाव-संपदा और सां कृ ितक िवरासत के अनायास उ रािधकारी बन जाते हैं
जो हर भाषा में कु छ िविश और िभ होती है । इस ि से मातृभाषा से बाहर िनकल कर अन्य भाषा-संसार
में पर्वेश करना मनु य को अिधक उदार,
समावेशी और भावात्मक एवं वैचािरक प से
अिधक समृ बनाता है । वह थानीयता से
िनकल कर रा टर्ीयता और वैि कता की ओर
बढ़ता है और बहुत कु छ ऐसा पाता है िजससे
के वल अपनी मातृभाषा से िचपके रहने से वंिचत
रह जाता ।
वे तत्व जो एक जन-समुदाय
को रा टर् बनाते है, अपिरभािषत, पिरवतर्नशील
और गितमान हैं । भाषा उनमें पर्मुख तत्व है ।
पर िभ -िभ भाषा-भाषी भी रा टर्ीय एकता
के सूतर् में बंधे हो सकते हैं । उनका सामान्य
इितहास, उनके वीर की गाथाएं, उनके सुखदःु ख, सफलता-असफलता, उनके संघषर्,
उनकी यातनाएं और उनकी मृितयां उन्हें एक
रा टर् बनाती हैं । भाषा की िविभ ता के बावजूद
भौगोिलक सामीप्य भी रा टर्ीय भावना को
उभारने और सशक्त करने में सहायक होता है ।
सिदय के साथ-साथ रहते हुए एक पर्ान्त िवशेष
के िनवासी वहां की िम ी, हवा, पानी, निदय ,
पहाड़ और मैदान के साथ तादात्म्य अनुभव करने लगते हैं । उसी के साथ उनमें पर पर भी एकात्म भाव पैदा
हो जाता है । भारत वषर् इसी तरह का बहुभाषी रा टर् है । यहां की अिधकांश भाषाएं सं कृ त और उनके
जन प - पाली और पर्ाकृ त से िनकली हैं । कु छ भौगोिलक और कु छ राजनैितक कारण से पर पर आवागमन
और गितशीलता की कमी के चलते कालान्तर में िभ -िभ क्षेतर् में िभ -िभ भाषाएं िवकिसत हो गई
ह गी । यिद आज जैसी गितशीलता होती तो शायद सम त भारत की मातृभाषा एक ही होती । एक रा टर् की
शिक्त और उसका थाियत्व इस बात पर िनभर्र करता है िक उसके सामान्य कारक तत्व को िकतना मजबूत
िकया जाता है और िविभ ताओं को अक्षुण्ण रखते हुए साझेदारी के िबन्दओ
ु ं को िकतना खोजा और बढ़ाया
जाता है । इससे रा टर्ीय चेतना िवकिसत होने के साथ-साथ लोग में एक उदार, समावेशी ि कोण भी
िवकिसत होता है । बहु-भाषी रा टर् में संपकर् भाषा का यही महत्व है । वह रा टर्ीयता के तत्व के समंजन,
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आदान-पर्दान और संवधर्न का माध्यम होती है । इसी के ारा रा टर्ीय एकजुटता को संभव और पु िकया जा
सकता है और संकीणर् क्षेतर्ीयता पर अंकुश लगाया जा सकता है । संपकर् भाषा के माध्यम से ही हम रा टर्ीय
मुख्य धारा में पर्वेश करते हैं, क्षेतर्ीयता और संकीणर्ता से ऊपर उठकर, उदार और गर्हणशील बनते हैं । इससे
रा टर्ीय िहत तो पूरा होता ही है, हमारा बौि क िक्षितज भी िवकिसत होता है । इसिलए हर भारतीय के िलए
संपकर् भाषा को सीखना रा टर्ीय जीवन में पर्वेश की ही कुं जी नहीं है, उसके वयं के समुिचत िवकास के िलए
भी आव यक है ।
आज जब हम वैि क यव था की दहलीज पर खड़े हैं और एक नए आिथर्क और सां कृ ितक
उपिनवेशवाद की चुनौती से -ब- हैं, हमारी रा टर्ीय अि मता और सामूिहक पहचान को वर देने के िलए
देश भर में सवर्मान्य एक संपकर् भाषा का होना अिनवायर् है । यह वह भाषा होगी जो हमारी रा टर्ीय आत्मा को,
िजसमें अनेक िविवधताओं के बावजूद मूलभूत एकता है, अिभ यिक्त पर्दान करे गी, हमको एक सूतर् में िपरोएगी
और यूरो-अमेिरकन वचर् व वाले एक धर्ुवीय िव में सर उठाकर खड़े होने के िलए हमें एक ठोस धरातल पर्दान
करे गी ।
कमलकांत ितर्पाठी
लेखक सािहत्य जगत के पर्ख्यात लेखक और शब्द-िश पी हैं । उनका यह लेख भाषा और समाज और उनके
अंतसबंध की गहरी पड़ताल करता है । अिभ यिक्त-7 से साभार ।
जब तक भारत अपनी भाषाओं को नहीं अपनाता तब तक उसे सही अथ
में वतंतर् नहीं कहा जा सकता ।
डा. ओदोलेन मेकल
िहन्दी की पर्गित से देश की सभी भाषाओं की पर्गित होगी ।
डा. जािकर हुसैन
एक भाषा के िबना भारत में एकता नहीं हो सकती और वह भाषा िहन्दी
है ।
यय पित्रका
के शव चन्दर् सेन
- 2007-2008
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िवभाग में राजभाषा गितिविधयां
सरकारी काम-काज में िहन्दी के बढ़ते हुए कदम...........
यय िवभाग में भारत सरकार की राजभाषा नीित के िकर्यान्वयन में िहन्दी अनुभाग अत्यंत
सिकर्य भूिमका िनभाता रहा है । अनुवाद कायर् तथा राजभाषा नीित का कायार्न्वयन इसके दो अहम दाियत्व हैं ।
इसके तहत् सभी तरह के रोजमरार् के अंतकार्यार्लयी पिरपतर् , ापन , सभी सामान्य आदेश के साथ-साथ
संसदीय पर् ो र , आ ासन , मंितर्मंडलीय नोट तथा िभ -िभ संसदीय सिमितय से संब द तावेज , संसद
सदन के पटल पर पर् तुत की जाने वाली आव यक िरपोट , तात्कािलक आदेश का अनुवाद िहन्दी अनुभाग
ारा िकया जाता है । इसके अलावा, के न्दर्ीय िव मंतर्ी एवं िव राज्य मंतर्ी तथा सिचव कायार्लय से पर्ा पतर्
और िविभ महत्वपूणर् िदवस के अवसर पर पढ़े जाने वाले शपथ, संदश
े , भाषण आिद के अनुवाद की
यव था भी िहन्दी अनुभाग ारा की जाती है ।
ऐसे तात्कािलक पर्कृ ित के समयब काय को करते हुए भारत सरकार की राजभाषा नीित का
िकर्यान्वयन िहन्दी अनुभाग का पर्ाथिमक कायर् है, िजसके अंतगर्त संघ का राजकीय कायर् िहन्दी में करने के िलए
राजभाषा िवभाग ारा जारी वािषर्क कायर्कर्म में िनधार्िरत ल य को पर्ा करने की िदशा में राजभाषा
कायार्न्वयन संबंधी पर्मुख िनदेश , िविवध िनयम व पर्ावधान का अनुपालन करना और कराना िहन्दी अनुभाग
के कायर्क्षेतर् में आता है ।
यय पित्रका
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पर्िशक्षणः
िहन्दी टंकण/आशुिलिप न जानने वाले टंकक /आशुिलिपक को िहन्दी में पर्िशक्षण िदलाने
के िलए अलग-अलग बैच में भेजा जाता है । इस वषर् भी िवभाग के कमर्चािरय को िहन्दी टंकण/आशुिलिप
में पर्िशिक्षत करने के िलए नािमत िकया गया । िवभाग में 98.0 पर्ितशत अिधकािरय /कमर्चािरय को िहन्दी
का कायर्साधक ान/पर्वीणता पर्ा है ।
िहन्दी कायर्शालाः
िहन्दी पखवाड़े की शु आत करते हुए 14 िसतम्बर को िहन्दी िदवस मनाया गया और इस
अवसर पर िहन्दी पखवाड़े के दौरान आयोिजत िविभ पर्ितयोिगताओं में भाग लेने वाले पर्ितयोिगय के िलए 1
िदन की िहन्दी कायर्शाला का भी आयोजन िकया गया िजसमें उप िनदेशक (रा.भा.) ारा भारत सरकार की
राजभाषा नीित, राजभाषा अिधिनयम, िनयम, संक प आिद सिहत िविभ संवधै ािनक उपबंध से
अिधकािरय /कमर्चािरय को अवगत कराया गया । गृह मंतर्ी जी ारा िहन्दी िदवस के अवसर पर देशवािसय के
नाम जारी संदश
े को पढ़ा गया । मा. िव मंतर्ी, गृह सिचव, मंितर्मंडल सिचव तथा सिचव ( यय) से भी िहन्दी
िदवस के अवसर पर पर्ा अपील को िवभाग के अिधकािरय /कमर्चािरय तथा संब /अधीन थ कायर्लय में
पिरचािलत िकया गया । इस अवसर पर िवभाग के उप सिचव (पर्शा.), ी मनोज सहाय भी उपि थत थे ।
उन्ह ने भी पर्ितभािगय को संबोिधत करते हुए अपने िवचार रखे । सहायक िनदेशक (रा.भा.) ने इस वषर्
आयोिजत की जाने वाली पर्ितयोिगताओं के बारे में संक्षेप में बताया । िवभाग में िहन्दी का पर्योग बढ़ाने के
िलए पर्ितयोिगताओं को और अिधक आकिषर्त करने के संबंध में उप सिचव (पर्शा.) ारा सुझाव मांगे गए ।
कायार्लय में िहन्दी का कायर्साधक ान रखने वाले कमर्चािरय की िहन्दी में सरकारी
कामकाज करने िक िझझक दरू करने की ि से राजभाषा िवभाग ारा जारी िकए गए वािषर्क कायर्कर्म के
अनुसार िवभाग में नॉथर् ब्लॉक में उपयुक्त
र् एक िदवसीय कायर्शाला के अलावा िदनांक 28-30 मई, 2007 को
तीन िदवसीय तथा िदनांक 11-13 िदसम्बर, 2007 को भी तीन िदवसीय कायर्शालाएं आयोिजत की गई ं ।
इन कायर्शालाओं में लगभग 60 अिधकािरय /कमर्चािरय ने भाग िलया । कायर्शाला के अंत में ली गई
परीक्षाओं में पहले चार थान पर आए पर्ितयोिगय को पुर कृ त भी िकया गया ।
राजभाषा संपकर् अिभयानः
सरकारी कामकाज में िहन्दी के उ रो र िवकास के उ े य से एक राजभाषा संपकर् अिभयान
चलाया गया । इस संपकर् अिभयान के अंतगर्त इस बार दो कायर्दल गिठत िकए गए । इन कायर्दल ने बड़े ही
उत्साह से सभी अनुभाग में जाकर िहन्दी के पर्योग को बढ़ाने के िलए अपने तर पर कमर्चािरय से संपकर्
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िकया । इन कायर्दल में शािमल िहन्दी अनुभाग के अनुवादक तथा उ ेणी िलिपक की सिकर्य भूिमका के
पिरणाम व प न के वल यह संपकर् अिभयान सफल रहा बि क अन्य आयोजन में िवभाग के
अिधकारी/कमर्चािरय ारा बढ़-चढ़कर की गई पर्ितभािगता भी इस संपकर् अिभयान की सफलता का पर्माण
है ।
राजभाषा िनरीक्षणः
राजभाषा के पर्गामी पर्योग का जायजा इस वषर् उप-िनदेशक (रा.भा.) की अगुवाई में िलया
गया । वषर् के दौरान दो अधीन थ कायार्लय - के न्दर्ीय पेंशन लेखा कायार्लय तथा शासकीय लेखा एवं िव
सं थान तथा नॉथर् ब्लॉक में ि थत पर्शा.-I, पर्शा.- II, सं थापना सामान्य, सं था- IV, योजना िव -I,
सामान्य पर्शा. पर्भाग, संवगर् पर्शा. अनुभाग, लेखा एवं बजट शाखा तथा वेतन एवं लेखा कायार्लय को
िमलाकर कु ल ग्यारह अनुभाग का िनरीक्षण िकया गया । िनरीक्षण के दौरान जो कु छ भी किमयां पाई गई उनसे
उक्त कायार्लय /अनुभाग आिद को अवगत कराया गया तथा इन किमय से उबरने के िलए उप-िनदेशक
(रा.भा.) ारा मागर्दशर्न िकया गया ।
िहन्दी पखवाड़ा
िवभाग में 14 िसतम्बर से 28 िसतम्बर, 2007 तक िहन्दी पखवाड़ा मनाया गया । इस
पखवाड़े में कु ल 11 पर्ितयोिगताएं आयोिजत की गई ं िजनमें िहन्दी नोिटंग/डर्ािफ्टंग, िनबंध लेखन, अिधकािरय
तथा कमर्चािरय के िलए पृथक-पृथक राजभाषा संगो ी, िहन्दी किवता, िहन्दी लोगन, िहन्दी पर् ावली,
अिधकािरय तथा कमर्चािरय के िलए अलग-अलग तु लेखन पर्ितयोिगता और अिहन्दी भािषय के िलए
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िहन्दी सामान्य ान पर्ितयोिगताएं शािमल थीं । इन पर्ितयोिगताओं में िहन्दी किवता, िनबंध और पर् ावली
आिद पर्ितयोिगताएं काफी लोकिपर्य रही । पखवाड़े के दौरान भारी संख्या में लोग ने भाग िलया ।
इस वषर् िहन्दी पखवाड़े की सबसे उ े खनीय बात यह रही िक िवभाग के लगभग 300
कािमर्क ने सोत्साह भाग लेते हुए पखवाड़े में आयोिजत सभी पर्ितयोिगताओं को न के वल बेहद रोचक बि क
काफी चुनौतीपूणर् बनाया । इसमें 9 अिधकािरय तथा 34 कमर्चािरय को पुर कृ त िकया गया ।
इस वषर् का िहन्दी पखवाड़ा इसिलए भी अि तीय रहा क्य िक पुर कार रािश ही नहीं अिपतु
पुर कार की संख्या में भी अभूतपूवर् वृि हुई । पुर कार रािश में यह अभूतपूवर् बढ़ो री िदनांक 25 अपर्ैल,
2007 को आयोिजत राज व एवं यय िवभाग तथा महालेखा िनयंतर्क कायार्लय की संयक्त
ु िहन्दी सलाहकार
सिमित की बैठक में िलए गए िनणर्य के अनुसरण में की गई । िहन्दी में सरकारी कामकाज के पर्ित
अिधकािरय /कमर्चािरय की िच और झान आकिषर्त करने की ि से पुर कार की संख्या तीन से बढ़ाकर
पाँच की गई िजसमें पर्थम, ि तीय तथा तृतीय पुर कार के अलावा दो समान रािश के पर्ोत्साहन पुर कार भी
िवतिरत िकए गए । पर्थम, ि तीय तथा तृतीय पुर कार रािश जो िपछले वषर् कर्मशः 2500/- पए, 2000/पए तथा 1500/- पए थी, उसमें इस वषर् भी वृि की गई है और पर्थम, ि तीय तथा तृतीय पुर कार
िवजेताओं को कर्मशः 5000/- पए, 3000/- पए, 2000/- पए िदए गए इसके अितिरक्त पर्ोत्साहन
पुर कार पाने वाले कमर्चािरय को 1000/- पए पर्दान िकए गए ।
िहन्दी पखवाड़े के समापन के प में 15 अक्तूबर, 2007 को िवभाग में एक अनौपचािरक
समारोह का आयोजन राजभाषा कायार्न्वयन सिमित की बैठक के अंत में अपर सिचव ीमती रीता मेनन की
अध्यक्षता में िकया गया िजसमें िवजेताओं को नकद पुर कार तथा पर्माण-पतर् पर्दान िकए गए । समारोह में
िहन्दी पखवाड़े के दौरान आयोिजत िविवध पर्ितयोिगताओं में शािमल तथा िवजयी पर्ितभािगय से सरकारी
कामकाज में िहन्दी की पर्गामी ि थित पर बड़ी बेबाकी से िवचार-िवमशर् िकया और अपने-अपने सुझाव एवं
िवचार पर् तुत िकए । उप सिचव (पर्शा.) समेत िहन्दी अनुभाग के सभी सद य तथा िवभाग के कई विर
अिधकारी भी इस समारोह में शािमल थे । समारोह में िविभ पर्ितयोिगताओं में िवजयी पर्ितयोिगय तथा अन्य
लोग ने भी इस आयोजन के िलए िहन्दी अनुभाग को बधाई दी ।
राजभाषा संगो ीः
िहन्दी पखवाड़े के दौरान यय िवभाग में अिधकािरय और कमर्चािरय के िलए
िदनांक 19 िसतम्बर, 2007 तथा 25 िसतम्बर, 2007 को अलग-अलग दो संगोि य का आयोजन िकया
गया ।
अिधकािरय के िलए आयोिजत संगो ी का िवषय "भिव य में िहन्दी संयुक्त रा टर् की भाषा
बनेगी ! क्या िहन्दी की वतर्मान ि थित को देखते हुए यह िन यपूकर् कहा जा सकता है ?" था । इस
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संगो ी में काफी िवचारो ेजक बहस और िवमशर् के बाद यह बात उभर कर आई िक इसमें संदहे नहीं िक अपनी
जनसंख्या और यापक बाजार क्षेतर् होने के कारण िहन्दी भाषा के िलए अनेक अंतरार् टर्ीय अवसर खुले हुए हैं ।
िकन्तु एक सच यह भी है िक िहन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा के प में एक अच्छा खासा सफर अपने
देश में ही तय करना है, तभी जाकर वह अंतरार् टर्ीय तर पर अपनी कोई पहचान बना सके गी ।
इसी पर्कार कमर्चािरय के िलए आयोिजत राजभाषा संगो ी का िवषय था- "िशक्षा का
माध्यम िहन्दी होना चािहए या नहीं ?" समय और संदभर्गत पिरपर्े य में भाषा के अनुकूलन जैसे िवषय पर
कमर्चािरय को उ िे लत करने का यह पर्यास खासा उत्साहवधर्क रहा । इसमें भी काफी कमर्चािरय ने भाग
िलया । संगो ी की सफलता इसी बात से आंकी जा सकती थी िक कई िवभाग के कमर्चारी/अिधकारी ोता
के प में पर्ितभािगय के िवचार को सुनने के िलए आए थे । इन दोन संगोि य में लगभग 50
अिधकािरय /कमर्चािरय ने भाग िलया ।
पखवाड़े की िविभ पर्ितयोिगताओं में पर्ितभािगय के िवचार के आकलन व मू यांकन के
िलए भाषा के दो महत्वपूणर् पिरक्षेतर् यथा "मीिडया" (संचार-माध्यम ) और "राजभाषा" (सरकारी कामकाज
की भाषा) क्षेतर् से पर्ािधकारी िव ान और भाषा किमर्य को शािमल करने की ि से जो िनणार्यक आमंितर्त
िकए गए थे, उनमें एक िवख्यात पतर्कार ी शािहद अख्तर, पी.टी.आई., भाषा तथा दसू रे ी नीलाम्बर
पाण्डेय, संयक्त
ु िनदेशक (रा.भा.), वै ािनक पर्ौ ोिगकी मंतर्ालय, भारत सरकार थे । इसके अितिरक्त पर्ख्यात
किवय यथा- ी हरेराम समीप और ी राजेश िम और ी आर.सी. जोशी, पर्ितिनिध के न्दर्ीय
सिचवालय िहन्दी पिरषद, ी संजय िसंह, सहायक संपादक, लोक सभा सिचवालय तथा डा. जोिगन्दर् िसंह
कं डारी, उप िनदेशक (रा.भा.), राज व िवभाग को आमंितर्त िकया गया । िवषय की मह ा और इसमें
शािमल पर्ितभािगय के िवचारो ेजक िवमशर् को देखते हुए ये दोन संगोि यां और अन्य पर्ितयोिगताएं बेहद
सफल और साथर्क रहीं ।
िशलांग में राज व, यय तथा िनयंतर्क एवं महालेखा परीक्षक कायार्लय की संयक्त
ु िहन्दी
सलाहकार सिमित की बैठकः
01 नवम्बर, 2007 को मा. िव राज्य मंतर्ी ी पवन कु मार बंसल की अध्यक्षता में यय,
राज व तथा िनयंतर्क एवं महालेखा परीक्षक कायार्लय की संयक्त
ु िहन्दी सलाहकार सिमित की बैठक मेघालय
की राजधानी िशलांग में होटल पाइनवुड के सभागार में आयोिजत की गई । बैठक में उपि थत सद यगण ने
िपछली बैठक के िनणर्य की पुि साथ ही िवभाग के सरकारी कामकाज में िहन्दी की पर्गामी पर्गित की समीक्षा
की गई ।
बैठक में यय िवभाग के िहन्दी कामकाज की समीक्षा करते हुए सिमित संतु थी । सिमित के
गैर-सरकारी सद य ारा पर् तुत सुझाव पर िटप्पणी करते हुए सिमित को बताया गया िक राजभाषा संवगर् के
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अिधकािरय /कमर्चािरय को बेहतर वेतनमान देने, उनके पर्ो ित तथा िरक्त पद को भरे जाने के संबंध में
राजभाषा िवभाग से पर्ा संवगर् संवीक्षा (कै डर िर यू) पर् ताव को पैरामीटर संबंिधत कु छ अपेिक्षत सूचनाओं के
िलए राजभाषा िवभाग को भेज िदया गया है, िजसके पर्ा होने पर यथाव यक कारर् वाई की जाएगी ।
इसी पर्कार न्यूयॉकर् में आयोिजत िव िहन्दी सम्मेलन की अंितम तारीख समा हो जाने और
पयार् औपचािरकताएं पूरी न हो पाने के कारण यय िवभाग से िकसी अिधकारी ारा भाग नहीं िलया जा
सका । इस पर अफसोस जताते हुए अध्यक्ष महोदय ने कहा िक भिव य में इस संबंध में सभी औपचािरकताओं
को समय रहते पूरा िकया जाए तािक ऐसे आयोजन में यय िवभाग से पर्ितिनिध को भेजना सुिनि त िकया जा
सके ।
बैठक में गैर-सरकारी सद य की ओर से ी डा. कणर् िसंह यादव, सांसद, ीमती िचतर्लेखा
माने कदम, अमेठी समाचार के संपादक ी जगदीष पीयूष, डा. बालशौरी रे ी और पर्ख्यात िहन्दी सेवी
ी टी.एस.के . क न शािमल थे । जबिक सरकारी सद य में ी रंजीत इ सर, सिचव, राजभाषा, ी जयंत
पेंडसे, अध्यक्ष, आयकर समझौता आयोग, ी सुखपाल िसंह कांग, उपाध्यक्ष, सीमा शु क, उत्पाद शु क,
सेवा कर अपील पर्ािधकरण, ी पर्णव कु मार दास, िवशेष िनदेशक, पर्वतर्न िनदेशालय, ी भुवनेश कु ल े ,
सहायक महािनदेशक, आिथर्क आसूचना ब्यूरो, ी देवेन्दर् कु मार गु ा, िनदेशक, िनयंतर्क महालेखा परीक्षक
कायार्लय, ी सुशील ठाकु र, उप सिचव, के .उ.शु.सी.शु बोडर्, ी मुकुल िसंहल, संयक्त
ु सिचव (पर्शा.),
राज व िवभाग, ीमती मीना अगर्वाल, संयक्त
ु सिचव (कािमर्क), यय िवभाग, ीमती मधु शमार्, िनदेशक
(रा.भा.), राज व िवभाग, ी आशुतोष िजन्दल, िनजी सिचव, िव राज्य मंतर्ी, ी तपन कु मार चटजीर्, मुख्य
आयकर आयुक्त, िशलांग, तथा ह. राय खान, आयकर आयुक्त, िशलांग आिद कई विर अिधकारी तथा
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गणमान्य यिक्त शािमल थे । यय िवभाग की ओर से संयक्त
ु सिचव (कािमर्क) के अलावा ी डी.डी. ितवारी,
उप िनदेशक (रा.भा.), ी परमानन्द आयर्, सहायक िनदेशक (रा.भा.) ी अंकुर भटनागर, अनुवादक तथा
ी चन्दन िसंह, उ. े.िलिपक इस बैठक में उपि थत रहे ।
अन्य िविवधः िवभाग में गत वषर् के दौरान राजभाषा से जुड़ी अन्य िविवध गितिविधयां इस पर्कार रहीः-
*
उप िनदेशक (रा.भा.) के नेतृत्व में हुए राजभाषा िनरीक्षण में पाई गई किमय को दरू करने की
िदशा में यय िवभाग के अधीन थ तीन कायार्लय में से दो अधीन थ कायार्लय - के न्दर्ीय पेंशन लेखा
कायार्लय तथा शासकीय लेखा एवं िव सं थान के कािमर्क को िहन्दी का ान 80 पर्ितशत से अिधक होने के
चलते सरकारी कामकाज में िहन्दी का अिधकािधक पर्योग करने की अपेक्षा से अिधसूिचत कर िदया गया है ।
*
इस वषर् सं था-II (क) अनुभाग ारा पर्कािशत पाँच िनयम- पु तक 1. मैनअ
ु ल ऑन
पोिलसीज़ एंड पर्ोिसजसर् फॉर पर्ोक्योरमेंट ऑफ वकर् , 2. मैनअ
ु ल ऑफ पॉिलसीज़ एंज पर्ोिसजसर् ऑफ
इम्लॉयमेंट ऑफ कं सलटेंस, 3. मैनअ
ु ल ऑन पोिलसीज़ एंड पर्ोिसजसर् फॉर पचेर्ज़ ऑफ गुड्स, 4. जनरल
फाइनेंिसयल स, 2005 और 5. कॉम्पेंिडयम ऑफ स ऑन एडवांसेज़ टू गवमेर्ंट सरवेन्ट्स का िहन्दी
पांतर कराया गया और टंकण/िमलान के बाद उन्हें िनयत अविध के भीतर पु तक प में संबंिधत शाखा को
स प िदया गया । टंकण का यह सारा कायर् यूनीकोड फॉन्ट में कराया गया है तािक इन मैनअ
ु ल को िवभाग की
वेबसाइट में भी डाला जा सके ।
*
*
िवभाग के सभी कम्प्यूटर को ि भाषी कर िदया गया है ।
यय िवभाग की वेबसाइट भी ि भाषी कराई जा चुकी है ।
िहन्दी पखवाड़े के दौरान आयोिजत की गई पर्ितयोिगताओं में िवजयी पर्ितयोिगय की सूचीःिहन्दी नोिटंग/डर्ािफ्टंग पर्ितयोिगता
नाम/पदनाम (सवर् ी/ ीमती/सु ी)
कर्.सं.
1.
लिलत मोहन उपाध्याय, रोकिड़या
2.
राजेश िवरमानी, उ ेणी िलिपक
3.
मंजल
ु ा जुनेजा, वैयिक्तक सहायक
4.
राजीव रं जन ितवारी, वैयिक्तक सहायक
5.
भारती गुसाई, उ ेणी िलिपक
िहन्दी िनबंध पर्ितयोिगता
1.
दीनानाथ, उ ेणी िलिपक
2.
पंकज कु मार, अवर ेणी िलिपक
3.
मंजल
ु ा जुनेजा, वैयिक्तक सहायक
4.
मीताली घोष, अवर सिचव
5.
मीनाक्षी गु ा, किन अन्वेषक
राजभाषा संगो ी (अिध.) पर्ितयोिगता
1.
आर.वी.आर. शेषरत्नम, िनजी सिचव
2.
मीताली घोष, अवर सिचव
3.
आर.के . थापर, अनुभाग अिधकारी
4.
भोजराज बसेशंकर, अनुभाग अिधकारी
5.
हरीश चन्दर् अरोड़ा, अनुभाग अिधकारी
यय पित्रका
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पुर कार
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
रािश
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
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िहन्दी आशुभाषण पर्ितयोिगता
1.
नीलम शमार्, सहायक
2.
क णेश पर्ताप िसंह, सहायक
3.
नीरज डोगरा, उ ेणी िलिपक
4.
आर.के . थापर, अनुभाग अिधकारी
5.
रे नु वमार्, वैयिक्तक सहायक
िहन्दी किवता पर्ितयोिगता
1.
सुदशर्न ढल, सहायक
2.
सुनील शांिड य, चपरासी
3.
हरीश चन्दर् अरोड़ा, अनुभाग अिधकारी
4.
ज्योित ख र, किन अन्वेषक
5.
राके श कु मार िसंह, सहायक
िहन्दी सामान्य ान व यवहार पर्ितयोिगता (अिहन्दी-भाषी)
1.
शुभा िवजयल मी, उ ेणी िलिपक
2.
आर.एस.आर. मूितर्, अवर सिचव
3.
आर.वी.आर. शेषरत्नम, िनजी सिचव
4.
वणर्लता, वैयिक्तक सहायक
5.
जोते लाल िटमिकम, उ ेणी िलिपक
िहन्दी संगो ी (कमर्चारी) पर्ितयोिगता
1.
क णेश पर्ताप िसंह, सहायक
2.
आशा सैनी, सहायक
3.
आशुतोष िम , उ ेणी िलिपक
4.
राजेश शमार्, उ ेणी िलिपक
5.
ए.के . भसीन, सहायक
िहन्दी लोगन पर्ितयोिगता
1.
कु मार राके श रौशन, अवर ेणी िलिपक
2.
इन्दु कु करे ती, सहायक लेखािधकारी
3.
संजय कनौिजया, िनजी सिचव
4.
अ ण कु मार िम , अनुभाग अिधकारी
5.
अमरजीत िपपलानी, उ ेणी िलिपक
िहन्दी पर् ावली पर्ितयोिगता
1.
आशुतोष िम , सहायक
2.
राके श कु मार िसंह, सहायक
3.
रीतेश कु मार, अवर ेणी िलिपक
4.
राजीव कु मार, अवर ेणी िलिपक
5.
अ ण कु मार िम , अनुभाग अिधकारी
िहन्दी ुतलेख/सुलेख पर्ितयोिगता (अिधकारी/कमर्चारी)
1.
पंकज कु मार, अवर ेणी िलिपक
2.
दीनानाथ, उ ेणी िलिपक
3.
ए.के . भसीन, सहायक
4.
भोजराज बसेशंकर, अनुभाग अिधकारी
5.
मनोज कु मार, उ ेणी िलिपक
िहन्दी ुतलेख/सुलेख पर्ितयोिगता (अिलिपकीय)
1.
महीपाल िसंह, चपरासी
2.
सुकदेव िसंह, चपरासी
3.
सुभाष चन्दर् िसंह, चपरासी
4.
आशा राम चौहान, चपरासी
5.
कृ ण कु मार, चपरासी
यय पित्रका
- 2007-2008
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन-I
पर्ोत्साहन-II
5000/3000/2000/1000/1000/-
पए
पए
पए
पए
पए
96
महालेखा िनयंतर्क कायार्लय में िहन्दी पखवाड़ाःगृह मंतर्ालय, राजभाषा िवभाग ारा राजभाषा नीित के कायार्न्वयन के िलए जारी िकए गए
वािषर्क कायर्कर्म के अनुसार सरकारी कामकाज में राजभाषा के प में िहन्दी के पर्ित जाग कता लाने तथा
इसके उ रो र पर्योग में गित लाने के उ े य से महालेखा िनयंतर्क कायार्लय में िदनांक 14-28 िसतम्बर,
2007 तक िहन्दी पखवाड़ा आयोिजत िकया गया । इस दौरान कायार्लय में िहन्दी का कायर्साधक ान रखने
वाले सभी अिधकािरय /कमर्चािरय से अपना अिधकांश सरकारी कामकाज िहन्दी में करने का अनुरोध िकया
गया ।
इस वषर् महालेखा िनयंतर्क कायार्लय में िहन्दी पखवाड़े का आयोजन यापक तर पर िकया
गया । इस बार महालेखा िनयंतर्क कायार्लय ही नहीं अिपतु िद ी ि थत लेखा संगठन के िविभ कायार्लय को
भी शािमल िकया गया िजसमें सभी पर्ितयोिगय ने उत्साहपूवर्क भाग िलया । इस अवसर पर िविभ
पर्ितयोिगताओं का आयोजन िकया गया ।
िदनांक 10.10.2007 को सायं 3.00 बजे महालेखा िनयंतर्क महोदय की अध्यक्षता में
पुर कार िवतरण समारोह का आयोजन िकया गया िजसमें उन्ह ने पर्ितयोिगताओं में भाग लेने वाले सभी
पर्ितयोिगय एवं उपि थत अिधकािरय एवं कमर्चािरय का िहन्दी पखवाड़े के सफल आयोजन के संबंध में
धन्यवाद पर्कट िकया । उन्ह ने यह भी कहा िक िहन्दी पखवाड़ा िसतम्बर माह के अितिरक्त दसू रे महीने में भी
आयोिजत िकया जा सकता है । इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय भाषण में संपकर् भाषा के प में िहन्दी के
महत्व पर पर्काश डाला तथा भिव य में होने वाली पर्ितयोिगताओं में कायार्लय के और भी अिधक से अिधक
अिधकािरय /कमर्चािरय के बढ़-चढ़ कर भाग लेने के पर्ित अपना िव ास यक्त िकया । अध्यक्ष महोदय ने
पुर कार िवजेताओं को बधाई देते हुए यह भी कहा िक हमें अपने िदन-पर्ितिदन के काम में िहन्दी का ज्यादा से
ज्यादा पर्योग करने का संक प लेना चािहए । मुझे िहन्दी में पर्ा फाइल का िनपटान करने में कोई सम या नहीं
है, अतः िनःसंकोच िहन्दी में फाइलें पर् तुत कर सकते हैं ।
अध्यक्ष महोदय के िव सिचव के साथ अचानक आयोिजत की गई बैठक में भाग लेने के
कारण अपर महालेखा िनयंतर्क, अ ण शमार् ारा उक्त पर्ितयोिगताओं के पुर कार िवजेताओं को नकद पुर कार
तथा पर्ितयोिगताओं में भाग लेने वाले सभी पर्ितयोिगय को पर्ोत्साहन पुर कार के प में िहन्दी सािहत्य की े
कृ ितयां एवं पर्माण-पतर् भी पर्दान िकए गए ।
इस अवसर पर संयक्त
ु महालेखा िनयंतर्क ीमती अचर्ना िनगम ने संबोिधत करते हुए कहा िक
इस बार िहन्दी पखवाड़े में िद ी ि थत लेखा संगठन कायार्लय के अिधकािरय एवं कमर्चािरय को भी इसमें
शािमल िकया गया िजसके माध्यम से सबको साथ लेकर चलने की पहल की गई है । हमारा यही पर्यास है िक
सबको एक सूतर् में बांधा जाए ।
यय पित्रका
- 2007-2008
97
पखवाड़े के दौरान आयोिजत िविभ कायर्कर्म के संबंध में मुख्य लेखा िनयंतर्क (पेंशन)
ी यू.एस. पंत ने अपने संबोधन में इस बत पर जोर िदया िक इन आयोजन के दौरान िवशेष प से समय
िनकालकर अिधक से अिधक लोग की भागीदारी हो । इन आयोजन में ोताओं की कमी की ओर उन्ह ने
िवशेष ध्यान आकृ िकया और यह िव ास यक्त िकया िक ऐसे आयोजन से महालेखा िनयंतर्क कायार्लय
और लेखा संगठन एक पिरवार के प में सामने लाने का साथर्क पर्यास है और महालेखा िनयंतर्क कायार्लय
ारा इस संबंध में की गई पहल सराहनीय है ।
मुख्य लेखा िनयंतर्क (सूचना एवं पर्सारण) ी िवलास घोडे वार ने इस वषर् सभी लेखा संगठन
कायार्लय को संगिठत करके एक पिरवार के प में लाने की पर्शंसा की । इस अवसर पर आयोिजत की गई
पर्ितयोिगताओं तथा िविवध कायर्कर्म का संचालन एवं संयोजन सहायक िनदेशक (रा.भा.), ीमती िवनीत
कु ल े ने िकया ।
पखवाड़े के दौरान िविभ पर्ितयोिगताओं में पुर कृ त पर्ितयोगी इस पर्कार रहेःनाम/पदनाम ( ी/ ीमती/सु ी)
कर्.सं.
िहन्दी पिरचचार्
1.
धर्ुव कु मार
2.
ओम पर्काश सैनी
3.
राजेश पंत
4.
धनकर
5.
िवनीता
िनबंध पर्ितयोिगता (महालेखा िनयंतर्क कायार्लय)
1.
िनमर्ल कु मार भगत, अवर सिचव
2.
अभय कु मार, अ. े. िलिपक
3.
सुरेश कु मार गु ा, स.ले. अिधकारी
4.
राजेश कु मार, विर लेखाकार
5.
राजेन्दर् पर्साद, विर लेखाकार
िनबंध पर्ितयोिगता (लेखा संगठन कायार्लय)
1.
नविनिध कु मार गौतम
2.
धमेर्न्दर् कु मार
3.
सुमन कु मार
4.
हेमंत भार ाज
5.
मदन लाल यादव
किवता पाठ
1.
अनुज कु मार ितर्पाठी, िनजी सिचव
2.
जे.के . कौिशक
वाई.पी. िसंह
#3.
पर्सून ीवा तव
#4.
5.
उवर्शी राय
िहन्दी िटप्पण आलेखन पर्ितयोिगता (लेखा संगठन कायार्लय)
1.
वालेहा अंजमु
2.
कृ ण अवतार
3.
राके श कु मार
4.
अमृत लाल िसंह
5.
सुमन कु मार
यय पित्रका
- 2007-2008
कायार्लय
थान
गर्ामीण िवकास मंतर्ालय
के .पे.ले. कायार्लय
-तदेवकोयला मंतर्ालय
के .पे.ले. कायार्लय
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन
पर्ोत्साहन
महालेखा िनयंतर्क
-तदेव-तदेव-तदेव-तदेव-
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन
पर्ोत्साहन
उ ोग मंतर्ालय
शहरी िवकास मंतर्ालय
िविध एवं न्याय मंतर्ालय
सूचना एवं पर्सारण मंतर्ालय
के .पे. लेखा कायार्लय
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन
पर्ोत्साहन
महालेखा िनयंतर्क
शहरी िवकास मंतर्ालय
सूचना एवं पर्सारण मंतर्ालय
के .पे.ले. कायार्लय
पर्ोत्साहन
पर्थम
ि तीय
तृतीय
तृतीय
पर्ोत्साहन
के .पर्.कर बोडर्
िवदेश मंतर्ालय
के .पे.ले. कायार्लय
िवदेश मंतर्ालय
िविध एवं न्याय मंतर्ालय
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन
पर्ोत्साहन
98
िहन्दी िटप्पण/आलेखन पर्ितयोिगता (महालेखा िनयंतर्क कायार्लय)
1.
िनमर्ल कु मार भगत, अवर सिचव
2.
पर्काश सामुएल, सहा.ले. अिधकारी
3.
सुरेश कु मार गु ा, स.ले. अिधकारी
4.
राजेश कु मार, व. लेखाकार
5.
यशवंत िसंह, लेखाकार
िवचार-गो ी
1.
एस.एम. अबु कै सर
2.
धमेर्न्दर् कु मार
3.
वाई.पी. िसंह
4.
यशवंत िसंह
सु
शील कु मार
*5.
नविनिध कु मार गौतम
*6.
महालेखा िनयंतर्क कायार्लय
-तदेव-तदेव-तदेव-तदेव-
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन
पर्ोत्साहन
के .पर्.कर बोडर्
शहरी िवकास मंतर्ालय
सूचना एवं पर्सारण मंतर्ालय
महालेखा िनयंतर्क का कायार्लय
शहरी िवकास मंतर्ालय
उ ोग मंतर्ालय
पर्थम
ि तीय
तृतीय
पर्ोत्साहन
पर्ोत्साहन
पर्ोत्साहन
# उपयुर्क्त पर्ितयोिगता में पर्ितयोिगय के बराबर अंक पर्ा करने के कारण िनणार्यक मंडल ारा दो तृतीय पुर कार पर्दान िकए जाने का िनणर्य िलया गया है, जबिक
एक पर्ोत्साहन पुर कार कम कर िदया गया है ।
गया ।
* उपयुर्क्त पर्ितयोिगता में पर्ितयोिगय ारा बराबर अंक पर्ा करने के कारण िनणार्यक मंडल ारा एक अितिरक्त पर्ोत्साहन पुर कार पर्दान िकए जाने का िनणर्य िलया
इसके साथ ही रा टर्ीय िव ीय पर्बंधन सं थान, फरीदाबाद (एन.आई.एफ.एम.), शासकीय
लेखा एवं िव सं थान (इन्गैफ), जे.एन.यू. पिरसर तथा के न्दर्ीय पेंशन लेखा कायार्लय (सी.पी.ए.ओ.),
भीकाजी कामा े स में भी उत्साह और उ ासपूवर्क िहन्दी पखवाड़ा मनाए जाने की सूचना िमली है ।
िरपोटर्ः अंकुर भटनागर, अनुवादक,
यय िवभाग, िव मंतर्ालय
अपनी मातृभाषा बंगला में िलख कर मैं बंगबंधु तो
हो गया, िकन्तु भारतबंधु तभी हो सकंू गा जब मैं भारत की
रा टर् भाषा में िलखंगू ा ।
बंिकम चन्दर् च ोपाध्याय
यय पित्रका
- 2007-2008
99
किवता
पुर कार
मैं जीत सकता था कई पुर कार
मैं भी जीत सकता हूं कई पुर कार ।।
मेरे भी कई जानने वाले है इंसान
कई िर तेदार, ऊं चे पद पर हैं िवराजमान
कई नेता लोग भी मुझपे हैं मेहरबान
जो कर सकते थे मेरा भी उ ार
इसिलए तो....
मैं जीत सकता था कई पुर कार
मैं भी जीत सकता हूं कई पुर कार ।।
मेरे चाचा देश के एक स े नेता हैं
मेरे काका देश के एक अच्छ अिभनेता हैं
बचपन मैंने उनके साथ गुजारा है
हर पल, हर घड़ी उन्ह ने मुझको पुचकारा है
इसिलए तो....
मैं जीत सकता था कई पुर कार
मैं भी जीत सकता हूं कई पुर कार ।।
पहचान से आजकल क्या हो नहीं सकता
चाहो तो, क्या कु छ हािसल हो नहीं सकता
कभी चाचा बनकर, कभी भतीजा बनकर,
कभी मामा बनकर, तो कभी भांजा बनकर
इसिलए तो....
मैं जीत सकता था कई पुर कार
मैं भी जीत सकता हूं कई पुर कार ।।
पर मैं झूठ के महल बनवाना नहीं चाहता
यय पित्रका
- 2007-2008
100
क्य िक झूठ की दीवार ज्यादा देर िटकती नहीं
और िफर,
मुझमें है गजब का आत्मिव ास
िदल में हैं तूफान के जज्बात
हाथ में है कलम की तलवार
िजसके दम पर बदल सकता हूं कईय की सरकार
साथ में बदल सकता हूं कईय के सं कार
अपनी कलम के ही दम पर जीतूंगा पुर कार
यही पुर कार जो आज मुझसे है कोस दरू
वही पुर कार िजसके िलए नेता लोग करते हैं टू र
वही पुर कार िजसके िलए करते हैं एक-दसू रे तक का खून
वही पुर कार िजसके िलए नेताओं तक के िबकते हैं ईमान
वही पुर कार िजसके िलए डाक्टर तक हो जाते हैं बेईमान
वही पुर कार िजसके िलए सेना लेती है जवान के िलए ताबूत
ऐसे ताबूत, ऐसे ताबूत िजसके आज तक नहीं िमले कोई सबूत
लेिकन,
मैं जीतूंगा एक िदन ईमानदारी का पुर कार
ऐसा पुर कार िजससे लोग करें मेरा सम्मान
और मैं कह सकूं िक मेरा देश महान, मेरा देश महान ।।
इन्दर् जीत गोिगया, डी.ई.ओ., गर्ेड-बी,
बजट पर्ैस, आिथर्क कायर् िवभाग, िव मंतर्ालय ।
यय पित्रका
- 2007-2008
101
पुनपर्र् तुित
अपने समय पर िनयंतर्ण कै से करें
बहुत से लोग िजन्दा होने
के साधारण से सत्य में संतिु पाए िबना
पूरा जीवन गुजार देते हैं । िफर भी यही
जीवन का वो समय है जो हमारा हो गया
इसका पूरा-पूरा लाभ लेना ही बेहतर है ।
हम में से कु छ िन य प से ऐसा करते हैं ।
हम इस पर्कार कायर् करते हैं मान यह
समय अगले क्षण के िलए िकया गया
अभ्यास हो । जैसा िक जाजर् बनार्ड शॉ ने
कहा था, हमें अपने जीवन को
गंभीरतापूकर् जीने के िलए पूरा जीवन
भी कम पड़ जाता है ।
सौभाग्य से हम ऐसे युग
में जी रहे हैं, जब लोग ने हमारी सहायता
के िलए कई ढंग िवकिसत कर िलए हैं । यिद हम अपने समय का बुि मता से पर्योग करना चाहते हैं तो हमें
ऐलन लेइकन, जो समय पर्बंधन के सलाहकार हैं तथा िजन्ह ने 1970 के दशक में इस उपयोगी कला के बारे में
11000 के लगभग लोग के िलए एक सेमीनार आयोिजत िकया था िजसका उ े य पु ष तथा ि य में पर्ेरणा
को बढ़ाना था (य िप, ये ऐिच्छक अथवा आव यक पर्तीत हो), अथवा उन ि थितय के हल खोजना था जो
उनके िलए बाधा बनती है ।
लेइकन कहते हैं- "अिधकतर लोग िमनट के िहसाब से नहीं सोचते, वे सभी िमनट
खो देते हैं । न ही पूरे जीवन में कभी सोच-िवचार करते हैं ।" वे घंट अथवा िदन के मध्यकाल में काम
करते हैं । इसिलए वे पर्त्येक स ाह को पुनः आरंभ करते हैं और अपने समय का महत्वपूणर् भाग उन काय में
न कर देते हैं, िजनका उनके जीवन के उ े य स कोई संबंध भी नहीं होता । वे लोग जीवन को एक अ थायी
तरीके से जी रहे हैं । अंत में तनाव, कुं ठा, िचड़िचड़ाहट के दौर से गुजर कर िडपर्ेशन की दिु नया में फं स
जाते हैं ।
यय पित्रका
- 2007-2008
102
वा तिवक पर् यह हैः- हम असल में क्या करना चाहते हैं ? यिद हम यह नहीं जानते,
आज अथवा कल हमें इसका अहसास होगा, िक जो भी हम करना चाह रहे हैं उसे करने के िलए पयार्
समय भी नहीं बचा है । हमारा जीवन पूणर्तः हमारा नहीं है िफर भी यही है जो कु छ हमारा है, और इसी समय
को िनरंतर पर्ितिकर्याओं तथा दसू र की योजनाओं के अनुसार िबताना िफजूल है । चाहे वह योजना ई र की ही
क्य न हो, भेद िकया जाना चािहए । हमें अपनी िनजी िजन्दगी के कु छ पल िनकालने ही चािहए । क्य िक एक
िदन मृत्यु होगी तब आपको अके ले ही जाना होगा । तब माता-िपता, पित-पत्नी, ब े, िमतर् कोई साथ नहीं
जाएगा । आपके साथ ह गे आपके भोगे हुए िनजी पल, िबताया हुआ समय । होता यह है िक लोग अिधकांश
समय क ं न क ं के असमंजस में न करते हैं ।
इस बात को जानने के िलए हम अपने समय को कै से िबताना चाहते हैं संगठन योजना
तथा एकागर्ता की आव यकता है और सबसे अिधक आव यक है आत्म- ान का होना । उ े य के िबना
और पर्ेरणा के अभाव में समय न हो जाएगा । अपने और पराए में भेद पहचानना हमें आना चािहए तथा
उ े य को पर्ा करने के िलए समिन्वत पर्यास करना चािहए ।
लेइकन कहते हैं िक "समय का िवशेष तथा सव म उपोयग योजना बनाकर िकया
जा सकता है ।" कु छ लोग सूिचयां भी नहीं बनाते, कु छ यह क पना करते हैं िक आज का संबंध अगले स ाह
से और अब से पाँच साल बाद से है । हरबटर् ए. शेपाटर्, जो मानवीय संबंध के सलाहकार हैं, लोग से अपने
सपन , रोमांच तथा उन संभावनाओं को खोजने के िलए कहते हैं जो उन्ह ने थायी तौर पर भुला दी है । क्य िक
"लोग ऐसा नहीं करते", "मेरे पास समय नहीं है" यह सोचकर लोग अपने शुभिचंतक से अपने जीवन से
जबदर् ती दिू रयां बना लेते हैं, जो िक गलत है ।
िम टन ग्लेसर अपने य कलाओं के कू ल में अपने िव ािथर्य से अपने िलए एक साथर्क
िदन, जो िक अब पाँच साल बाद होगा, की परे खा बनाने के िलए कहते हैं । कु छ ऐसे हर पर्कार के खेल हैं
जैसे िक अपना संदश
े िलखना िजसे यिद गंभीरतापूवर्क िलया जाए, तो वे लोग पिरि थितवश अथवा क पना
के अभाव में बुरी तरह फं से हुए हैं, अपनी नई दिु नया बसा सकते हैं ।
अग त के एक िदन, एक िरपोटर्र ने युवा अध्यक्षाओं का एक सवेर्क्षण िकया जो एक लम्बे
आइलैंड क्लब के तालाब पर बैठी थीं । उनके िदन, सूयर् की चमक, नान के सुख तथा रोमांच के सतर् से भरे
थे । िरपोटर्र ने उनसे उनकी पसंद के रोमांच के बारे में पूछा..... "उनका कोई रोमांच नहीं था", उन्ह ने सूिचत
िकया.. "के वल भय", अपना धन अथवा अपने हाव-भाव खोने का भय है । असुरक्षा की भावना भी है ।
सच यह है िक क पना के िबना कोई िवक प अथवा कोई पर्ेरणा नहीं हो सकती । अतः अच्छी क पना
की जाए ।
यय पित्रका
- 2007-2008
103
आप िकस पर्कार का जीवन जीना चाहेंगे यिद आपको यह पता चल जाए िक आज से आप
के वल छह माह के िलए जीिवत रहेंगे । इस पर् के माध्यम से लेइकन िकसी भी इंसान को इस बात का
सामना करने के िलए पर्ेिरत करता है जो उसके िलए सबसे अिधक महत्वपूणर् है । उसे महत्व दें व आज
में जीना सीखे । भिव य की िचंता करो तथा भिव य का ान लेकर योजना बनाओ लेिकन परेशान
होकर नहीं, सजगता व सामथ्यर् के साथ ।
इसी पर्कार, शेपडर् लोग से पूछते हैं.. "आप अपने जीवन में वा तिवक प में कब पर्स
होते हैं ? िकस कायर् को देर से करने पर आपको अफसोस होता है ?" बहुत से लोग ने इनके उ र के बारे में
कभी भी सजग होकर िवचार नहीं िकया, तथा एक बार वे अपने भाव से अवगत हो जाएं तो वे ये देखते हुए
िक उनकी ग्लािन तथा खीज कम हो रही है तथा जीवन आनिन्दत हो रहा है, ढ़ नीितयां बनाना आरंभ कर
सकते हैं और यही िबन्द ु है जहां पर आप उस अंजान यिक्त से िमलते हैं जो वयं आप हैं तथा उन
पर्ाथिमकताओं को िनि त करते हैं जो आपसे संबंिधत हैं ।
"जो भी कायर् महत्वपूणर् है उसे करने के िलए पयार् समय होता है ।" लेइकन कहते हैं िक
बहुत से लोग िदन का सबसे उपयोगी समय (8 तथा 11 बजे के बीच) समाचार पढ़ने में, काफी पीने में तथा
बातचीत करने में बीताते हैं । एक बार यिद हम अनुभव कर लें िक महत्वपूणर् चीज के िलए समय है तो अगली
सम या उनको हल करने की होती है । आिखर सत्य यही है - "समय ही जीवन है" इस पर िनयंतर्ण करें
व पर्स रहें ।
समय पर्बंधन
समय को न करने वाले/अप ययी कारक
समय अत्यंत महत्वपूणर् है । समय न करने वाले अप ययी लोग के जीवन- तर पर इस कदर
रचे बसे हैं िक वे इन पर ध्यान नहीं दे पाते । यिद इन कारक पर िनयंतर्ण िकया जाए तो समय की महत्वपूणर्
बचत होगी और बेहतर समय पर्बंधन हो सके गा ।
1.
2.
3.
4.
5.
6.
गंभीर कायर् करने के दौरान टेलीफोन का यवधान ।
आगंतक
ु का अचानक आ जाना तथा कायर् के पर्वाह को अव करना ।
अ यवि थत डे क, असंगठन को पर्दिशर्त करता है । कायर् की मेज यवि थत रखना तािक कायर्
िन पादन पर्भावी हो सके ।
आव यक कागज को तत्काल ढू ंढने में असमथर् होना ।
अनुपयुक्त अथवा के हुए संचार साधन को वजह से संपर्ेषण न हो पाना ।
बाहरी अिनि त बैठक में भाग लेना ।
यय पित्रका
- 2007-2008
104
7.
8.
9.
10.
11.
12.
13.
14.
15.
16.
17.
18.
19.
20.
21.
22.
23.
24.
25.
कायार्लय अथवा समाज में हो रहे महत्वपूणर् िवकास के संबंध में अनिभ रहना ।
जब तक ि थित िव फोटक न बन जाए, उसका सामना तब तक न कर पाने की अशक्तता । िफर उस
ि थित को संभावने में काफी समय यय करना तथा तनावगर् त रहना ।
अपने कायर् के साथ न्याय न करते हुए उसके संबंध में अत्यिधक कायर् करने का पर्यास करना ।
अपने कायर् के संबंध में दीघर्सतर्ू ी होना तथा सदैव ही अिनणर्य की ि थित में रहना ।
िनरं तर तनाव व िचंता में िघरे रहना िजसमें एकागर्ता व उिचत कायर् संचालन पर बुरा पर्भाव पड़ता है ।
कायार्लय के कायर् के समय अपने िनजी काम करना ।
असंब यिक्तय से पेशेवर ( यावसाियक) मामल पर चचार् करना तथा इस संबंध में वयं को उलझा
लेना । सही यिक्तय से उिचत सलाह न लेना ।
अपने उ े य पर एकागर्िचत होने की अपेक्षा दसू र को िदखावा करने में समय िबताना ।
यह सोचना िक पर्त्येक कायर् को मैं अपने िनजी ढंग से संप क ं , बजाय इस बात का भरोसा रखने के
िक उनमें से कु छ कतर् य का मागर्दशर्न अन्य लोग भी कर सकते हैं । परन्तु संकोच या अहमवश मागर्दशर्न न लेना तथा मागर्दशर्न देने वाले के पर्ित गु सा पर्कट करना ।
एक ही समय में कई लोग को िमलने के िलए बुलाना व अपने तथा दसू र के िलए उलझन पैदा
करना ।
मुख्य मामल को दसू र ारा िनपटाने के िलए छोड़ना तथा फल व प िनकृ पिरणाम पर्ा करना ।
दसू र से उनके सामथ्यर् से अिधक कायर् करने की आशा रखना ।
अपर्स होने पर भी कायर् में संल रहना । भयवश सत्य न बोलना ।
सदा िवलम्ब से आना अथवा िनयत समय पर न पहुचं पाना ।
ऐसा कायर् अथवा यवसाय करना िजसमें आप कु शल नहीं है और सीखने की इन्छा न हो ।
दसू र के सुख से दःु खी रहना व ई यार् में समय यथर् करना ।
प प से अपनी बात पर् तुत न करना ।
एक ही समय में अनेक कायर् करने का पर्यास करना और फल व प िकसी से भी सफलता पर्ा न कर
पाना ।
जो कायर् कर रहे हैं उस पर ध्यान के िन्दर्त न करके अन्य बात के बारे में सोचना ।
अनुवादः डा. वेद पर्काश दबु े
उप िनदेशक (रा.भा.), गृह मंतर्ालय ।
यय पित्रका
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किवता
दीपक ज्योित
सूरज जब पहुचं ा अ ताचल, उसको िचंता ने घेरा ।
मेरे िबन इस मंजल
ु ¹ मिह का, कौन हरे गा अँधेरा ।
चन्दा चुप था मौन थे तारे , गुम-सुम वे सब रहे, खड़े ।
िचंतातुर हो रिव पुनः बोला, अंधकार को कौन हरे ।
बड़ -बड़ को सांप सूघं गया, पलकें सबकी झुकी-झुकी ।
स ाटा छा गया भयावह, सांसें सबकी की- की ।
जगमग-जगमग आया दीपक, मिदर-मिदर² मु कान िलए ।
िकया दंडवत सूयदर् वे को, मन में कु छ अरमान िलए ।
मेरे देवता ात मुझे यह, मेरे कं धे हैं िनबर्ल ।
िसर पर हो यिद हाथ नाथ का, बन जाएंगे ये संबल ।
शीश झुकाकर सूयदर् वे को, नतम तक हो बोला सिवनय ।
अंधकार को हर लूंगा मैं, भं ज्योत्सना िनलय-िनलय³ ।
सूयदर् वे ने होकर पुलिकत, दीपक का चूमा माथा ।
और कहा- तू पूज्य बनेगा, गाएगा जग जब गाथा ।
बड़ा नहीं बनता कोई भी, तन या धन पा जाने से ।
हर मानव दीप समान ही, भ य ज्योित से भरा हुआ ।
ज्योित बुझ गई यिद पौ ष की, जीिवत भी वह मरा हुआ ।।
जसपाल िसंह यादव, सहायक,
आिथर्क कायर् िवभाग, िव मंतर्ालय ।
(1)
मंजल
ु - सुन्दर, (2) मिदर - म त कर देने वाली (3) िनलय - घर
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लेख
राजभाषा पर्बंधन
िकसी
भी बैंक,
उपकर्म, कायार्लय, िवभाग या मंतर्ालय में
राजभाषा पर्बंधन िजतना सिकर्य, उत्साही
एवं सौहादर्पूणर् होगा, वहां राजभाषा नीित
का कायार्न्वयन भी उतना ही अिधक
पर्भावी होगा । अतः कायार्लय
अध्यक्ष /कायर्पालक तथा राजभाषा से
जुड़े अिधकािरय , पर्बंधक /सहायक
िनदेशक या िनदेशक आिद को राजभाषा
पर्बंधन को सव पिर पर्ाथिमकता देनी
होगी । राजभाषा पर्बंधन में राजभाषा से
जुड़े अिधकारी/कायर्पालक/पर्बंधक की
भूिमका धुरी की तरह होती है । पर्ायः यह
देखने में आ रहा है िक ज्यादातर
कायार्लय में टाफ का अभाव ही रहता
है और कायार्लय अध्यक्ष /कायर्पालक
की य तता सदैव अन्य पर्शासिनक, पर्बंधकीय और पिरयोजनाओं आिद में ही बनी रहती है, ऐसी ि थित में
राजभाषा अिधकारी/पर्बंधक की िजम्मेदारी और अिधक बढ़ जाती है ।
1.
2.
3.
राजभाषा पर्बंधन को मोटे तौर पर हम तीन भाग में बांट सकते हैःअनुवाद कायर्
राजभाषा नीित का कायार्न्वयन
िहन्दी भाषा, अनुवाद, टंकण/आशुिलिप आिद का पर्िशक्षण
िहन्दी अनुवाद कायर्ः
य िप अनुवाद कायर् के िन पादन आिद की िजम्मेदारी राजभाषा अिधकारी एवं अनुवादक की
होती है, परन्तु िफर भी उन्हें आव यक संसाधन उपलब्ध कराने की िजम्मेदारी पर्शासन की ही होती है । छोटे
यय पित्रका
- 2007-2008
107
कायार्लय में जहां अनुवाद कायर् कम होता है तथा उस में समयब ता की बात नहीं होती, वहां अनुवाद संबंधी
कोई सम या नहीं आती है, परन्तु ऐसे कायार्लय में जहां अनुवादक का पद ही नहीं होता, वहां िहन्दी एवं
अंगर्ेजी का अच्छा ान रखने वाले िकसी अिधकारी की सेवाएं मानदेय के आधार पर अनुवाद कायर् के िलए ली
जा सकती हैं ।
मंतर्ालय /िवभाग आिद में पर्ायः अनुवाद की सम या बनी रहती है और इसका मुख्य कारण
होता है िनधार्िरत पर्णाली का न होना । सवर्िविदत है िक संसद-सतर्, बजट सतर् या मंतर्ालय के िविभ महत्वपूणर्
आयोजन /सम्मेलन /समारोह आिद की सूचना की पयार् जानकारी पहले से ही दे दी जाती है, परन्तु
पर्ौ ोिगकी के इस युग में भी अपेिक्षत सूचनाएं िनधार्िरत समय पर पर्ा न हो पाने के कारण उन्हें समेिकत करने
या अनुमोिदत कराने में अत्यिधक समय लग जाता है और ि थित यहां तक पहुचं जाती है िक िरपोटर् या
अपेिक्षत सामगर्ी या अन्य िकसी द तावेज को पर् तुत करने में मातर् 2-3 िदन पहले िहन्दी अनुभाग को 100150 पृ अनुवाद हेत,ु "आज ही अनुवाद करें- Out today" आिद िटप्पणी के साथ दे िदए जाते हैं,
िजससे संबंिधत अिधकारी/अनुवादक को काफी किठनाई एवं तनाव का सामना करना पड़ता है । अनुवाद एक
बहुत ही जिटल पर्िकर्या है, िजसमें ोत भाषा एवं ल य भाषा को बारीकी से समझ कर ही चुन कर शब्द छांटने
पड़ते हैं और साथ ही अनुवादक/िहन्दी अिधकारी आिद उस िवषय सामगर्ी का िवशेष भी नहीं होता, िजसका
उन्हें अनुवाद िदया जाता है । तीन-चार वषर् में जब वह िकसी िवभाग एवं मंतर्ालय की शब्दावली-कायर्
पर्णािलय से अवगत होता है, तो उसका अन्यतर् थानांतरण हो जाता है और ि थित वही की वही बनी रहती
है । समयाभाव के कारण उत्प तनाव और ज दबाजी के दबाव के कारण अनुवाद की गुणव ा पर भी पर्ितकू ल
पर्भाव पड़ता है और अनुवाद में भी कमी रह जाने की संभावना बनी रहती है ।
ऐसी ि थित में पर्काशन/मानीटरन करने वाले पर्भाग की िजम्मेदारी होनी चािहए िक वह
सिकर्यता बरतते हुए िहन्दी अनुभाग को समय पर अनुवाद सामगर्ी उपलब्ध कराए तथा संबंिधत पर्भाग का
िवषय िवशेष भी िवषय से संबंिधत पर्णाली, जानकारी के िलए परामशर् हेतु िहन्दी शाखा के साथ उपलब्ध
रहना चािहए, तािक अथर् के समझने में िहन्दी अनुभाग को होने वाले संदहे को तत्काल दरू िकया जा सके और
अनुवाद में सही भाव को डाला जा सके । पर्शासन ारा िहन्दी अनुभाग को समुिचत आशुिलिपक /टंकक भी
उपलब्ध कराने चािहए जो अपने कायर् में पूरी तरह िनपुण ह ।
कई बार समय का अत्यिधक अभाव होता है, यािन 2-3 िदन में 400-500 पृ का
अनुवाद समयब प में आ जाता है, ऐसी ि थित से िनपटने के िलए िवभाग में िहन्दी/अंगर्ेजी में िनपुण
कािमर्क का एक पैनल अनुवाद कायर् हेतु बनाना ज री है और ऐसी ि थित में मानदेय के आधार पर उनकी
सेवाएं ली जा सकती हैं, ऐसी ि थित बड़े िवभाग /मंतर्ालय में संसद-सतर् के दौरान आती ही रहती है । कई बार
अनुवाद का कायर् तो पूरा हो जाता है, परन्तु िहन्दी आशुिलिपक /टंकक की कमी के कारण टंकण कायर् में
काफी असुिवधा एवं देरी का सामना करना पड़ता है, ऐसी ि थित से बचने के िलए िहन्दी टंकक /आशुिलिपक
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का पैनल बनाना भी ज री होता है, तािक भारी भरकम कायर् की ि थित में िहन्दी टाइिपंग में िकसी पर्कार की
बाधा उत्प न हो पाए और गुणव ा के साथ िनधार्िरत समय में पूरा िकया जा सके ।
(2)
राजभाषा कायार्न्वयनः
राजभाषा कायार्न्वयन में कायार्लय अध्यक्ष/कायर्पालक की भूिमका अत्यिधक महत्वपूणर् होती
है । कायार्लय पर्मुख को चािहए िक वह पर्त्येक कायर् के िलए हर ितमाही हेतु एक िनि त कायर् योजना
राजभाषा अिधकारी से अिगर्म प से लेकर, उसका सिकर्यता से कायार्न्वयन कराएं । इस पर्योजन के िलए
राजभाषा कायार्न्वयन हेतु अनुवाद कायर् की भांित कािमर्क की अलग यव था की जानी चािहए, तािक वािषर्क
कायर्कर्म में उि िखत ल य की पर्ाि के िलए आव यक कदम उठाए जा सकें ।
राजभाषा कायार्न्वयन में संपकर् की अगर्णी भूिमका रहती है, अतः पर्त्येक िवभाग/मंतर्ालय
ारा राजभाषा संपकर् अिभयान दल गिठत िकया जाना चािहए, जो िविभ अनुभाग /पर्भाग में यिक्तगत संपकर्
करे गा, राजभाषा कायर् में उनकी किठनाइय को समझ कर आव यक समाधान पर् तुत करे गा तथा समय-समय
पर जारी िनयम /पिरपतर् के अनुपालन की ि थित पर भी नजर रखेगा तथा आगामी िवभागीय राजभाषा
कायार्न्वयन सिमित की बैठक में तत्संबंधी िरपोटर् पर िवचार-िवमशर् िकया जाना ज री है । इससे राजभाषा का
और अिधक पर्सार बढ़ेगा ।
राजभाषा कायार्न्वयन सिमित की बैठक में िपछली बैठक में िलए गए िनणर्य के अनुपालन
की िरपोटर् पर भी चचार् करते हुए आव यक कदम उठाए जाने चािहए, इसी पर्कार पर्त्येक ितमाही में िवभागीय
िवषय से संबंिधत राजभाषा संगोि य तथा िहन्दी कायर्शालाओं का आयोजन भी राजभाषा कायर् करने के िलए
और अिधक लाभकारी िस होगा ।
संपकर् अिभयान दल ारा समय-समय पर राजभाषा िनरीक्षण भी करने चािहए और पाई गई
िवसंगितय के िलए आव यक कारर् वाई भी की जानी चािहए तथा िनरीक्षण के दौरान ल य, सहयोगी एवं
परामशर्दाता वाला ही होना चािहए । इसी पर्कार जांच िबन्दओ
ु ं का भी अनुपालन सुिनि त िकया जाना चािहए ।
िनरीक्षण/संपकर् दल की भावना से समैन की तरह होनी चािहए और इस दल को कािमर्क के िदल की गहराई
तक पहुचं कर, उनकी सम याओं को समझ कर, उन्हें राजभाषा में ज्यादा से ज्यादा कायर् करने के िलए पर्ेिरत
करना चािहए ।
िहन्दी अनुभाग के कािमर्क को सदैव सिकर्यता एवं उत्साही होना चािहए और राजभाषा
कायार्न्वयन की चुनौती को सहषर् वीकारना चािहए तथा बाधाओं और किठनाइय से घबराना नहीं चािहए तथा
आशािन्वत होकर अपने ल य की ओर आगे बढ़ते रहना चािहए ।
यय पित्रका
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संसाधन से जुड़े अिधकािरय में नए जोश के साथ संक प एवं साहस होना उन्हें राजभाषा
संबंधी ल य की पर्ाि में सदैव मील के पत्थर का कायर् करे गा । अतः ऐसे कािमर्क का यिक्तत्व भी बहुत
पर्भावशाली एवं िवनमर् होना चािहए ।
(3)
राजभाषा पर्िशक्षणः
य िप, दरू दशर्न एवं िफ म ने आज
िहन्दी का इतना पर्चार-पर्सार िकया है िक आज देश
के पर्त्येक कोने में िहन्दी आसानी से बोली और समझी
जाने लगी है, परन्तु सरकारी कायर् की अपनी एक शैली
एवं प ित होती है, िजसके िलए िहन्दी के उपयुक्त ान
का होना आव यक है । अतः राजभाषा के क्षेतर् में कई
तरह के पर्िशक्षण की यव था की गई है, जो िनम्न
पर्कार हैः(क)
िहन्दी भाषा पर्िशक्षणः
वैसे तो सरकार की तरफ से पर्ावधान
है िक िजन कािमर्क को िहन्दी का कायर्साधक ान
नहीं है- यािन उनके पास मैिटर्क में िहन्दी िवषय न रहा हो, उन्हें िहन्दी िशक्षण योजना के तहत िहन्दी का पर्ा
तर का ान पर्ा करना अिनवायर् है । िजन्ह ने पांचवीं कक्षा तक िहन्दी पढ़ी है, वे सीधे पर्वीण तथा उसके बाद
पर्ा की परीक्षा दे सकते हैं और िहन्दी िशक्षण योजना से कायार्लय समय में ही एक िदन छोड़कर अगले िदन
एक घंटे के िहसाब से छह माह का पर्िशक्षण ले सकते हैं । उन्हें आने-जाने का मागर् भ ा तथा पु तकें आिद
सरकार ारा दी जाएंगी तथा कोई परीक्षा शु क यिद हुआ, तो उसे सरकार की वहन करे गी ।
िहन्दी टंकण/आशुिलिप पर्िशक्षणः
सभी अवर ेणी िलिपक (LDC's) के िलए िहन्दी टंकण (Typing) टै ट पास करना
ज री है । उसी पर्कार अंगर्ेजी आशुिलिपक के िलए भी िहन्दी आशुिलिप की परीक्षा पास करना एक
सेवाकालीन अिनवायर् पर्िशक्षण सरकारी यय पर ही पूरा करना होता है ।
(ख)
आज कायार्लय /िवभाग /बैंक का 80 पर्ितशत कायर् कम्प्यूटर पर ही होता है, अंतः सरकार समय-समय पर
अपने कािमर्क को िहन्दी कम्प्यूटर पर्िशक्षण िदलाती है, िजसे उत्साह के साथ पूरा करना पर्त्येक कािमर्क के िहत
में होता है । पहले यही कायर् टाइपराइटर पर िकया जाता था ।
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राजभाषा कायार्न्वयन के पिरपर्े य में यह अिधक उपयोगी होगा िक राजभाषा के पर्भारी
अिधकारी को राजभाषा संबंधी ल य की पर्ाि के िलए अपने कायार्लय, बैंक, उपकर्म, िवभाग की
पिरि थितय को ध्यान में रखते हुए िवभागीय अध्यक्ष के अनुमोदन पर ितमाही/छमाही/वािषर्क कायर् योजना
तैयार कर लेनी चािहए, जो राजभाषा के क्षेतर् में आगे बढ़ने के िलए उनका मागर् पर्श त करे गी ।
कई बैंक /उपकर्म में तो राजभाषा नीित के कॉरपोरे ट नीित के तहत् कायार्लय/बैंक की शाखा
के गर्ेिडंग के समय कु छ अंक भी िदए जाते हैं, िजस से वहां िहन्दी के पर्चार-पर्सार में काफी वृि देखी गई है
तथा उन्हें राजभाषा िवभाग, गृह मंतर्ालय से सम्मािनत भी िकया जाता है । इस संबंध में कई
कायार्लय /बैंक /उपकर्म ारा अपने िवभागीय िवषय पर अध्ययन/शोध पतर् पर्कािशत िकए जा रहे हैं, िजनके
तहत तकनीकी िवषय पर पर्त्येक अिधकारी को िहन्दी में अपना अध्ययन/शोध पतर् पर् तुत करने का अवसर
िदया जाता है, इससे वहां िहन्दी में कायर् करने का माहौल तैयार होता है । आज लगभग सभी बड़े
कायार्लय /बैंक /उपकर्म ारा अपनी-अपनी िहन्दी पितर्का िनकाली जाती है तथा िहन्दी मौिलक पु तक
लेखन योजनाएं भी पर्चिलत हैं ।
परोक्ष प से राजभाषा कायार्न्वयन रा टर्ीय एकता का ही एक पिवतर् आंदोलन है, िजसके िलए
फाइल पर िहन्दी शब्द, वाक्य या िटप्पणी आिद का उपयोग कर अिधकारी/कमर्चारी अपना सिकर्य सहयोग दे
सकते हैं तथा दसू र को भी इस नैितक एवं कानूनी दाियत्व के िलए पर्ेिरत कर सकते हैं ।
वेद पर्काश गौड़, संयक्त
ु िनदेशक (रा.भा.)
योजना आयोग ।
रा टर्ीय अखंडता, सां कृ ितक एकता और आपसी स ावना के िलए के वल
एक ही संपकर् भाषा हो सकती है और वह है िहन्दी ।
डा. फादर कािमल बु के
जब तक इस देश में राजकाज िहन्दी भाषा में नहीं चलेगा तब तक सही
मायन में नहीं कहा जा सकता िक देश में वराज्य है ।
मोरारजी भाई देसाई
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किवता
बदरंग अक्स
बापू देखो भारत की कै सी बदरंग त वीर हो गई
सत्य अिहंसा की जुबान पैर की जंजीर हो गई
वतन पर त की जगह आज लुटेरे बैठे हैं
भरे ितजोरी इसी जुगाड़ में शाम-सबेरे बैठे हैं ।
िकसको िचन्ता आज देश के वैभव और सम्मान की
िनज उ ित ही सव पिर ये माला लेकर बैठे हैं
छोटी से छोटी कु सीर् भी भर् की जंजीर हो गई
सत्य अिहंसा की जुबान पैर की जंजीर हो गई ।।
िजसके बल पर भारत से अंगर्ेज को भगाया था
िजसको गाकर हर भारतवासी देशभक्त कहलाया था
क्या ऐसे ही राम-राज्य का हमने सपना बुना था
झूठे वाद पर जीना जनता की तकदीर हो गई
सत्य अिहंसा की जुबान पैर की जंजीर हो गई ।।
क्या नेता क्या जनता सबका अंदाज िनराला है
बगल में छु री, हाथ में थामे राम नाम की माला है
सीना तानकर झूठ घूमता साथ िफरे सहमा-सहमा
देश के रखवाल ने ही, देश का सौदा कर डाला है
"गोयल", आज िकसी को समझना टेढ़ी खीर हो गई
सत्य अिहंसा की जुबान पैर की जंजीर हो गई ।।
अ ण कु मार, उ ेणी िलिपक,
यय िवभाग, िव मंतर्ालय ।
यय पित्रका
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संवाद
पाठक के पतर्
आदरणीय महोदया,
आपके ारा पर्ेिषत िदनांक 20 अग त, 2007, कर्मांक ई-11020/2/07-िहन्दी पतर् पर्ा
हुआ । यय पितर्का मुझे िनयिमत प से मुझे िमल रही है तथा इसके माध्यम से िव मंतर्ालय में िहन्दी
कामकाज की ि थित की जानकारी िमल रही है । पितर्का के िलए आपको बधाई । आपको आ ासन देता हू ं िक
मैं पर्त्येक अंक के िलए अपनी रचनाएं भेजंगू ा और आप चाहें तो अन्य लेखक से रोचक कहानी, लेख,
सं मरण इत्यािद भेजता रहूगं ा ।
आज कल अिधकांश लेखक समुिचत मानदेय के िबना रचनाएं नहीं भेजते । छोटी सी किवता
के िलए भी कई पितर्काएं कम से कम 300 से 500 सौ पए तक मानदेय देती हैं । कम्प्यूटरीकृ त के ले पर्ित पृ
20-25 पए पािर िमक देना होता है । डाक-खचर् और लेखक की मेहनत का मानदेय भी । यिद आप
समुिचत मानदेय की सूचना पितर्का में पर्कािशत करें गी तो तत्काल पयार् मातर्ा में आपको रचनाएं पर्ा ह गी ।
वतर्मान समय में पर्ायः सभी पितर्काएं मानदेय देती हैं और लेखक िबना मानदेय के रचनाएं देने
को पर् तुत नहीं हैं । अतः आप कृ पया यय िवभाग के अिधकािरय के समक्ष यह पर् ताव रखकर उिचत मानदेय
का पर्बंध करें । अन्यथा मेरे जैसे 4-5 िहन्दी पर्ेमी ही आपके अनुरोध को वीकार कर रचना भेजते रहेंगे । मेरे
इस सुझाव को अन्यथा न लेंगी ।
सादर,
( डा. बालशौरी रे ी )
अध्यक्ष, तिमलनाडु िहन्दी अकादमी
यय पित्रका
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हमारे इस सं थान के संयक्तु िनदेशक ी अिखलेश झा का एक लेख लक्ष ीप का बौ
अतीत की पर्ित यय पितर्का में छपवाने के िलए पर्ेिषत कर रहा हू,ं कृ पया इस लेख को यय पितर्का में
पर्कािशत करवाने की कृ पा करें ।
सधन्यवाद,
( रणधीर िसंह )
सहायक लेखा अिधकारी (रा.भा.)
यय पितर्का का वषर् 2006-07 का अंक िमला । धन्यवाद, इसमें पर्कािशत सामगर्ी
सूचनापर्द और ानवधर्क लगी । साथ ही पितर्का में िदए गए रे खािचतर् भी बड़ी सूझबूझ से बनाए गए हैं और
लेख के साथ पूरा सामंज य िबठाते हैं, इसके िलए संपादक मंडल को बधाई ।
आगामी अंक में अिधकािरय और कमर्चािरय को राजभाषा नीित िवषयक संबंधी जानकारी
देने के िलए लेख भी पर्कािशत िकए जाएं तो पितर्का की उपयोिगता और बढ़ जाएगी । आशा है िक पितर्का
यय िवभाग में िहन्दी के पर्चार-पर्सार का पर्भावी माध्यम बनेगी ।
नव वषर् की शुभकामनाओं सिहत ।
( नेतर् िसंह रावत )
उप िनदेशक (कायार्.),
राजभाषा िवभाग ।
यय पित्रका
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उदीयमान
इस बार हमारे इस तंभ में पाठक से ब हैं तीन नन्हें कलाकार-
पहली हैं:-
मोिनका असवाल
के न्दर्ीय
िव ालय,
रोिहणी, सेक्टर-3 में
दसू री कक्षा में पढ़ रही 7
वषीर्या मोिनका हंसमुख
तो है ही साथ ही कू ल
में अपनी पढ़ाई-िलखाई
में भी आगे-आगे रहती
है ।
पढ़ाई के अलावा खेलकू द, डांस और पहाड़ी
लोक-गीत में गहरी
िदलच पी रखती है ।
हाल ही में उसको अपने
कू ल में हम उमर् ब
की िरले दौड़ में पहला
थान िमला है ।
पर् तुत है उसके बताए
गए कु छ िचतर्ः पितर्का में
अन्यतर् भी उसके िचतर्
देखे जा सकते हैं ।
यय पित्रका
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दसू रे महाशय हैःमा टर समथर् शील भटनागर
एस.एल.एस.डी.ए.वी. पिब्लक
कू ल, मौसम िवहार, िद ी-92 की
पहली कक्षा में पढ़ रहे 6 साल के
समथर् अथार्त् न ू , वभाव से बेहद
िखलंदड़, म त और शरारती हैं
तथा कू ल की भी गितिविधय में
काफी उलझे रहते हैं, लेिकन खेलकू द, पढ़ाई और शरारत से वक्त
िमलने पर डर्ाइंग बनाना नहीं भूलते
हैं । पर् तुत हैं उनके बनाए कु छ िचतर्:
यय पित्रका
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तीसरे महाशय हैं..
अिनं िसन्हा
कै िम्बर्ज कू ल, इिन्दरा
पुरम, गािजयाबाद
की चौथी कक्षा में
पढ़ने वाले अिनं
िसन्हा यािन- पोलू
करीब 8-9 साल
के हैं, जो भर्मणखेलकू द के काफी शौकीन हैं ।
इितहास और सां कृ ितक िवषय
में अपार िदलच पी और िज ासा
रखने वाले अिनं यातर्ाओं के
दौरान हािसल अनुभव को
िलखना नहीं भूलते । इसके साथ
ही वे अिभनय, गाने और
िचतर्कारी में भी जब-तब हाथ
अजमाते रहते हैं । खेलकू द और
शरारत से वक्त िनकालकर पढ़ाई
भी करते हैं ।
िपछले िदन अिनं बदर्ीनाथ यातर्ा
पर गए थे । पर् तुत है बदर्ीनाथ के
बारे में िलखी उनकी चन्द
पंिक्तयां....
हाल ही में वे पानीपत घूम के आए
हैं और उन िदन पानीपत में होने
वाले तीन ऐितहािसक यु के बारे
में िलखने का िवचार बना रहे हैं ।
यय पित्रका
"बदरीनाथ"
बदरीनाथ बहुत सुंदर जगह है । लोग मानते
हैं िक वहां वगर् की सीढ़ी है । भगवान िव णु ने यह जगह
िशवजी से लेकर यहां तप या की थी । तब ल मी जी अपने
पित के धूम से बचाने के िलए बदरी यानी- "बेर का पेड़"
बन गई थीं । इसीिलए इस जगह को बदरीनाथ कहते हैं ।
बदरी िवशाल के मंिदर के पीछे पहाड़ के ऊपर
चरण पादकु ा है । यहां खूब बफर् पड़ती है । वहां अलकनंदा
नदी बहती है, िजसका पानी बहुत ठं डा है । भारत का अंितम
गांव माना भी नजदीक ही है । वहां से पैदल वसुधारा भी जा
सकते हैं, वह बहुत सुंदर जगह है । यहां पर गरम पानी का
एक कुं ड भी है जहां सभी लोग नान करते हैं । माना से कु छ
दरू आगे हमारी सीमा चीन से िमलती है इसिलए यहां पर
भारत ितब्बत सीमा पुिलस वाले भी रहते हैं ।
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बदरीनाथ बहुत अच्छी जगह है ।
117
यय पित्रका
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